महात्मा गांधी हत्या साजिश और नफरत की आंधी: राहुल गांधी को धमकी
आज 2 अक्टूबर 2025, गांधी जयंती, वह दिन है जब हम महात्मा गांधी के अहिंसा, सत्य और समावेशी भारत के सपने को याद करते हैं। लेकिन यह दिन हमें उस काले सच की भी याद दिलाता है कि गांधी की हत्या कोई अचानक घटना नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित साजिश थी, जिसके तार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और हिंदू महासभा से जुड़े थे।
गांधी पर उनके जीवनकाल में छह बार जानलेवा हमले हुए, जिनमें से प्रत्येक में हिंदूवादी संगठनों की भूमिका स्पष्ट थी। 1934 में बम हमले से लेकर 1948 में नाथूराम गोडसे की गोली तक, ये हमले गांधी के सांप्रदायिक सौहार्द और भारत-पाकिस्तान एकता के विचारों को कुचलने की कोशिश थे। आज, जब हम गांधी जयंती मना रहे हैं, हमें यह सवाल पूछना होगा: क्या गांधी के हत्यारों की विचारधारा आज सत्ता के गलियारों में पनप रही है?
गांधी पर पहला हमला: 1934 का वो बमकांड और उभरती नफरत
महात्मा गांधी पर पहला हमला 1934 में हुआ था, जब गांधी पुणे में एक सभा के लिए जा रहे थे। उनके काफिले पर बम फेंका गया, जो गलती से दूसरी गाड़ी पर गिरा। इस हमले में हिंदूवादी संगठनों का हाथ होने की बात सामने आई थी। यह गांधी के खिलाफ बढ़ती नफरत का पहला संकेत था, क्योंकि उनकी अहिंसा और मुस्लिम-हिंदू एकता की बात हिंदू राष्ट्रवादियों को खटकती थी। RSS, जो उस समय तेजी से उभर रहा था, गांधी को ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का प्रतीक मानता था। इस हमले ने साफ कर दिया कि गांधी के विचारों को हिंसा से दबाने की साजिश शुरू हो चुकी थी।
गोडसे का उदय: 1944 से 1946 तक, हत्या के नाकाम प्रयास
1944 में नाथूराम गोडसे ने पहली बार गांधी पर चाकू से हमला करने की कोशिश की। गोडसे, जो RSS का प्रचारक और हिंदू महासभा का सदस्य था, गांधी को भारत के विभाजन का जिम्मेदार मानता था। उसी साल पंचगनी में दूसरा प्रयास हुआ, जब गोडसे और उसके साथियों ने गांधी को मारने की योजना बनाई, लेकिन वह नाकाम रही।
ये घटनाएं महज व्यक्तिगत नफरत नहीं थीं; इनके पीछे RSS के तत्कालीन सरसंघचालक एमएस गोलवलकर की वह विचारधारा थी, जो गांधी को ‘राष्ट्र विरोधी’ करार देती थी। गोलवलकर ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि गांधी को ‘चुप’ करना जरूरी है। यह विचारधारा आज भी जीवित है, जो गांधी के सिद्धांतों को कमजोर करने की लगातर कोशिश कर रही है।
महात्मा गांधी हत्या साजिश को अंजाम देने की अगली कोशिश 1946 में पुणे में हुई, जब गांधी की सभा में बम फेंका गया। इस बार भी साजिश में हिंदूवादी संगठनों की भूमिका थी। इन हमलों का पैटर्न साफ था: गांधी का संदेश हिंदू-मुस्लिम एकता, अहिंसा, और सामाजिक समानता हिंदू राष्ट्रवाद के लिए खतरा बन चुका था। RSS और हिंदू महासभा के नेताओं ने गांधी को ‘देशद्रोही’ करार देकर हिंसा को जायज ठहराया।
30 जनवरी 1948: उदार भारत के विचार की हत्या
1948 में, आखिरकार गोडसे ने 30 जनवरी को गांधी को तीन गोलियां मारकर उनकी हत्या कर दी। यह हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि भारत के उदार और समावेशी विचार की हत्या थी। गांधी की हत्या के बाद RSS पर प्रतिबंध लगा, लेकिन आज वही ताकतें सत्ता में हैं। गांधी की हत्या की साजिश में शामिल लोगों का महिमामंडन आज भी हो रहा है।
गोडसे को ‘वीर’ कहने वाले और मंदिर बनाने की मांग करने वाले लोग खुलेआम घूम रहे हैं। RSS और BJP के कुछ नेताओं ने गोडसे को ‘देशभक्त’ तक कहा है, जो कि बेहद शर्मनाक है। गांधी का भारत, जहां हर धर्म और जाति को बराबरी का हक था, आज ‘हिंदू राष्ट्र’ के नारे में दब रहा है। CAA-NRC जैसे कानून, मॉब लिंचिंग की घटनाएं, और ‘लव जिहाद’ जैसे नफरती जुमले गांधी के सर्वधर्म समभाव को चुनौती दे रहे हैं।
गांधी जयंती पर हमें यह देखना होगा कि उनकी हत्या की विचारधारा आज भी जिंदा है, जो लोकतंत्र को कमजोर कर रही है। इतिहास के इन काले पन्नों को याद करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि गांधी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी अहिंसा और सत्याग्रह ने न केवल भारत को आजादी दिलाई, बल्कि दुनिया को एक नई राह दिखाई।
लेकिन आज, जब हम गांधी जयंती मना रहे हैं, उनकी विरासत को कुचलने की कोशिशें तेज हैं। सत्ता में बैठे लोग गांधी के नाम पर वोट मांगते हैं, लेकिन उनके सिद्धांतों को भूल जाते हैं।
राहुल गांधी को धमकियां: गांधी की विरासत पर नया हमला
गांधी जयंती 2025 का माहौल और भी भारी है, क्योंकि गांधी के की विरासत को आगे बढ़ाने वाले उनके एक अनुयायी राहुल गांधी को खुलेआम हत्या की धमकियां दी जा रही हैं। 26 सितंबर 2025 को केरल BJP प्रवक्ता प्रिंटू महादेव ने लाइव टीवी पर कहा, ‘राहुल गांधी का सीना छलनी हो जाएगा।’ यह धमकी कोई नई बात नहीं है; सितंबर 2024 से BJP नेताओं का यह सिलसिला जारी है।
तरविंदर सिंह मारवाह ने ‘दादी जैसी मौत’ की धमकी दी, रवनीत बिट्टू ने उन्हें ‘आतंकवादी’ कहा, और संजय गायकवाड़ ने जीभ काटने का इनाम रखा। ये धमकियां उस विचारधारा की देन हैं, जो गांधी को गोली मारने वाली थी। राहुल गांधी की न्याय यात्रा और गांधीवादी मूल्यों की बात करने की सजा के रूप में ये धमकियां दी जा रही हैं। यह लोकतंत्र पर हमला है, और गांधी जयंती पर हमें इसे रोकने का संकल्प लेना होगा।
गांधी जयंती 2025 हमें सिर्फ गांधी को याद करने का नहीं, बल्कि उनके विचारों को जिंदा रखने का अवसर देती है। महात्मा गांधी हत्या साजिश और राहुल गांधी पर धमकियां एक ही सिक्के के दो पहलू हैं: “हिंदुत्ववादी नफरत” जो असहमति को हिंसा से दबाना चाहती है।
हमें यह समझना होगा कि गांधी का भारत तभी बचेगा, जब हम उनकी अहिंसा, समानता और सत्य की राह पर चलें। आज का भारत गांधी के सपनों के भारत से अलग होकर भटक रहा है, लेकिन राहुल गांधी जैसे लोग बापू की विरासत को आगे ले जा रहे हैं। गांधी जयंती पर हमारा संकल्प होना चाहिए: नफरत की इस संघी आंधी को रोकें, गांधी के भारत को बचाएं। जय हिंद, जय भारत, महात्मा गांधी अमर रहें, गोडसे मुर्दाबाद!



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