भारत में बंगाली मुसलमान का उत्पीड़न और संघर्ष!
बंगाली मुसलमानों की वर्तमान स्थिति
आज भारत में एक बंगाली मुसलमान होना जटिल अनुभव है। नागरिकता संकट सबसे बड़ी चिंता बन गया है। झुग्गी बस्तियों से जबरन बेदखली बढ़ रही है। बंगाली बोलने वालों को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। ‘होल्डिंग सेंटर‘ का डर वास्तविकता बनता जा रहा है। शहरी विकास में योगदान देने वाले मजदूर अब ‘घुसपैठिये’ कहलाते हैं। इससे बंगाली मुसलमानों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक विरासत
1947 के बंगाल विभाजन ने बंगाली मुसलमानों को गहरा आघात पहुँचाया। अविभाजित बंगाल में उनकी समृद्ध सांस्कृतिक भूमिका थी। विभाजन के बाद पश्चिम बंगाल में उनका प्रभाव कम हो गया। कई प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी पूर्वी पाकिस्तान चले गए। इससे समुदाय की राजनीतिक आवाज़ कमज़ोर हुई। आज भी बंगाली मुसलमान सांस्कृतिक पहचान के संकट से जूझते हैं। उनकी वफादारी पर अकारण सवाल उठाए जाते हैं।
नागरिकता संकट: कागजों का जाल
बंगाली मुसलमानों के लिए दस्तावेज़ी संकट सबसे विकट समस्या है। एनआरसी और सीएए ने इस भय को बढ़ा दिया है। नामों की वर्तनी गलत होना आम बात हो गई है। पुराने कागजात गुम या अधूरे मिलते हैं। मृत पूर्वजों के नाम सुधारना लगभग असंभव है। असम में हज़ारों बंगाली मुसलमान नागरिकता खो चुके हैं। कागजात जुटाने की कोशिश में जीवन बर्बाद हो रहे हैं। प्रशासनिक उदासीनता इस समस्या को बढ़ा रही है।
साम्प्रदायिक निशाने पर बंगाली मुसलमान
भारत में साम्प्रदायिक ताकतें अक्सर बंगाली मुसलमानों को निशाना बनाती हैं। उन्हें ‘बाहरी’ या ‘घुसपैठिया’ करार दिया जाता है। राजनीतिक भाषणों में उनके खिलाफ जहर उगला जाता है। बिहार का एसआईआर या ‘वोटबंदी’ नया खतरा बन गया है। यह एनआरसी का छद्म रूप प्रतीत होता है। प्रवासी बंगाली मुसलमान मजदूर सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। कई को बांग्लादेश की ओर धकेल दिए जाने की घटनाएँ हुई हैं। साम्प्रदायिक हिंसा का खतरा सदैव मंडराता रहता है।
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आर्थिक पिछड़ापन और शैक्षिक अवसर
बंगाली मुसलमानों की आर्थिक स्थिति चिंताजनक है। शिक्षा और रोजगार में भारी पिछड़ापन दिखता है। सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 6.8% है। इसका मुख्य कारण शैक्षिक अवसरों की कमी है। गरीबी के चलते बच्चे श्रम में धकेल दिए जाते हैं। कुशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों तक पहुँच नगण्य है। आर्थिक विषमता ने समस्या को गहरा किया है। कोविड-19 ने इस समुदाय को विशेष रूप से प्रभावित किया। रोजगार छूटने से प्रवासी संकट बढ़ा है।
महिलाओं की दोहरी चुनौतियाँ
बंगाली मुसलमान महिलाएँ दोहरे संकट का सामना करती हैं। उनकी पहचान दस्तावेजों में अक्सर विकृत की जाती है। शादीशुदा महिलाओं के नाम में जबरन ‘बीबी’ जोड़ा जाता है। विधवाओं को ‘बेवा’ कहकर लेबल किया जाता है। यह पितृसत्तात्मक रवैया उनकी व्यक्तिगत पहचान मिटाता है। आधार केंद्रों पर सुधार प्रक्रिया जानबूझकर धीमी की जाती है। एक छोटी वर्तनी गलती जीवन बर्बाद कर सकती है। यह हवाई यात्रा से लेकर नागरिकता तक छीन सकती है।
प्रशासनिक पूर्वाग्रह और भाषाई अवरोध
नामों की गलतियाँ सिर्फ लापरवाही नहीं हैं। यह गहरी उपेक्षा और पूर्वाग्रह को दर्शाती हैं। अरबी नामों को समझने की प्रामाणिक कोशिश नहीं होती। डेटा संग्रह का काम ठेकेदारों को दिया जाता है। वे अक्सर अधिक काम के दबाव में गलतियाँ करते हैं। स्थानीय प्रशासन में बंगाली मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। भाषाई अवरोध भी समस्याएँ बढ़ाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में दस्तावेज़ीकरण प्रक्रिया और जटिल है।
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सामाजिक एकीकरण की बाधाएँ
बंगाली मुसलमानों के सामाजिक एकीकरण में गंभीर रुकावटें हैं। उन्हें अक्सर ‘अन्य’ के रूप में देखा जाता है। सांस्कृतिक समारोहों में उनकी भागीदारी सीमित होती है। आवासीय बस्तियों में अलगाव बढ़ रहा है। मीडिया प्रस्तुतियाँ नकारात्मक रूढ़िवादी बढ़ाती हैं। युवा पीढ़ी पहचान के संकट से जूझ रही है। शैक्षणिक संस्थानों में सूक्ष्म भेदभाव होता है। इससे समुदाय में हताशा की भावना पैदा होती है।
संवैधानिक अधिकार और वास्तविकता का अंतर
संविधान समान अधिकारों का आश्वासन देता है। परंतु बंगाली मुसलमानों के लिए यह सपना सा लगता है। न्यायिक प्रक्रियाएँ लंबी और खर्चीली हैं। कानूनी सहायता तक पहुँच सीमित है। पुलिस व्यवहार अक्सर पूर्वाग्रहग्रस्त होता है। मौलिक अधिकारों का हनन आम बात है। सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। इस असमानता ने विश्वास को गंभीर ठेस पहुँचाई है।
समाधान की राह: सामूहिक प्रयास
बंगाली मुसलमानों की समस्याओं के समाधान संभव हैं। सबसे पहले दस्तावेज़ीकरण प्रक्रिया सरल बनाना जरूरी है। स्थानीय भाषा जानने वाले कर्मचारी तैनात किए जाएँ। नाम सुधार केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए। शिक्षा और रोजगार में आरक्षण पर विचार हो। सामुदायिक नेतृत्व का विकास अति आवश्यक है। युवाओं को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करें। मीडिया को संवेदनशील रिपोर्टिंग करनी चाहिए। साम्प्रदायिक भाषणों पर कड़ी कार्रवाई हो।
आशा की किरण: समुदाय की लचीलापन
इन चुनौतियों के बावजूद बंगाली मुसलमान लचीले हैं। उनकी सांस्कृतिक विरासत समृद्ध है। साहित्य और कला में उनका योगदान उल्लेखनीय है। युवा पीढ़ी शिक्षा पर जोर दे रही है। सामाजिक संगठन सामुदायिक सहयोग बढ़ा रहे हैं। छोटे व्यवसायों में उनकी भागीदारी बढ़ी है। धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ गठबंधन हो रहे हैं। ये संकेत भविष्य के प्रति आशा जगाते हैं।
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निष्कर्ष: एकता की आवश्यकता
भारत की विविधता इसकी ताकत है। बंगाली मुसलमान इसका अभिन्न अंग हैं। उनकी चुनौतियाँ राष्ट्रीय चिंता का विषय होनी चाहिए। समावेशी नीतियों से ही समाधान संभव है। सामूहिक प्रयासों से ही बदलाव आएगा। एक मजबूत लोकतंत्र सभी की आवाज सुनता है। भारत को अपने हर नागरिक को गरिमा देनी होगी।



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