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“बिहार में कॉर्पोरेट लूट: अदाणी-मोदी गठजोड़ से किसान परेशान”

अदाणी-मोदी गठजोड़

बिहार की धरती पर एक बार फिर कॉर्पोरेट लूट का काला अध्याय लिखा जा रहा है, जहाँ अदाणी-मोदी गठजोड़ ने एक सुनियोजित साजिश के तहत राज्य की संसाधनों को निजी साम्राज्य को भेंट चढ़ा दिया है। पीरपैंती में 1020.60 एकड़ उपजाऊ जमीन अदाणी पावर को मात्र एक रुपये प्रति वर्ष के टोकन अमाउंट पर 33 साल के लिए सौंप दी गई है।

यह वही जमीन है जिसे 856 किसानों से जबरन अधिग्रहित किया गया था, और मुआवजे का एक बड़ा हिस्सा आज भी लंबित पड़ा है। बिहार सरकार की यह ‘उदारता’ न केवल किसानों की आजीविका पर डाका है, बल्कि यह साबित करती है कि राज्य की ऊर्जा सुरक्षा का बहाना बनाकर किस तरह से निजी हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।

गोड्डा से पीरपैंती तक: जमीन लूट का पुराना हथकंडा

पीरपैंती का यह सौदा बिहार के पहले निजी थर्मल पावर प्रोजेक्ट के नाम पर हो रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह अदाणी-मोदी गठजोड़ की भ्रष्टाचार की नई ऊंचाई है। यह जमीन लूट का पैटर्न अदाणी का पुराना हथकंडा है, जो झारखंड के गोड्डा से लेकर गुजरात तक फैला हुआ है।

गोड्डा में 1363 एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण अदाणी थर्मल पावर ने अदालतों में चुनौती दी, जहाँ किसानों और आदिवासियों को नोटिस और मुआवजे के बिना बेदखल किया गया। वहाँ 551 हेक्टेयर जमीन पर जबरन कब्जा किया गया, जिसमें पुलिस की लाठियाँ, धमकियाँ और मानवाधिकारों का हनन शामिल था।

पीरपैंती में भी यही हो रहा है। हरिनकोल गाँव के किसानों को धमकियाँ दी जा रही हैं, धोखे से कागजात पर साइन करवाए जा रहे हैं और विरोध करने पर गिरफ्तारियाँ हो रही हैं। 900 से अधिक किसानों की मेहनत की फसलें रातोंरात कोयले की भट्टी में झोंक दी जा रही हैं। यह कॉर्पोरेट राजतंत्र है, जहाँ किसान दुश्मन नंबर वन हैं और उनके अधिकारों को कुचला जा रहा है।

पर्यावरण पर गहराता संकट और चुनावी स्टंट की हकीकत

अदाणी की यह लूट सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण की बलि चढ़ाने वाली है। पीरपैंती में हजारों आम, शीशम और अन्य लकड़ी के पेड़ काटे जा रहे हैं, जिन्हें सरकार ‘बंजर’ बताकर झूठ बोल रही है। यह कॉर्पोरेट राजतंत्र का एक और काला पहलू है, जहाँ प्रकृति को सिर्फ मुनाफे के लिए बलि चढ़ाया जा रहा है।

10 लाख से अधिक पेड़ कटने की आशंका है, जिससे गंगा के किनारे की जैव विविधता खतरे में पड़ जाएगी।

बिहार सरकार का यह फैसला चुनावी स्टंट से प्रेरित लगता है, जहाँ 2025 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अदाणी को यह ‘गिफ्ट’ सौंपा गया। 2400 मेगावाट का यह अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल प्लांट 29,000 करोड़ के निवेश का दावा करता है, लेकिन सच्चाई यह है कि बिहार के किसानों को न तो नौकरियाँ मिलेंगी—जो निर्माण में 10-12 हजार और संचालन में मात्र 3000 बताई जा रही हैं—और न ही सस्ती बिजली।

यह प्लांट कोयले की भूख बढ़ाएगा, जो पहले से ही पर्यावरण को जहर घोल रहा है। अदाणी की कोयला खदानें खुद हैं और यह अदाणी-मोदी गठजोड़ कोयले के व्यापार को और बढ़ावा देगा।

किसानों की आवाज और लोकतंत्र पर प्रहार

इस पूरी प्रक्रिया में किसानों के रोजगार, उनकी फसलें, उनके बच्चे और उनकी विरासत, सब कोयले की धूल में दफन हो जाएंगे। यह विकास नहीं, बल्कि विनाश का नंगा नाच है, जहाँ नीतीश-मोदी की जोड़ी अदाणी के लिए रास्ता साफ कर रही है। पर्यावरणीय तबाही तो इस लूट का सबसे काला पहलू है।

यह प्लांट ऑस्ट्रेलिया के कार्माइकल माइन से आयात होने वाले कोयले पर निर्भर होगा, जिसके लिए वहाँ भी आदिवासियों को बेदखल किया गया। बिहार में पहले से प्रदूषण की मार झेल रहे लोग अब सांस की बीमारियों, पानी के जहर और मिट्टी की बंजरता का शिकार होंगे। अदाणी का इतिहास, मिर्जापुर से गोड्डा तक, वन्यजीवों को खतरे में डालने का है, जहाँ पर्यावरणीय मंजूरी बिना पूरी प्रक्रिया के ली गई। सरकार का ‘लो-एमिशन’ का दावा झूठा है, क्योंकि कोयला जहर का स्रोत है।

अंत में, सवाल यह है कि 900 किसानों का क्या होगा? उनकी आवाज दबाई जा रही है, उनके विरोध को पीएम के वर्चुअल चैट में बोलने की कोशिश पर गिरफ्तारियाँ हो रही हैं। यह लूट न केवल आर्थिक अन्याय है, बल्कि लोकतंत्र पर करारा प्रहार है।

अदाणी-मोदी गठजोड़ बिहार को लूट रहा है, और अगर चुप्पी बनी रही, तो अगला नंबर आपका गाँव हो सकता है। किसान आंदोलन की तरह, अब समय है एकजुट होकर इस लूट के खिलाफ खड़े होने का, वरना बिहार की मिट्टी कोयले में बदल जाएगी, और किसानों की पीढ़ियाँ भुखमरी में सड़ेंगी।

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