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अंबानी-मोदी गठजोड़: गैस चोरी, रूसी तेल मुनाफाखोरी, लोकतंत्र पर डाका

अंबानी-मोदी गठजोड़

अंबानी-मोदी गठजोड़ मुकेश अंबानी का विशाल औद्योगिक साम्राज्य, जो अब भारतीय आकाश को छूता प्रतीत होता है, आज कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन से चुराई गई गैस की बदबू से घिरा हुआ है।

यह कोई साधारण कॉर्पोरेट विवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति पर संगठित डाके का मामला है, जहां कानून और सत्ता के बीच का नाजुक संतुलन टूटता दिखाई दे रहा है।

4 नवंबर 2025 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल), उसके चेयरमैन मुकेश अंबानी और निदेशकों के खिलाफ CBI जांच की मांग की गई है।

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KG बेसिन: राष्ट्रीय संपत्ति पर डाका

आरोप है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने 2004 से 2013-14 के बीच कृष्णा-गोदावरी बेसिन में ओएनजीसी (ONGC) के पड़ोसी ब्लॉकों से ‘साइडवेज ड्रिलिंग’ करके करीब 1.55 अरब डॉलर (लगभग 13,700 करोड़ रुपये) की प्राकृतिक गैस चुराई।

यह चोरी संगठित और सुनियोजित थी, जिसकी पुष्टि 2015 की अमेरिकी कंसल्टेंट डीएंडएम (D&M) की रिपोर्ट ने कर दी। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि 44.32% गैस गोदावरी पीएमएल ब्लॉक से और 34.71% गैस केजी-डब्ल्यूएन-98/2 ब्लॉक से माइग्रेट होकर आरआईएल के कुओं में गई।

जस्टिस एपी शाह कमिटी ने भी 2016 में इस चोरी के एवज में 1.55 अरब डॉलर की वसूली की मांग की थी, जो 2025 तक ब्याज समेत लगभग 24,850 करोड़ रुपये हो चुकी है।

सवाल यह है कि जब ओएनजीसी ने 2013 में ही यह धोखा पकड़ा था, तो दस साल बाद CBI जांच की नौबत क्यों आई? क्या मोदी के ‘परम मित्र’ होने का अर्थ यह है कि कानून की नींद पूरी हो जाती है?

सुप्रीम कोर्ट में रिलायंस ने दिल्ली हाईकोर्ट के फरवरी 2025 के फैसले को चैलेंज किया है। यह मामला क्रोनी कैपिटलिज्म के अंतिम चक्रव्यूह जैसा लगता है, जहाँ बड़े खिलाड़ी को बचाने के लिए पूरा सिस्टम लचीला हो जाता है।

‘माइग्रेटरी गैस’ का बहाना और कानूनी दांवपेंच

डी एंड एम की 2015 की रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरआईएल के कुओं ने ओएनजीसी के रिजर्व से अनधिकृत रूप से गैस खींची।

बिना किसी ‘यूनिटाइजेशन एग्रीमेंट’ के, रिलायंस ने 2009 से 2016 के बीच 338.332 मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट्स गैस का दोहन किया। 2016 में पेट्रोलियम मंत्रालय ने वसूली की मांग की, लेकिन 2018 में आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल ने रिलायंस के पक्ष में फैसला सुनाया।

इस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फरवरी 2025 में सख्त टिप्पणी करते हुए ट्रिब्यूनल के फैसले को ‘इनसिडियस फ्रॉड’ (घातक धोखाधड़ी) और ‘अनजस्ट एनरिचमेंट’ (अनुचित संवर्धन) बताते हुए पलट दिया।

इसके बाद मार्च 2025 में मंत्रालय ने ब्याज समेत 2.81 अरब डॉलर (लगभग 24,500 करोड़ रुपये) की डिमांड नोटिस जारी की, जिसे रिलायंस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इतने बड़े राष्ट्रीय अपराध के बावजूद, सीबीआई जांच की बजाय सिविल रिकवरी पर जोर दिया जा रहा है।

अंबानी-मोदी गठजोड़ के इस दौर में, सिस्टम अमीरों के लिए ‘माइग्रेटरी गैस’ की तरह लचीला हो जाता है, जहाँ चोरी का बहाना ‘प्राकृतिक प्रवास’ बताया जाता है। मोदी सरकार की निष्क्रियता देखकर लगता है, राष्ट्रीय संपत्ति का मतलब कहीं ‘मित्र संपत्ति’ तो नहीं!

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युद्ध में मुनाफ़ा: रूसी क्रूड का खेल

गैस चोरी के अलावा, यूक्रेन संकट के बाद अंबानी समूह ने रूसी तेल के धंधे से खरबों रुपये कमाए। 2022 के बाद रिलायंस ने रूसी क्रूड के आयात को 3% से बढ़ाकर 50% तक कर दिया। जामनगर रिफाइनरी को सस्ते रूसी ईंधन से चलाकर, रिफाइंड प्रोडक्ट्स को यूरोपीय संघ और अमेरिका को बेचा गया।

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में अंबानी ने अमेरिका को रूसी क्रूड से बने ईंधन के निर्यात से 724 मिलियन यूरो (करीब 6,850 करोड़ रुपये) कमाए, और जनवरी 2024 से जनवरी 2025 तक यूएस को कुल 2.8 अरब यूरो का रिफाइंड ऑयल निर्यात किया, जिसमें जामनगर की हिस्सेदारी 2 अरब यूरो थी।

यह आयात ‘भारत के नाम पर’ हुआ, जिससे देश को 33 अरब डॉलर की बचत हुई, लेकिन निजी रिफाइनर्स (विशेषकर रिलायंस) ने सबसे अधिक मुनाफा कमाया, जबकि सरकारी रिफाइनर्स घरेलू कीमत नियंत्रण के जाल में फंसे रहे।

रिलायंस इंटरनेशनल ने 15 महीनों में 58.1 अरब डॉलर की कमाई की, जिसका बड़ा हिस्सा रूसी क्रूड से आया और सिंगापुर के बैंकों में पार्क हो गया। क्या यह राष्ट्रहित है या राष्ट्र की क़ीमत पर कॉर्पोरेट की लॉटरी?

डोनाल्ड ट्रंप का 50% टैरिफ़: छोटे निर्यातकों पर मार

मुकेश अंबानी के इस मुनाफाखोरी के खेल ने भारत के लाखों निर्यातकों की कमर तोड़ दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगस्त 2025 में भारतीय आयात पर 25% अतिरिक्त टैरिफ़ लगाया, जिससे कुल टैरिफ़ 50% हो गया।

ट्रंप ने इसे रूसी तेल खरीद को ‘सेकेंडरी सैंक्शन’ बताते हुए ‘रशियन ऑयल विंडफॉल’ करार दिया, जिसमें जामनगर रिफाइनरी ने रोजाना 1.5 मिलियन बैरल रूसी तेल प्रोसेस किया।

भले ही अंबानी को 2.04 अरब डॉलर का फायदा हुआ हो, लेकिन इसकी असली मार छोटे निर्यातकों, जैसे गारमेंट्स, ज्वेलरी, फुटवियर, ऑटो पार्ट्स और सीफूड पर पड़ी, जो भारत के यूएस निर्यात का 55% हैं।

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस (एफआईईओ) के अनुसार, तिरुपुर, दिल्ली और सूरत के टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर्स और भदोही के कार्पेट निर्यातकों ने उत्पादन रोक दिया, जिससे लाखों नौकरियां खतरे में आ गईं।

अंबानी-मोदी गठजोड़ के कारण भारत को ‘सैंक्शन इन डिस्गाइज’ में धकेल दिया गया है, जहाँ एक कॉरपोरेट का मुनाफा लाखों नौकरियों पर भारी पड़ गया।

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मीडिया साम्राज्य: नफ़रत की आग और सच पर पर्दा

अंबानी का विशाल मीडिया साम्राज्य—नेटवर्क18, सीएनबीसी-टीवी18, और न्यूज18—इन तमाम काले कारनामों पर पर्दा डालने का अचूक हथियार है।

ये चैनल मोदी-शाह के ‘राष्ट्रविरोधी’ कारनामों पर चुप्पी साधे रहते हैं, जबकि हिंदू-मुस्लिम नफरत की आग भड़काते हैं। ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, और ‘स्पिट जिहाद’ जैसे षड्यंत्र सिद्धांतों को हवा देकर, न्यूज18 इंडिया जैसे चैनलों ने मुसलमानों को ‘आतंकवादी’ या ‘साइलेंट’ खतरे के रूप में पेश किया।

2021 में एंकर अमन चोपड़ा ने ‘खाने में थूकना, जिहाद या जाहिलत?’ जैसे शो के माध्यम से घंटों नफरत फैलाई। 2024 में एंटी-माइनॉरिटी हेट स्पीच 74% बढ़ी, खासकर लोकसभा चुनावों के दौरान।

रवीश कुमार जैसे पत्रकारों को तिरस्कृत किया गया, जबकि ‘गोदी मीडिया’ बीजेपी के प्रचार को ‘समाचार’ बनाकर बेचता रहा। अंबानी का Jio प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर भी नफरत फैलाने वाले कंटेंट को बढ़ावा देता है, और ओपइंडिया जैसी साइट्स को गूगल ऐड्स मिलते हैं।

2022 में AIMMM (ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत) ने अंबानी को पत्र लिखकर ‘हेट कैंपेन’ बंद करने को कहा था, लेकिन कुछ नहीं बदला।

लोकतंत्र की दुर्दशा: ‘हिंदू पाकिस्तान’ बनाने की साज़िश

मोदी-शाह की जोड़ी के साथ अंबानी का यह गठजोड़, भारत को ‘हिंदू पाकिस्तान’ बनाने की साज़िश का हिस्सा मालूम होता है। सोशल मीडिया पर ‘पॉपुलेशन जिहाद’ जैसे झूठे नैरेटिव फैलाए जाते हैं, और बीजेपी के आईटी सेल तथा अंबानी के चैनल मिलकर मुसलमानों को दुश्मन के रूप में पेश करते हैं।

2020 के दिल्ली दंगों में, पुलिस की निष्क्रियता को ‘मुस्लिम हिंसा’ बताकर कवरेज किया गया। न्यूज18 गुजरात में मुस्लिमों पर पुलिस बर्बरता को भी न्यायसंगत ठहराता है।

अंबानी का मीडिया एक ओर मोदी की ‘हिंदुत्व’ एजेंडे को वैधता देता है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय संपत्ति की चोरी पर चुप्पी साध लेता है। यह दोहरी चालाकी है—सामने नफरत, पीछे चोरी। क्या भारत का लोकतंत्र अब वास्तव में ‘अंबानी-मोदी लिमिटेड’ बन गया है?

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आख़िरी घंटी: क्या न्याय मिलेगा?

यह सारा तमाशा भारत की आत्मा पर सीधा आघात है। जब ‘राष्ट्रीय सेठ’ राष्ट्रीय संसाधनों को लूटता है, मीडिया पर कब्जा करके नफरत बेचता है, और मोदी सरकार चुप्पी साधे रहती है, तो आम नागरिक का भविष्य क्या होगा?

ओएनजीसी जैसी संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है, रूसी तेल के धंधे से अरबों कमाए जा रहे हैं (2025 में रिलायंस-नायरा को 16 अरब डॉलर का अनुमानित लाभ), और ट्रंप के टैरिफ़ से अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो रही है। इस सबने क्रोनी कैपिटलिज्म को भयानक ‘वाइब्रेंट’ बना दिया है।

हालांकि, अब कोर्ट की घंटी बज रही है—बॉम्बे हाई कोर्ट 18 नवंबर 2025 को मामले की सुनवाई करेगा। इसके अलावा, यूरोपीय संघ के 2026 से रूसी क्रूड-बेस्ड फ्यूल पर प्रतिबंध लगाने के फैसले से रिलायंस को एक और झटका लगेगा।

क्या यह जागृति का संकेत है, या फिर यह सिर्फ एक और कानूनी दांव-पेंच है? भारत को न्याय चाहिए, ‘क्रोनी मित्रों’ की रक्षा नहीं। हाय रे भारत का लोकतंत्र!

अंबानी-मोदी गठजोड़ को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज हो रही है। विपक्ष का आरोप है कि अंबानी-मोदी गठजोड़ से नीतियों में पक्षपात बढ़ा है, जबकि सरकार इसे विकास की आवश्यकता बताती है।

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