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मुंबई सुरक्षा तार-तार: हर दिन 4-5 बेटियां लापता, गृह विभाग पर सवाल

मुंबई सुरक्षा तार-तार

मुंबई सुरक्षा तार-तार हो चुकी है, यह कोई साधारण आरोप नहीं, बल्कि मुंबई पुलिस के खुद के डेटा की चीख है। देश की आर्थिक राजधानी और सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहरों में से एक मुंबई में अब बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई से हर दिन औसतन चार से पांच नाबालिग लड़कियां लापता हो रही हैं।

1 नवंबर से 6 दिसंबर 2025 तक के मात्र 36 दिनों में 82 बच्चे और युवा गायब होने की रिपोर्ट दर्ज हुई, जिनमें 60 लड़कियां शामिल थीं। इससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि पिछले 10 महीनों में लगभग 1,187 लड़कियां लापता होने की खबरें सामने आई हैं।

जून से दिसंबर 2025 तक मुंबई में 134 से 150 नाबालिग लापता हुए, जिनमें 86 से 96 लड़कियां हैं, जबकि पूरे महाराष्ट्र में इसी अवधि में 370 बच्चे गायब हुए, जिनमें 268 लड़कियां थीं। ये संख्याएं महज़ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन मासूम जिंदगियों की चीख हैं जो अपने घरों से निकलकर अज्ञात में गुम हो जाती हैं।

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गृह विभाग पर गंभीर सवाल

राज्य का गृह विभाग, जिसकी कमान अनुभवी देवेंद्र फडणवीस के हाथों में है, क्या वाकई इस गंभीर संकट पर आंखें मूंदे बैठा है? सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे दावों को भले ही मुंबई पुलिस ने खारिज कर दिया हो, लेकिन आधिकारिक डेटा खुद इस बात की गवाही दे रहा है कि मुंबई की सुरक्षा तार-तार हो चुकी है।

यह समस्या सिर्फ मुंबई या महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर चिंताजनक है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में पूरे महाराष्ट्र में 37,695 महिलाएं और लड़कियां लापता होने की शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें 4,096 नाबालिग थीं।

नवि मुंबई का हाल भी कम बुरा नहीं है; जनवरी से नवंबर 2025 तक यहां 499 बच्चे गायब हुए, जिनमें 349 लड़कियां थीं, और उनमें से 41 अभी भी नहीं मिले, जिनमें 34 लड़कियां शामिल हैं।

सरकारी दावे और अनसुलझे 5-10% मामले

सरकार लगातार यह दावा करती है कि 90-95% मामले सुलझ जाते हैं। इन मामलों के पीछे ज्यादातर कारण घरेलू झगड़े, प्रेम प्रसंग या भागना बताया जाता है। सरकार ‘ऑपरेशन मुस्कान’ और ‘ऑपरेशन शोध’ जैसे अभियानों की सफलता का बखान करती है, जिससे हजारों बच्चों को ढूंढा गया है।

लेकिन, सवाल यह है कि उन 5 से 10 प्रतिशत मामलों का क्या होता है जो कभी नहीं मिलते? क्या ये मासूम मानव तस्करी के शिकार नहीं बन रहे? यह आशंका निराधार नहीं है, क्योंकि 2023 में महाराष्ट्र में मानव तस्करी के 388 मामले दर्ज हुए, जो देश में सबसे ज्यादा संख्या थी।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी 2024 में एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए मानव तस्करी को लापता होने का एक मुख्य कारण माना और राज्य से उसके बचाव तंत्र की जानकारी भी मांगी थी।

राज ठाकरे का हस्तक्षेप और राष्ट्रीय डेटा

मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने इस बढ़ते अपहरण और लापता मामलों पर तत्काल कार्रवाई की मांग करते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। उन्होंने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के डेटा का हवाला देते हुए बताया कि 2021 से 2024 तक बच्चों के अपहरण में 30% की बढ़ोतरी हुई है।

मुंबई जैसे महानगर में हर दिन 4 से 5 लड़कियों का गायब होना कोई छोटी या सामान्य बात नहीं है। पुलिस की ओर से हर थाने में ‘मिसिंग स्क्वॉड’ और महिला अधिकारी नियुक्त की जा रही हैं। इसके अलावा, 45 एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स भी काम कर रही हैं, मगर सवाल है कि फिर भी अंतरराज्यीय गिरोहों पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है?

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तस्करी का जाल और पुलिस की रोकथाम रणनीति

रेलवे स्टेशनों, बस डिपो और सोशल मीडिया जैसे सार्वजनिक स्थानों पर लालच देने वाले नेटवर्क बेहद सक्रिय हैं, जहां लड़कियों को नौकरी, शादी या दोस्ती के बहाने फंसाया जाता है। पुलिस का दावा है कि मुंबई में ट्रेसिंग रेट 99% तक है। अगर इतनी सफलता है, तो नए मामलों में बढ़ोतरी क्यों हो रही है? रोकथाम की रणनीति आख़िर कहां है?

मानव तस्करी का खतरा सबसे बड़ा और भयावह है। आशंका है कि कई लड़कियां देह व्यापार, जबरन श्रम या बेगिंग (भीख मांगने) में धकेल दी जाती हैं। नवि मुंबई के मामलों में भी, जहां ज्यादातर कारण प्रेम प्रसंग या घरेलू तनाव बताए गए, वहीं 25 मामलों में यौन शोषण का लालच शामिल था।

महाराष्ट्र देश में तस्करी के मामलों में टॉप पर है, और बॉम्बे हाई कोर्ट ने रेलवे पुलिस व महिला आयोग से भी तस्करी रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी मांगी है। अंतरराज्यीय गिरोह दिल्ली, गुजरात, तेलंगाना जैसे राज्यों से बच्चों को लाकर बेचते हैं, और पुलिस विभागों के बीच कोऑर्डिनेशन की कमी इसकी एक बड़ी जड़ है।

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हाई कोर्ट की चिंता और नीतिगत विफलता

हाल के 40 दिनों में 90 नाबालिग गायब हो चुके हैं, जिनमें पांच साल की मासूम लड़कियां भी शामिल हैं! मुख्यमंत्री फडणवीस सदन में ट्रेसिंग रेट और ‘ऑपरेशंस’ का बखान करते हुए कहते हैं कि 87.8% मामलों में 60 दिनों में चार्जशीट फाइल होती है, लेकिन ठोस रोकथाम नीति कहां है?

राज ठाकरे के पत्र को अनदेखा करना और सिर्फ आंकड़े गिनाना पर्याप्त नहीं है। हाई कोर्ट की नजर में भी यह मानव तस्करी से जुड़ा गंभीर मामला है, और राज्य को इसके लिए जवाब देना पड़ा है। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक बीमारी भी है।

सामाजिक बीमारी और रोकथाम की जरूरत

परिवारों में तनाव, शिक्षा की कमी, आर्थिक दबाव और ऑनलाइन ग्रूमिंग जैसे कारक भी लड़कियों को घर छोड़ने पर मजबूर करते हैं। 18 साल की लड़कियां सबसे ज्यादा प्रभावित हैं; 36 दिनों के 82 मामलों में आधी से ज्यादा, यानी 41 लड़कियां, 18 साल की थीं। बाहर निकलते ही शिकारी घात लगाए इंतजार कर रहे होते हैं।

राज्य सरकार को अब सिर्फ ट्रेसिंग रेट गिनाने से नहीं, बल्कि सख्त इंटेलिजेंस, बॉर्डर चेकिंग और सोशल मीडिया मॉनिटरिंग से काम लेना होगा। मुंबई की सुरक्षा तार-तार होने का यह कलंक मिटाने के लिए स्कूलों में सेफ्टी व जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, साइबर क्राइम सेल को मजबूत करना चाहिए, और ‘भरोसा’ जैसे वन-स्टॉप सेंटरों की पहुंच बढ़ानी चाहिए।

साथ ही, गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के साथ मिलकर काउंसलिंग और रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) पर फोकस करना होगा, क्योंकि ज्यादातर मामले भावनात्मक तनाव से जुड़े होते हैं।

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सीधा सवाल: क्या आप अभी भी सो रहे हैं?

यह सवाल राज्य के गृह विभाग से सीधा और तीखा है: क्या आप अभी भी सो रहे हैं? इन लापता बेटियों की मांएं रात-रात भर रो रही हैं, परिवार उजड़ रहे हैं, और समाज डर के साए में जी रहा है।

अगर अब भी अंतरराज्यीय गिरोहों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ नहीं हुई, जागरूकता अभियान नहीं चले, और रोकथाम की मजबूत नीति नहीं बनी, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर एक अमिट कलंक होगा।

समय आ गया है कि जागा जाए और एक्शन लिया जाए, वरना ये भयावह आंकड़े और भी बढ़ जाएंगे, और सपनों की नगरी मुंबई की चमक हमेशा के लिए फीकी पड़ जाएगी।

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