सत्यमेव जयते शक्तिमेव जयते: लोकतंत्र में सच बनाम ताकत
सत्यमेव जयते बनाम शक्तिमेव जयते: भारत की राजनीति में विचारधाराओं का महासंग्राम छिड़ा हुआ है। राहुल गांधी की जर्मनी में की गई हालिया टिप्पणी न केवल सटीक है, बल्कि यह भारत के ऐतिहासिक और वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में गहराई से जुड़ी हुई है।
कांग्रेस पार्टी हमेशा से “सत्यमेव जयते” की धारणा पर अडिग रही है, जो सत्य, अहिंसा और समानता के शाश्वत मूल्यों पर आधारित है। इसके विपरीत, बीजेपी और आरएसएस की पूरी नींव “शक्तिमेव जयते” पर टिकी हुई नजर आती है, जहां सत्य के ऊपर शक्ति को प्राथमिकता दी जाती है।
मोहन भागवत के हालिया बयानों ने इस विमर्श को और अधिक स्पष्ट कर दिया है कि आरएसएस सत्य को महत्व नहीं देता, बल्कि वह केवल शक्ति को ही सर्वोपरि मानता है।
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मोहन भागवत के बयानों में शक्ति की प्रधानता
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयानों से संगठन की वास्तविक सोच उजागर होती है। भागवत ने 2025 में स्पष्ट रूप से कहा कि दुनिया सत्य नहीं देखती, बल्कि वह केवल शक्ति को देखती है। यह बयान आरएसएस की उसी सोच को उजागर करता है जिसमें नैतिक सत्य के बजाय शारीरिक या सत्ता की शक्ति को महत्व दिया गया है।
राहुल गांधी ने बर्लिन में दिसंबर 2025 में इस पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि आरएसएस का वैचारिक प्रमुख खुले तौर पर सत्य को बेमानी बताता है। राहुल के अनुसार, यह भारत के लोकतंत्र के लिए एक गंभीर खतरा है, जहां सत्य के स्वर को शक्ति के अहंकार से कुचला जा रहा है।
सत्यमेव जयते शक्तिमेव जयते सत्य और सत्ता की टकराहट
इतिहास इस बात का गवाह है कि आरएसएस अपने शुरुआती दौर में हमेशा शक्ति के साथ खड़ा रहा। जब कांग्रेस के नेता सत्य और आजादी की कठिन लड़ाई लड़ रहे थे, तब आरएसएस ब्रिटिश क्राउन यानी तत्कालीन शक्ति के साथ सहयोग कर रहा था।
संगठन के संस्थापक केशवराव बलिराम हेडगेवार और उनके उत्तराधिकारी एम.एस. गोलवलकर ने ब्रिटिश राज के दौरान जानबूझकर संगठन को स्वतंत्रता आंदोलन से दूर रखा। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 1925 में स्थापित इस संगठन ने 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) का बहिष्कार किया था।
जब कांग्रेस के दिग्गज नेता जेलों में यातनाएं सह रहे थे, तब आरएसएस की नीति ब्रिटिश अधिकारियों के साथ सहयोग की थी, जिससे उन पर ब्रिटिश समर्थक होने के आरोप लगे।
अहिंसा का ढोंग और शक्ति की असल पूजा
मोहन भागवत के बयानों में अक्सर एक वैचारिक पाखंड दिखाई देता है, जहां वे मंचों से प्रेम और अहिंसा की बात तो करते हैं, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर उनका पूरा जोर शक्ति की पूजा पर होता है। भागवत ने बार-बार तर्क दिया है कि प्रेम और अहिंसा की भाषा तभी प्रभावी होती है जब उसके पीछे शक्ति का बल हो।
यह स्पष्ट रूप से सत्यमेव जयते बनाम शक्तिमेव जयते के संघर्ष को दर्शाता है। 2025 में उनके द्वारा यह कहना कि “दुनिया शक्ति को मानती है, सत्य को नहीं”, महात्मा गांधी के उन सिद्धांतों का सीधा अपमान है जिन्होंने सत्य और अहिंसा के बल पर दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से आजादी दिलाई थी।
आरएसएस खुद को हिंदुत्व का संरक्षक कहता है, लेकिन आलोचकों के अनुसार वह राम-कृष्ण की मूल शिक्षाओं को विकृत कर केवल शक्ति की राजनीति कर रहा है।
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खुफिया एजेंसियों से सहयोग और वैचारिक जुगलबंदी
राहुल गांधी ने इस सच्चाई को बेनकाब करने का साहस दिखाया है। 1930 और 1940 के दशक के रिकॉर्ड बताते हैं कि आरएसएस ने ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसियों के साथ सहयोग किया और हिंदू समाज को संगठित करने के बहाने खुद को स्वतंत्रता संग्राम से पूरी तरह अलग रखा। गोलवलकर ने अपनी चर्चित पुस्तक “वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड” में राष्ट्रवाद को हिंदू एकता से तो जोड़ा, लेकिन ब्रिटिश विरोध को कभी प्राथमिकता नहीं दी।
इतिहासकारों का यह भी मानना है कि आरएसएस ने अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिम लीग के साथ भी तालमेल बिठाया, जो अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” की नीति का ही एक हिस्सा था। राहुल गांधी ने जनवरी 2025 में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को याद दिलाया कि जहां कांग्रेस ने ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा लिया, वहीं आरएसएस जैसी संस्थाएं या तो चुप रहीं या उनकी सहयोगी बनी रहीं।
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सत्यमेव जयते शक्तिमेव जयते: इतिहास की सीख
कांग्रेस की सोच का आधार हमेशा सत्य रहा है। नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक, पार्टी ने सत्य, समानता और बहुलवाद के लिए निरंतर संघर्ष किया है। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ जैसी पहल इसी सत्य की ताकत का जीवंत प्रमाण है, जिसके माध्यम से राहुल गांधी ने जनता के बीच जाकर सामाजिक न्याय की आवाज उठाई।
सत्यमेव जयते बनाम शक्तिमेव जयते की इस लड़ाई में कांग्रेस ने कभी भी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उनकी रक्षा की है। राहुल गांधी का विदेशी मंचों पर बोलना देशद्रोह नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की कड़वी सच्चाई को साझा करना है।
1925 से 1947 के बीच जब गांधी, नेहरू और पटेल जेलों में थे, तब आरएसएस के कई सदस्य ब्रिटिश व्यवस्था का हिस्सा बनकर लाभ उठा रहे थे। इसी संदर्भ में राहुल ने 2023 में लंदन में आरएसएस की तुलना फासीवादी विचारधारा से की थी।
संस्थागत कब्जा और वर्तमान राजनीतिक दमन
वर्तमान में बीजेपी-आरएसएस की शक्ति की राजनीति देश के लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचा रही है। मोदी सरकार पर मीडिया, न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं को सत्य दबाने के लिए नियंत्रित करने के आरोप लगते रहे हैं। मोहन भागवत का राम मंदिर को “सच्ची आजादी” बताना 1947 के शहीदों और स्वतंत्रता का अपमान है, जिसे राहुल गांधी ने ठीक ही देशद्रोह की श्रेणी में रखा।
आज शक्ति के बल पर अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेला जा रहा है, जो आरएसएस की विभाजनकारी सोच का परिणाम है। 1942 के दौरान भी आरएसएस ने ब्रिटिश सत्ता को सूचनाएं देकर आंदोलन को कमजोर करने का काम किया था। राहुल गांधी ने स्पष्ट कहा है कि भागवत के शक्ति-केंद्रित बयान अगर किसी अन्य देश में दिए जाते, तो गिरफ्तारी निश्चित थी।
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सत्य की अंतिम विजय का विश्वास
आज की राजनीति में आरएसएस की ‘शक्ति-सर्वोपरि’ वाली सोच बीजेपी के हर निर्णय में झलकती है, चाहे वह विवादित किसान कानून हों या आर्थिक नीतियां। राहुल गांधी की ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ जैसी रैलियां इसी शक्ति के दमन के खिलाफ सत्य का शंखनाद हैं। सत्यमेव जयते बनाम शक्तिमेव जयते का यह संघर्ष ही भारत के भविष्य की दिशा तय करेगा।
आरएसएस की विचारधारा मूल रूप से फासीवादी है जो विविधता के बजाय एकरूपता थोपती है। राहुल गांधी ने लंदन से बर्लिन तक जो आवाज उठाई है, वह लोकतंत्र को बचाने का एक ईमानदार प्रयास है। आरएसएस के ब्रिटिशकालीन इतिहास से यह सबक मिलता है कि वे हमेशा शक्ति (क्राउन) के साथ रहे, जबकि कांग्रेस ने सत्य का दामन कभी नहीं छोड़ा।
राहुल गांधी को आज सलाह की नहीं, बल्कि उस समर्थन की जरूरत है जो शक्ति के सामने झुकने को तैयार नहीं है। अंततः, सत्य की ही जीत होगी और अहंकार का पतन निश्चित है।



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