सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश:बड़े मामलों पर अदालत की ऐतिहासिक टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 पर एक संतुलित और महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस कानून की कुछ विवादास्पद धाराओं पर आंशिक रोक लगाई है, जिसे अप्रैल 2025 में संसद ने पारित किया था और 8 अप्रैल को लागू किया गया था।
यह आदेश मुस्लिम समुदाय के धार्मिक स्वायत्तता के अधिकारों की रक्षा करते हुए, संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना को भी मजबूत करता है। याचिकाकर्ताओं, जिनमें असदुद्दीन ओवैसी, जमीअत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड शामिल हैं, ने तर्क दिया था कि यह संशोधन अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन के अधिकार का उल्लंघन करता है।
वहीं, केंद्र सरकार ने इसे वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता और दुरुपयोग रोकने का एक साधन बताया था। कोर्ट ने न तो पूरे कानून पर रोक लगाई और न ही इसे पूरी तरह से मान्य ठहराया, बल्कि बोर्ड संरचना, जिलाधिकारी (डीएम) की शक्तियों और पांच वर्ष की इस्लाम अभ्यास की शर्त पर सटीक हस्तक्षेप किया।
यह दिखाता है कि न्यायपालिका विधायी अतिक्रमण को सीमित रखते हुए संतुलन बनाए रख रही है।
बोर्ड संरचना और धार्मिक पहचान का संरक्षण
राज्य वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या तीन और केंद्रीय वक्फ काउंसिल में चार से अधिक न रखने का निर्देश एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है। यह संशोधन के मूल उद्देश्य “समावेशिता” को बनाए रखते हुए मुस्लिम बहुमत सुनिश्चित करता है। संशोधन ने गैर-मुस्लिमों को बोर्डों में शामिल करने का प्रावधान किया था, जिसे केंद्र ने ‘सचेतनता और पारदर्शिता’ के लिए जरूरी बताया था, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसे धार्मिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का खतरा माना था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक्स-ऑफिशियो अधिकारी जहां संभव हो, मुस्लिम समुदाय से हों, जो बोर्ड के धार्मिक चरित्र को सुरक्षित रखता है। यह फैसला हिंदू या सिख धार्मिक बोर्डों की तुलना में वक्फ की विशिष्टता को मान्यता देता है, जहां सदस्यता धार्मिक पहचान से बंधी रहती है।
विश्लेषण में, यह प्रावधान संशोधन की ‘माइक्रोस्कोपिक माइनॉरिटी’ वाली दलील को स्वीकार करता है, लेकिन इसे सीमित रखकर संभावित सांप्रदायिक तनाव को टालता है। यह कदम अप्रैल-मई 2025 में हुए विरोध प्रदर्शनों (जैसे हैदराबाद में लाइट्स-आउट प्रोटेस्ट) के बाद विशेष रूप से प्रासंगिक है।
कुल मिलाकर, यह संतुलन दिखाता है कि समावेशिता का मतलब धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिए।
कार्यपालिका के अधिकारों पर न्यायिक लगाम
जिलाधिकारी (कलेक्टर) को वक्फ संपत्ति को सरकारी संपत्ति घोषित करने का अधिकार देने वाली धारा पर पूर्ण रोक लगाना सेपरेशन ऑफ पावर्स के सिद्धांत का सबसे मजबूत बचाव है, जो कार्यपालिका को न्यायिक भूमिका निभाने से रोकता है। संशोधन ने कलेक्टर को विवादित संपत्तियों की जांच और निर्णय का अधिकार दिया था, जिसे केंद्र ने ‘अनधिकृत दावों पर अंकुश’ के रूप में पेश किया।
लेकिन, सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश इसे नागरिक अधिकारों पर अतिक्रमण मानता है—कोर्ट ने कहा कि ‘कार्यपालिका को नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों का फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’ यह निर्णय ट्रिब्यूनल या अदालत द्वारा शीर्षक तय होने तक वक्फ संपत्ति पर कोई तीसरे पक्ष के अधिकार न सृजित करने का भी आदेश देता है, जो ‘वक्फ बाय यूजर’ या कोर्ट द्वारा घोषित संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
विश्लेषण से पता चलता है कि यह प्रावधान संशोधन के मूल दोष, जैसे ‘क्रिपिंग एक्विजिशन’ को संबोधित करता है, जहां बिना न्यायिक प्रक्रिया के सरकारी हस्तक्षेप बढ़ सकता था। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों (जैसे शिरूर मठ मामले) की रोशनी में, यह आदेश अनुच्छेद 14 (समानता) और 300A (संपत्ति अधिकार) की रक्षा करता है, और भाजपा शासित राज्यों (जैसे असम, राजस्थान) की हस्तक्षेप याचिकाओं को भी झटका देता है।
धार्मिक अभ्यास की शर्त पर भी रोक
वक्फ संपत्ति घोषित करने से पहले पांच वर्ष तक इस्लाम का अभ्यास करने की शर्त पर रोक, जब तक राज्य नियम न बनें, एक प्रगतिशील कदम है, जो मनमानी और धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन को रोकता है। संशोधन की धारा 3(R) ने इस शर्त को अनिवार्य किया था, जिसे ओवैसी जैसे नेताओं ने ‘भेदभावपूर्ण’ बताया था, जबकि केंद्र ने इसे ‘प्रैक्टिसिंग मुस्लिम’ की परिभाषा के रूप में बचाव किया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश कहता है कि बिना ठोस परीक्षण के यह मनमानी पैदा करेगा, इसलिए नियम बनने तक इसे निलंबित रखा जाए। यह फैसला अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) की रक्षा करता है, और ट्राइबल मुस्लिमों के अधिकारों (धारा 3E) को भी प्रभावित होने से बचाता है।
विश्लेषण में, यह प्रावधान संशोधन की ‘दुरुपयोग रोकने’ वाली मंशा को मान्यता देता है, लेकिन इसे न्यायोचित बनाए बिना लागू होने से रोकता है, एक ऐसा संतुलन जो 1995 के मूल अधिनियम की भावना को पुनर्स्थापित करता है। इससे साफ है कि न्यायपालिका विधायी उत्साह को संयमित कर रही है, खासकर जब विपक्ष ने इसे ‘मुस्लिम-विरोधी’ करार दिया था।
पारदर्शिता और अंतिम सुनवाई का इंतजार
हालांकि पंजीकरण संबंधी मुद्दों पर कोई रोक न लगाना एक सकारात्मक संकेत है, जो संशोधन की पारदर्शिता वाली धारा को वैध ठहराता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश समग्र रूप से मुस्लिम समुदाय के लिए राहत का स्रोत है। कोर्ट ने कहा कि 1995 से 2013 तक पंजीकरण की प्रथा चली आ रही थी, इसलिए यह नया नहीं है।
इससे वक्फ बोर्डों को संपत्तियों का डिजिटल रिकॉर्ड रखने में मदद मिलेगी। लेकिन अंतिम सुनवाई संवैधानिक बेंच में होने से यह स्पष्ट है कि ये मुद्दे गहन जांच के इंतजार में हैं। विश्लेषण से उभरता है कि यह आदेश न केवल अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती भी दर्शाता है, जहां संसद का कानून सर्वोच्च नहीं, संविधान सर्वोपरि है।
एआईएमपीएलबी जैसे संगठनों ने इसे ‘संतोषजनक’ बताया, जबकि भाजपा ने ‘सार्वजनिक हित’ का दावा किया; लेकिन वास्तव में, यह फैसला सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देता है। यदि अंतिम फैसला इसी संतुलन को बनाए रखे, तो वक्फ प्रणाली अधिक मजबूत और समावेशी हो सकती है, बिना धार्मिक पहचान को कमजोर किए।



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