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कांग्रेस में अंदरूनी कलह: ‘बागड़ बिल्लों’ पर सज़ा कब होगी?

कांग्रेस में अंदरूनी कलह

कांग्रेस में अंदरूनी कलह और अनुशासन का प्रश्न एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार मामला जरा उलटा है। अक्सर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठते रहे हैं, पर हाल ही में जो घटना सामने आई है, वह संगठन में अनुशासन को लेकर एक नया मानदंड स्थापित करती दिखती है।

यह बात मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध हिल स्टेशन पचमढ़ी की है, जहाँ कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था। इस शिविर में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में पार्टी की रीढ़ माने जाने वाले राहुल गांधी को ‘सजा’ मिली। जी हाँ, आपने सही सुना!

राहुल गांधी को कैंप में मात्र 2 मिनट देर से पहुँचने पर 10 पुश अप लगाने की सजा दी गई। यह सजा किसी और ने नहीं, बल्कि कांग्रेस ट्रेनिंग डिपार्टमेंट के हेड सचिन राव ने उन्हें दी।

सचिन राव ने इस पहल की पुष्टि करते हुए स्पष्ट कहा कि, “हमारे प्रशिक्षण शिविर में अनुशासन का पालन न करने पर पनिशमेंट दिया जाएगा और राहुल गांधी ने इसे सहर्ष स्वीकार किया।” राहुल गांधी द्वारा पार्टी के इस अनुशासन को स्वीकार करना निःसंदेह एक बड़ा राजनीतिक संदेश देता है कि पार्टी में हर कोई नियम के दायरे में है।

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शीर्ष नेतृत्व से निचले स्तर तक के कायदे

कांग्रेस में अनुशासन की यह कवायद निश्चित रूप से सराहनीय है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि राहुल गांधी, जो कांग्रेस की रीढ़ हैं और हमेशा देश और कांग्रेस दोनों की बेहतरी के लिए लगातार काम कर रहे हैं, उन्हें भी नियमों के उल्लंघन पर सज़ा मिल सकती है। यह घटना दर्शाती है कि संगठन में व्यक्तिगत कद से ज़्यादा, कायदों का महत्व है।

हालाँकि, यह सवाल यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि यहीं से असली बहस शुरू होती है। अगर पार्टी अपने सबसे बड़े नेता को मामूली चूक पर सज़ा दे सकती है, तो उन तत्वों पर कार्रवाई कब होगी जो पार्टी को घुन की तरह चाट रहे हैं?

यह वे तत्व हैं जिन्हें अंदरूनी तौर पर “बागड़ बिल्ले” कहा जाता है, और ये वे हैं जो कांग्रेस को दशकों से खोखला कर रहे हैं।

महत्वाकांक्षा और अवसरवाद का गठजोड़

ये ‘बागड़ बिल्ले’ कौन हैं? ये वे लोग हैं जो कांग्रेस के लिए काम करने के बजाय केवल अपने लिए जीते हैं। इनकी महत्वाकांक्षा का आलम यह है कि ये हमेशा भावी मुख्यमंत्री से नीचे का सपना ही नहीं देखते।

इनकी प्राथमिक निष्ठा पार्टी से ज़्यादा अपनी कुर्सी और भविष्य की व्यक्तिगत सत्ता में होती है। इन ‘बागड़ बिल्लों’ पर गंभीर आरोप यह है कि ये काम बीजेपी के लिए करते हैं।

यानी, कांग्रेस के संसाधनों, पदों और जनाधार का उपयोग करते हुए ये परोक्ष या अपरोक्ष रूप से विपक्षी दल को मजबूत करने का काम करते हैं। यह अवसरवाद और महत्वाकांक्षा का एक ऐसा गठजोड़ है जो संगठन की जड़ों को अंदर ही अंदर खत्म कर रहा है।

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संगठन पर कब्ज़ा: AICC से ब्लॉक कमेटी तक

इस पूरे मामले की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब यह पता चलता है कि ऐसे ‘बागड़ बिल्ले’ न केवल अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) जैसे शीर्ष निकाय, बल्कि ब्लॉक कमेटियों तक पर भी कब्ज़ा जमाए बैठे हैं। संगठन के हर स्तर पर इनकी मजबूत पैठ है, जिसके चलते पार्टी की नीतियाँ और कार्यक्रम जनता तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुँच पाते।

ये नेता अपने स्वार्थ के लिए पार्टी के निर्णयों को प्रभावित करते हैं और ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ने का काम करते हैं। ये कांग्रेस को जितना नुकसान पहुँचा सकते हैं, पहुँचा रहे हैं।

एक वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर मैं जानता हूँ कि ऐसे सैकड़ों लोग हैं जो पार्टी के अंदर रहकर पार्टी के सिद्धांतों और जनाधार को नष्ट करने पर तुले हैं। इस विषय पर कभी विस्तृत समाचार लेख लिखा जाएगा।

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राहुल गांधी की सज़ा और कार्यकर्ताओं का सवाल

जब राहुल गांधी जैसे नेता, जो निस्वार्थ भाव से संघर्ष कर रहे हैं, वे 2 मिनट की देरी पर 10 पुश अप्स की सज़ा स्वीकार करते हैं, तो ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ता यह सवाल पूछने का पूरा हक रखते हैं कि उन ‘बागड़ बिल्लों’ को कब सज़ा मिलेगी जो वर्षों से कांग्रेस का जनाधार नष्ट कर रहे हैं।

यह दोहरा मापदंड कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा करता है। पचमढ़ी की घटना ने एक आदर्श स्थापित किया है, लेकिन इस आदर्श का असली परीक्षण तब होगा जब यह सिद्धांत इन ‘बागड़ बिल्लों’ पर लागू होगा।

अनुशासन बनाम आत्मघाती राजनीति

कांग्रेस ट्रेनिंग डिपार्टमेंट के हेड सचिन राव ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके प्रशिक्षण शिविर में अनुशासन का पालन न करने पर पनिशमेंट दिया जाएगा। यह बयान उम्मीद की एक किरण जगाता है। लेकिन यह केवल प्रशिक्षण शिविर तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

पार्टी को यह समझना होगा कि ‘बागड़ बिल्लों’ की आत्मघाती राजनीति कांग्रेस को लगातार नुकसान पहुँचा रही है। यदि पार्टी इस समस्या का समाधान नहीं करती है, तो हर बार चुनाव में हार का ठीकरा केवल नीतियों या शीर्ष नेतृत्व पर फोड़ना न्यायसंगत नहीं होगा। कांग्रेस में अंदरूनी कलह की जड़ें ऐसे ही तत्वों में निहित हैं।

संगठन की शुद्धिकरण की आवश्यकता

कांग्रेस को आज एक संगठनात्मक शुद्धिकरण (Organizational Cleansing) की सख़्त ज़रूरत है। जब तक ये ‘बागड़ बिल्ले’ AICC से ब्लॉक कमेटियों तक कब्ज़ा जमाए बैठे रहेंगे, पार्टी के भीतर पारदर्शिता और लोकतंत्र स्थापित करना असंभव होगा।

सज़ा का डर और अनुशासन की मिसाल केवल शीर्ष पर नहीं, बल्कि उन पर भी लागू होनी चाहिए जो लगातार पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं।

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बागड़ बिल्लों पर कार्रवाई, तभी बनेगी बात

पचमढ़ी में राहुल गांधी द्वारा स्वेच्छा से सज़ा स्वीकार करना यह संकेत देता है कि नेतृत्व पार्टी के अनुशासन को लेकर गंभीर है। अब इस गंभीरता को संगठन के हर स्तर पर लागू करने का समय आ गया है।

यदि कांग्रेस को भविष्य में अपने जनाधार और विश्वसनीयता को बचाना है, तो उन्हें कांग्रेस में अंदरूनी कलह पैदा करने वाले इन ‘बागड़ बिल्लों’ को न केवल सज़ा देनी होगी, बल्कि उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना होगा। तभी कांग्रेस की बेहतरी और देश की सेवा के लिए राहुल गांधी जैसे नेताओं का प्रयास सफल हो पाएगा।

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