जॉर्जिया क्रांति: वोट चोरी, जन आक्रोश और मोदी सरकार तुलना
मोदी जॉर्जिया तुलना की सड़कों पर उमड़ता जनता का गुस्सा एक आईना है जो लोकतंत्र की नंगी सच्चाई दिखा रहा है। 4 अक्टूबर 2025 को त्बिलिसी में राष्ट्रपति भवन को घेरने वाली भीड़ ने साफ कर दिया कि सत्तारूढ़ जॉर्जियन ड्रीम पार्टी की सत्ता हथियाने की चालें अब बर्दाश्त नहीं होंगी। विपक्षी दलों के बहिष्कार के बीच हुए स्थानीय चुनावों में पार्टी ने कथित तौर पर भारी जीत का दावा किया, लेकिन जनता का आरोप है कि यह जीत वोट चोरी, मशीनों में छेड़छाड़ और संगठित धांधली का नंगा नाच है।
राष्ट्रपति सलोमे ज़ुराबिचविली ने तो इसे “रूसी विशेष अभियान” करार दिया, जो 2024 के संसदीय चुनावों की तरह ही जनादेश को लूटने का प्रयास था। जनता का यह आक्रोश जायज है, क्योंकि ये कथित चुनाव यूरोपीय संघ की ओर बढ़ने की जॉर्जिया की आकांक्षा को कुचलने का एक गहरा षड्यंत्र हैं।
धांधली का सिलसिला: संसदीय चुनाव से स्थानीय चुनाव तक
जॉर्जिया की सियासत में यह धांधली का सिलसिला नया नहीं है; 2024 के संसदीय चुनावों से ही जॉर्जिया की राजनीति में जहर घुला हुआ है। जॉर्जियन ड्रीम पार्टी ने उस चुनाव में 54% वोट का दावा किया था, लेकिन विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने खुलकर वोटर दबाव, बैलेट स्टफिंग और बड़े पैमाने पर हिंसा के आरोप लगाए थे।
स्थानीय चुनावों के विरोध में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछारें और काली मिर्च स्प्रे से हमला किया, जिसमें पांच प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन जनता का जोश कुचला नहीं जा सका। यह सब प्रो-रूसी ताकतों का खेल लगता है, जो यूरोपीय एकीकरण को तोड़ने के लिए चुनावों को हथियार बना रही हैं। सरकार का दावा है कि ये प्रदर्शन “शांतिपूर्ण क्रांति” के खिलाफ हैं, लेकिन सच तो यह है कि सत्ता की भूख में लोकतंत्र को कुर्बान किया जा रहा है।
वैश्विक पैटर्न: जॉर्जिया और भारत में सत्ता का दमन
जॉर्जिया के सत्ताधारियों की मनमानियों की तुलना भारत की मोदी सरकार से की जा सकती है, क्योंकि दोनों ही जगहों पर सत्ता के नशे में ‘वोट चोरी’ की कला को एक तरह से परफेक्ट किया गया है। भारत में विपक्ष ने 2024 के चुनावों में वोटर लिस्ट में फर्जीवाड़ा, डुप्लिकेट वोट और चुनाव आयोग की मिलीभगत के गंभीर आरोप लगाए, ठीक वैसे ही जैसे जॉर्जिया में मल्टीपल वोटिंग और मशीनों की तोड़फोड़ के आरोप लगे हैं।
मोदी जॉर्जिया तुलना में यह स्पष्ट दिखता है कि दोनों देशों की सत्तारूढ़ पार्टियाँ अपने विरोधियों को कुचलने में समान रणनीति अपनाती हैं। मोदी की बीजेपी पर कथित तौर पर मुस्लिम वोटरों को निशाना बनाकर या हटाकर चुनाव जीतने के आरोप लगे, जबकि जॉर्जिया में रूसी समर्थक ड्रीम पार्टी ने यूरोपीय समर्थकों को कुचलने का प्रयास किया।
दोनों सरकारें दमनकारी कानूनों जैसे ‘विदेशी एजेंट कानून’ के जरिए मीडिया और एनजीओ को दबाती हैं, और विरोध को “अराजकता” बताकर कुचलती हैं। लोकतंत्र का ढोंग कर सत्ता हथियाना, यह दुर्भाग्य से एक वैश्विक पैटर्न बन चुका है और मोदी जॉर्जिया तुलना इसे उजागर करती है।
यूरोपीय सपनों पर हमला और तानाशाही के संकेत
जॉर्जिया की जनता का गुस्सा इसलिए उफान पर है क्योंकि यह केवल एक चुनाव की हार नहीं है, बल्कि देश के भविष्य की चोरी की जा रही है। प्रो-रूसी सरकार ने यूरोपीय संघ (ईयू) सदस्यता वार्ता को रोक दिया, और विवादास्पद ‘विदेशी एजेंट कानून’ पारित किया, जो रूस के इसी नाम के दमनकारी कानून की साफ नकल है। विरोधियों को जेल में डालना, मीडिया पर सेंसरशिप लागू करना—यह सब तानाशाही की स्पष्ट निशानियां हैं।
प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन पर हमला करने को मजबूर हुए क्योंकि उन्हें लगा कि उनके संवैधानिक अधिकार छीने जा रहे हैं। यह गुस्सा जॉर्जियाई लोगों की यूरोपीय सपनों को बचाने की लड़ाई है, न कि केवल सत्ता हथियाने की भूख। मोदी जॉर्जिया तुलना यह बताती है कि कैसे लोकलुभावनवाद के नाम पर चुनी हुई सरकारें धीरे-धीरे तानाशाही की ओर बढ़ती हैं, जहाँ चुनाव महज एक औपचारिकता बन कर रह जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी और दोहरी नैतिकता
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी इस पूरे घटनाक्रम पर शर्मनाक रही है; यूएस, यूके और ईयू ने जॉर्जियन ड्रीम के अधिकारियों पर प्रतीकात्मक प्रतिबंध लगाए, लेकिन ठोस कार्रवाई की कमी ने धांधली को बढ़ावा दिया है। ओएससीई (OSCE) जैसे पर्यवेक्षकों ने भी चुनाव में अनियमितताओं की पुष्टि की, लेकिन रूसी प्रभाव के आगे झुक गए।
भारत में भी विपक्ष की चीखें अनसुनी रहीं, जहां चुनाव आयोग ने वोटों की चोरी के आरोपों को खारिज कर दिया है। यह दोहरी नैतिकता वैश्विक लोकतंत्र को कमजोर कर रही है। जब तक पश्चिमी शक्तियां सख्ती न करें, ऐसी सरकारें फलती-फूलती रहेंगी, जो चुनाव को लूटकर सत्ता में बनी रहती हैं।
भारत के सत्ताधारियों के लिए जॉर्जिया एक सबक
जॉर्जिया की यह क्रांति भारत के सत्ताधारियों के लिए एक कड़ा सबक है। वोट चोरी की जड़ें भले ही कितनी भी गहरी हों, लेकिन जनता की एकजुटता ही इन्हें उखाड़ने की क्षमता रखती है। मोदी सरकार की तरह जॉर्जियन ड्रीम पार्टी ने भी “शांति” का बहाना बनाकर दमन किया, लेकिन जॉर्जिया की सड़कें सच बोल रही हैं।
भारत में सोनम वांगचुक को जेल में डालना यह बताता है कि भारत में भी तानाशाही की भावना जनता को लगातार उकसा रही है। अगर जॉर्जियाई लोग हार मान लेते हैं, तो वहां तानाशाही का कब्जा पक्का हो जाएगा; इसलिए भारत में भी विपक्ष को जॉर्जिया की स्थिति से सतर्क रहना होगा। यह मोदी जॉर्जिया तुलना वैश्विक एकजुटता की मांग करती है, जिससे ऐसे तानाशाहों को घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सके।
अंत में, जॉर्जिया की जनता को सलाम, तुम्हारा संघर्ष न केवल अपना, बल्कि पूरी दुनिया के लोकतंत्र की लड़ाई है। धांधली करने वाली सरकारें चाहे कितनी भी ताकतवर हों, जनाक्रोश उन्हें नेस्तनाबूद कर देगा। भारत के लोग उठो, मोदी सरकार को भी आईना दिखाओ, क्योंकि वोट चोरी कहीं भी हो, इसका अंत एक ही है—जनक्रांति। जॉर्जिया के लोग, लड़ाई जारी रखो, क्योंकि तुम्हारी जीत लोकतन्त्र की जीत होगी।



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