वसई इमारत त्रासदी: बिल्डर-अधिकारी सांठगांठ ने ली 17 जानें,
महाराष्ट्र के पालघर जिले के वसई इलाके में स्थित रमाबाई अपार्टमेंट का आंशिक रूप से ढहना सिर्फ एक इमारत का हादसा नहीं था, बल्कि यह अवैध निर्माण और बिल्डर-अधिकारी सांठगांठ के खतरनाक खेल का एक दर्दनाक अंजाम था। सोमवार, 25 अगस्त की देर रात हुए इस हादसे ने 17 जिंदगियों को लील लिया और कई परिवारों को तबाह कर दिया। यह घटना उस समय हुई जब इमारत में रहने वाले लोग अपने घरों में सो रहे थे, जबकि चौथी मंजिल पर एक साल की बच्ची का जन्मदिन मनाया गया था। यह हादसा उन सभी के लिए एक चेतावनी है जो मुंबई और उसके आसपास बेतरतीब ढंग से हो रहे अवैध निर्माणों की अनदेखी कर रहे हैं।
यह त्रासदी एक छोटे से परिवार के लिए विशेष रूप से दुखद थी। उत्कर्षा, ओंकार, और आरोही जोविल, जिन्होंने अपनी बेटी के पहले जन्मदिन का जश्न मनाया था, हादसे में अपनी जान गंवा बैठे। जन्मदिन की पार्टी खत्म होने के कुछ ही देर बाद, जब पूरा परिवार सो रहा था, इमारत ढह गई और वे मलबे में दब गए। इस घटना में मंथन शिंदे और उनके माता-पिता जैसे कुछ लोग चमत्कारिक रूप से बच गए। मंथन ने अपनी सूझबूझ से बचाव दल को अपने और अपने माता-पिता के स्थान की जानकारी दी, जिससे उनकी जान बचाई जा सकी। दूसरी ओर, गुजरात से राखी बांधने आए भाई-बहन दीपेश और दीपाली सोनी और उत्तराखंड से आए तीन दोस्त दीपक बोरा, हरीश बिष्ट, और गोविंद रावत, जो एक साथ रह रहे थे, भी इस हादसे के शिकार हो गए।
बचाव कार्य में देरी और लोगों का आक्रोश
हादसे के तुरंत बाद, वसई विरार नगर निगम (VVMC) और एनडीआरएफ की टीमें मौके पर पहुंचीं। हालांकि, घटनास्थल तक पहुंचने का रास्ता बेहद संकरा होने के कारण बचाव कार्य में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। अधिकारियों को जेसीबी जैसी भारी मशीनों को लाने के लिए आस-पास के कुछ चाल घरों को गिराना पड़ा, जिससे बचाव अभियान में देरी हुई। इस देरी ने पीड़ितों के परिवारों और स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश भर दिया, क्योंकि उनका मानना है कि समय पर कार्रवाई होने से और भी जिंदगियां बचाई जा सकती थीं। एक अधिकारी ने बचाव कार्य में देरी का कारण संकरी गलियों और दो अन्य इमारतों से रास्ता अवरुद्ध होना बताया।
जवाबदेही पर सवाल: बिल्डर गिरफ्तार, अधिकारी बेफिक्र
इस त्रासदी के बाद, पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए इमारत के डेवलपर, 48 वर्षीय नितल गोपीनाथ साने को गिरफ्तार कर लिया। साने ने 2008 में इस चार मंजिला इमारत का निर्माण किया था, जिसमें 54 फ्लैट और चार दुकानें थीं। आरोप है कि यह इमारत बिना किसी सरकारी अनुमति के बनाई गई थी और इसमें घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया था। साने पर महाराष्ट्र क्षेत्रीय नगर नियोजन अधिनियम (MRTP) की धारा 52, 53, 54 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक अवैध इमारत 13 साल तक कैसे खड़ी रही और उस पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? बिल्डर-अधिकारी सांठगांठ ने इस अवैध निर्माण को सालों तक फलने-फूलने दिया। वीवीएमसी के अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि उन्होंने डेवलपर को नोटिस भेजा था, लेकिन कोई तकनीकी ऑडिट नहीं कराया गया था। वीवीएमसी के अतिरिक्त आयुक्त दीपक सावंत ने कहा कि हर 30 साल में या स्पष्ट क्षति होने पर संरचनात्मक ऑडिट अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में ऐसी कोई रिपोर्ट जमा नहीं की गई। स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप का खेल है और असली बिल्डर-अधिकारी सांठगांठ अभी भी जारी है।
एक स्थानीय नेता ने भी अधिकारियों पर बिल्डरों को संरक्षण देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि दोषी केवल बिल्डर नहीं हैं, बल्कि वे अधिकारी भी हैं जिन्होंने इस तरह के अवैध निर्माणों को अनुमति दी। यह त्रासदी पूरे समुदाय के लिए एक दर्दनाक सबक है और यह सवाल छोड़ जाती है कि क्या प्रशासन अगली आपदा का इंतजार कर रहा है? वीवीएमसी ने विस्थापित निवासियों के लिए आश्रय और भोजन की व्यवस्था की है, लेकिन यह त्रासदी की भयावहता को कम नहीं कर सकता। जब तक बिल्डर-अधिकारी सांठगांठ पर पूरी तरह से नकेल नहीं कसी जाती, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।



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