30 अज्ञात निवेशक और एप्स्टीन कांड: क्या भ्रष्टाचार छुपा रही हैं सरकार?
30 अज्ञात निवेशक केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उनकी बेटी हिमायनी पुरी के कारोबारी मामलों को लेकर उठ रहे आरोप अब और गहरे हो चुके हैं। अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जनवरी 2026 में जारी एप्स्टीन फाइल्स में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पुरी और जेफरी एप्स्टीन के बीच 2014 से 2017 के बीच कम से कम 62 ईमेल एक्सचेंज और 14 मीटिंग्स हुई थीं।
रिटायर्ड IFS अधिकारी से केंद्रीय मंत्री बने पुरी ने इन संपर्कों को “पेशेवर” और “सीमित” बताया है, लेकिन दस्तावेज कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। एप्स्टीन ने पुरी को लिंक्डइन के सह-संस्थापक रीड हॉफमैन से जोड़ा और उन्हें “Your man in India” कहा।
पुरी ने हॉफमैन को भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में निवेश के लिए जो ईमेल भेजे, उनमें अपनी बेटियों का भी जिक्र किया। यह सार्वजनिक पद के दुरुपयोग और निजी पारिवारिक लाभ के बीच की रेखा को धुंधला करने का गंभीर उदाहरण है, विशेषकर तब जब 30 अज्ञात निवेशक जैसी संदिग्ध कड़ियाँ इस पूरे नेटवर्क को संदेह के घेरे में खड़ा करती हैं।
हिमायनी पुरी और केमैन आइलैंड्स: 5700 करोड़ का रहस्यमयी हेज फंड
हिमायनी पुरी की कंपनी ‘Realm Partners LLC’, जो केमैन आइलैंड्स जैसे टैक्स हेवन में रजिस्टर्ड है, पारदर्शिता की कमी का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है। साल 2013 में पिता के रिटायरमेंट के ठीक बाद 2014 में लॉन्च हुई इस कंपनी ने पहले ही साल में लगभग 289 मिलियन डॉलर (करीब 5700 करोड़ रुपये) का फंड जुटा लिया।
एक सामान्य नौकरशाह परिवार की बेटी द्वारा बिना किसी बड़े ट्रैक रिकॉर्ड या स्पष्ट इनोवेशन के इतनी भारी पूंजी जुटाना स्वाभाविक रूप से संदिग्ध है। केमैन आइलैंड्स का इस्तेमाल अक्सर गोपनीय लेन-देन और शेल कंपनियों के लिए होता है। सार्वजनिक रिकॉर्ड्स में कंपनी के निवेशकों के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है, जो सवाल उठाता है कि क्या यह सफलता सिर्फ मेरिट पर थी या पिता के राजनयिक नेटवर्क का नतीजा।
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रॉबर्ट मिलर्ड और एप्स्टीन नेटवर्क का सीधा जुड़ाव
इस पूरे मामले में सबसे आपत्तिजनक कनेक्शन रॉबर्ट मिलर्ड का है, जो जेफरी एप्स्टीन का करीबी सहयोगी और MIT कॉर्पोरेशन का पूर्व चेयरमैन था। मिलर्ड, जो एप्स्टीन को MIT में डोनर बनाने में शामिल रहा था, अब हिमायनी पुरी की ‘Realm Partners’ में बिजनेस पार्टनर है। यह स्पष्ट करता है कि एप्स्टीन के प्रभाव वाले दायरे से पुरी परिवार का सीधा जुड़ाव था।
MIT की जांच रिपोर्ट्स में मिलर्ड का नाम एप्स्टीन से जुड़े फंडरेजिंग में पहले भी आ चुका है। एक भारतीय मंत्री की बेटी के साथ उनकी पार्टनरशिप महज संयोग नहीं लगती, बल्कि यह एक ऐसे नेटवर्क का हिस्सा दिखती है जहाँ प्रभावशाली लोग एक-दूसरे को फायदा पहुंचाते हैं। यहाँ भी 30 अज्ञात निवेशक की भूमिका शक पैदा करती है कि पैसा कहाँ से आ रहा था।
2400 करोड़ की फंडिंग और पारदर्शिता पर चुप्पी
2400 करोड़ रुपये की भारी-भरकम फंडिंग की बात 30 अज्ञात निवेशक से निकलकर आई है, जो इस घोटाले का सबसे बड़ा और अनसुलझा सवाल है। पुरी या हिमायनी ने कभी भी इन निवेशकों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। भ्रष्टाचार से जूझते भारत में यह पूरी तरह अस्वीकार्य है।
अगर ये निवेशक एप्स्टीन-मिलर्ड नेटवर्क से जुड़े हैं, तो यह फंडिंग विदेशी प्रभाव या मनी लॉन्ड्रिंग का जरिया हो सकती है। कांग्रेस और विपक्षी दलों द्वारा बार-बार नाम मांगे जाने पर भी हरदीप पुरी की चुप्पी शक को और गहरा करती है। क्या “मेक इन इंडिया” जैसे राष्ट्रीय अभियान एलीट कनेक्शंस के जरिए विदेशी हेरफेर का शिकार हो रहे हैं? यह भारत की आर्थिक संप्रभुता पर एक बड़ा प्रहार है।
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भाई-भतीजावाद और पद के दुरुपयोग के पुख्ता सबूत
नवंबर 2014 का वह ईमेल, जिसमें पुरी ने हॉफमैन और एप्स्टीन को कॉपी करते हुए अपनी बेटियों का जिक्र किया, घोर भाई-भतीजावाद की बू देता है। वे इसे ‘डिजिटल इंडिया’ का प्रचार बताते हैं, लेकिन इसकी टाइमिंग देखिए—रिटायरमेंट के बाद और बीजेपी जॉइन करने के बाद, लेकिन मंत्री बनने से ठीक पहले।
एप्स्टीन द्वारा पुरी को “Your man in India” कहना एक तरह के ‘क्विड प्रो क्वो’ (Quid Pro Quo) मामले को दर्शाता है। ईमेल्स से यह भी पता चलता है कि पुरी ने एप्स्टीन की असिस्टेंट को भारत का वीजा दिलवाने में मदद की थी। यह कोई निर्दोष प्रचार नहीं, बल्कि पद और प्रभाव का इस्तेमाल कर परिवार को लाभ पहुँचाना है, जो मोदी सरकार के भ्रष्टाचार-विरोधी दावों की पोल खोलता है।
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वैश्विक शिकारियों के नेटवर्क में फंसा भारतीय अभिजात वर्ग
इस घोटाले के व्यापक निहितार्थ बेहद चिंताजनक हैं। एप्स्टीन फाइल्स में अंबानी और पुरी जैसे बड़े भारतीय नामों का आना यह साबित करता है कि भारत का अभिजात वर्ग वैश्विक शिकारियों के नेटवर्क में गहराई तक फंसा हुआ है।
पुरी के संपर्कों को केवल “पेशेवर” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि 62 ईमेल्स और एप्स्टीन के टाउनहाउस में हुई मुलाकातें बताती हैं कि यह रिश्ता बहुत गहरा था।
टैक्स हेवन और शेल कंपनियों के जरिए अज्ञात फंडिंग का खेल अंततः आम भारतीयों की जेब पर भारी पड़ता है। 30 अज्ञात निवेशक के इस रहस्य ने यह दिखा दिया है कि पारदर्शिता की कमी किस तरह लोकतंत्र को कमजोर कर रही है।
सत्ता का रसूख और जवाबदेही की असली परीक्षा
हरदीप पुरी को अब इस मामले पर चुप रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्हें उन 30 अज्ञात निवेशक के नाम सार्वजनिक करने चाहिए और ‘Realm Partners’ की फंडिंग का पूरा ब्योरा देश के सामने रखना चाहिए। एप्स्टीन-मिलर्ड कनेक्शन पर टालमटोल या इसे “पेशेवर” कहना अब नहीं चलेगा।
यह मामला सिर्फ एक परिवार या एक मंत्री का नहीं है, बल्कि यह भारत की शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही की असली परीक्षा है। अगर इसे अनसुलझा छोड़ दिया गया, तो “डिजिटल इंडिया” जैसे सपने केवल एलीट वर्ग के लिए “मेक फॉर एलीट” बनकर रह जाएंगे, जहाँ न्याय केवल शक्तिशालियों का विशेषाधिकार होगा।
क्या सामने आएगा 5700 करोड़ का सच?
अंत में, भारत की जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उनके देश के एक कद्दावर मंत्री के तार एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी से कैसे जुड़े थे। एप्स्टीन कांड में मोदी सरकार के मंत्रियों का नाम आना और उसके बाद की चुप्पी डरावनी है। क्या भारत वाकई “गुंडों और लूटेरों का स्वर्ग” बनता जा रहा है जैसा कि कुछ आलोचक कह रहे हैं?
बेशर्मी से आरोपों को राजनीतिक बताना अब पर्याप्त नहीं है। अब समय आ गया है कि इस पूरे वित्तीय मकड़जाल की स्वतंत्र जांच हो और सच सामने आए। बिना जवाबदेही के लोकतंत्र केवल एक खोखला शब्द बनकर रह जाएगा और शक्तिशाली लोग इसी तरह बिना किसी पछतावे के फलते-फूलते रहेंगे।
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