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नाविका कुमार डिबेट के शो में राहुल की यात्रा पर बहस, नेपाल से तुलना क्यों?

नाविका कुमार डिबेट

पत्रकारिता का नाम मात्र का ढाँचा बन चुका नाविका कुमार डिबेट शो, अब पूरी तरह से सत्ताधारी दल की प्रचार मशीनरी में तब्दील हो चुका है। हाल ही में इस शो में विवेक श्रीवास्तव जैसे प्रवक्ताओं को आमंत्रित कर राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ के नारों को नेपाल के हालिया तख्तापलट से जोड़ा गया। यह न केवल तथ्यों का घोर अपमान है, बल्कि एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा भी प्रतीत होता है।

राहुल गांधी की यात्रा, जो लोकतंत्र की रक्षा और ‘वोट की चोरी‘ के खिलाफ थी, उसके नारे जैसे “वोट चोर, गद्दी छोड़” ने लाखों लोगों को जोड़ा। लेकिन नाविका कुमार जी इसे नेपाल का “डर” बताकर मोदी विरोधियों की मंशा पर सवाल उठाती हैं। सवाल यह है: क्या यह पत्रकारिता है या फिर सत्ता के इशारों पर नाचना?

नेपाल का विद्रोह और राहुल की यात्रा: दो अलग-अलग घटनाएँ

नेपाल में जनता ने भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया बैन के खिलाफ विद्रोह किया, जहां 22 से अधिक मौतें हुईं और संसद तक को आग लगाई गई। इसके विपरीत, भारत में राहुल की यात्रा ने “वोट चोर, गद्दी छोड़” जैसे नारों के साथ एक लोकतांत्रिक आंदोलन चलाया, जो शांतिपूर्ण था। यह हिंसक तख्तापलट की साजिश नहीं थी। नाविका कुमार को शायद याद दिलाना पड़े कि नेपाल का तख्तापलट यात्रा खत्म होने के बाद हुआ, और इसका राहुल गांधी से कोई सीधा संबंध नहीं है।

यह उनकी कल्पना का जाल मात्र है। राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा अगस्त 2025 में बिहार से शुरू हुई और 16 दिनों में 1,300 किलोमीटर तय कर 25 जिलों को कवर किया। यह एक शांतिपूर्ण जन-जागरण था, जिसमें ईवीएम और चुनावी धांधली के खिलाफ आवाज उठाई गई। इस यात्रा को नेपाल के हिंसक विद्रोह से जोड़ना बौद्धिक दिवालियापन है।

नेपाल में हिंसा का असली कारण: सरकार की दमनकारी नीतियाँ

नेपाल में जेन-जेड युवाओं ने भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सोशल मीडिया बैन के खिलाफ सड़कों पर उतरकर प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। वहाँ संसद और सरकारी भवनों को आग लगाई गई। इस हिंसा की जड़ें सितंबर 2025 में हुए सोशल मीडिया बैन में थीं, जब सरकार ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया। यह बैन भ्रष्टाचार उजागर करने वाले वीडियोज को दबाने की कोशिश थी, जहां राजनेताओं के बच्चों की लग्जरी लाइफ को आम जनता की गरीबी से जोड़ा गया था।

इसके परिणामस्वरूप, काठमांडू की सड़कों पर हिंसा भड़की, 22 मौतें हुईं, और ओली को इस्तीफा देना पड़ा। इन घटनाओं का राहुल गांधी की यात्रा से कोई लेना-देना नहीं है। नाविका कुमार जैसे एंकरों को लगता है कि विपक्ष के नारे ही सब कुछ भ्रष्ट कर देते हैं। हकीकत यह है कि नेपाल की जनता ने सत्ता की पक्षधर मीडिया को सबक सिखाया।

भारत में भी मीडिया सत्ता के इशारों पर नाच रही है, जनता के दर्द को नजरअंदाज कर विपक्ष को बदनाम करने में लगी है। क्या नाविका जी को डर नहीं लगता कि असली डर तो सत्ता की असीमित ताकत का है, जो मीडिया को भी गुलाम बना चुकी है?

क्या भारतीय मीडिया को नेपाल से सबक सीखना चाहिए?

नाविका कुमार को डर है कि नेपाल जैसा हिंसक आंदोलन भारत में न हो जाए, और यह डर जायज लगता है, लेकिन वह कारण गलत समझ रही हैं। नेपाल में युवाओं ने 20.8% बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आर्थिक असमानता के खिलाफ विद्रोह किया। भारत में भी महंगाई, बेरोजगारी और संस्थागत भ्रष्टाचार चरम पर है, लेकिन मीडिया इसे छिपाने में लगी है। राहुल गांधी की यात्रा ने तो जनता को जागृत किया, लेकिन सत्ता समर्थक मीडिया इसे खतरा बताकर डर फैला रही है।

आपका डर इसलिए जायज है क्योंकि भारतीय मीडिया का सरोकार जनता से नहीं, सत्ताधारियों से है। वे जनता के मुद्दों, जैसे ईवीएम की पारदर्शिता या “आर्थिक न्याय” को दबाते हैं, और विपक्ष को नेपाल का भूत दिखाते हैं। लेकिन याद रखें, नेपाल की जनता ने सत्ता की चाटुकार मीडिया को सबक सिखाया, आग लगाकर। भारत में अगर ऐसा हुआ, तो जिम्मेदार आप जैसे एंकर होंगे, जो सत्य को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। नाविका कुमार डिबेट जैसे शो जनता को गुमराह कर रहे हैं।

मीडिया की जिम्मेदारी और भविष्य का डर

यह डर लाज़मी है क्योंकि भारत की मीडिया सत्ता की कठपुतली बनी हुई है, जहां नाविका कुमार जैसे एंकर विपक्ष को बदनाम करने के लिए झूठे नैरेटिव गढ़ते हैं। राहुल गांधी की यात्रा लोकतंत्र की रक्षा के लिए थी, लेकिन इसे तख्तापलट से जोड़ना सत्ता की हताशा दिखाता है। नेपाल का उदाहरण लेते हुए सोचिए, वहां जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई, यहां भी जनता जाग रही है।

अगर मीडिया ने अपना कर्तव्य न निभाया, तो हिंसक आंदोलन का बीज बोने वाले वे खुद होंगे। नाविका कुमार डिबेट पर इस तरह की बहसें पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों को खोखला कर रही हैं। नाविका जी, डरिए मत, सुधर जाइए, जनता के प्रति निष्ठा अपनाइए, वरना नेपाल का सबक भारत में भी दोहराया जा सकता है, और तब सत्ता समर्थक मीडिया सबसे पहले निशाने पर होगा। यह तीखी सच्चाई है, जो पत्रकारिता को बचाने के लिए जरूरी है।

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