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AI कोडिंग का भविष्य और श्रीधर वेम्बु की सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को चेतावनी

AI कोडिंग का भविष्य

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में AI कोडिंग का भविष्य जिस तेजी से बदल रहा है, उसने पूरी दुनिया के तकनीकी जगत में खलबली मचा दी है। ज़ोहो (Zoho) के सह-संस्थापक और सीईओ श्रीधर वेम्बु ने सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को एक बहुत ही स्पष्ट और गंभीर संदेश दिया है।

उन्होंने सलाह दी है कि जैसे-जैसे AI तकनीक उन्नत हो रही है, कोडर्स को अब वैकल्पिक करियर की तलाश शुरू कर देनी चाहिए।

वेम्बु की यह टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक यूजर की उस पोस्ट के जवाब में आई, जिसने बिना किसी कोडिंग जानकारी के एंथ्रोपिक के ‘क्लॉड’ (Claude) जैसे AI मॉडल का उपयोग करके एक सफल ‘भगवद गीता ऐप’ बना लिया।

वेम्बु ने आगाह किया है कि AI अब बिना किसी तकनीकी विशेषज्ञता के ऐप और वेबसाइट बनाने में सक्षम होता जा रहा है, जो पारंपरिक प्रोग्रामिंग नौकरियों के लिए एक बड़ा संकेत है।

एंथ्रोपिक और क्लॉड की क्षमताओं का प्रभाव

वेम्बु ने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए एंथ्रोपिक के क्लॉड AI का उदाहरण दिया, जिसने हाल ही में एक पूरा ‘C कंपाइलर’ विकसित किया है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है क्योंकि C कंपाइलर एक ऐसा जटिल टूल है जो इंसानों द्वारा लिखे गए कोड को मशीन के समझने योग्य निर्देशों में बदलता है।

पारंपरिक रूप से इसे कंप्यूटर साइंस की गहरी विशेषज्ञता वाला काम माना जाता था। वेम्बु ने स्पष्ट किया कि AI कोडिंग का भविष्य अब उन कार्यों को भी सहज बना रहा है जिन्हें पहले केवल अनुभवी इंजीनियर ही कर सकते थे।

उन्होंने लिखा कि जो लोग अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह कोड लिखने पर निर्भर हैं, उनके लिए अब दूसरे विकल्पों पर विचार करना ही समझदारी होगी। उन्होंने विनम्रता से स्वीकार किया कि वह खुद को भी इसी श्रेणी में शामिल करते हैं।

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गूगल जेमिनी के साथ आर्थिक दर्शन पर चर्चा

श्रीधर वेम्बु ने इस बदलाव को समझने के लिए गूगल के ‘जेमिनी’ (Gemini) AI के साथ लंबे और विस्तृत सत्र किए। उन्होंने इस अनुभव को साझा करते हुए बताया कि जेमिनी के साथ बातचीत करना किसी अत्यंत बुद्धिमान आर्थिक दार्शनिक से बहस करने जैसा था।

वेम्बु ने AI से अपने ही काम और तर्कों की आलोचना करने को कहा, जिसे जेमिनी ने बहुत शानदार तरीके से निभाया। इस संवाद के बाद वेम्बु ने निष्कर्ष निकाला कि भविष्य दो रास्तों पर जा सकता है, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि इस शक्तिशाली तकनीक का मालिक कौन है और इस पर ‘किराया’ कौन वसूलता है। यह चर्चा दर्शाती है कि AI कोडिंग का भविष्य केवल तकनीकी नहीं, बल्कि एक गहरा आर्थिक और सामाजिक बदलाव भी है।

वाइब कोडिंग और तकनीकी ऋण का संकट

हाल ही में वेम्बु ‘वाइब कोडिंग’ (Vibe Coding) की चर्चा को लेकर भी खबरों में रहे थे। उन्होंने प्रॉम्प्ट-आधारित कोडिंग की आलोचना करते हुए कहा था कि नेचुरल लैंग्वेज से कोडिंग करना एक गहरी कला को बहुत सरल बना देता है। उनका मानना है कि इससे ‘टेक डेट’ (Technical Debt) या तकनीकी कर्ज तेजी से बढ़ता है, जिससे अंततः पूरा सिस्टम ढह सकता है।

इसी मुद्दे पर उनका गैरी टैन के साथ सार्वजनिक विवाद भी हुआ, जिन्होंने दावा किया था कि वाइब कोडिंग के कारण ज़ोहो जैसे बिजनेस सबसे पहले प्रभावित होंगे। हालांकि, वेम्बु का तर्क है कि कोडिंग की परतों को समझे बिना केवल ‘वाइब्स’ पर काम करना भविष्य में अस्थिरता पैदा करेगा।

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आशावादी भविष्य: तकनीक का मामूली होना

वेम्बु ने भविष्य के दो पहलू सामने रखे हैं। अपने आशावादी नजरिए में वे कहते हैं कि AI तकनीक इतनी आम और सस्ती हो जाएगी कि यह आज की डिजिटल घड़ियों की तरह बैकग्राउंड में चली जाएगी। इस स्थिति में इंसानों का ध्यान कोडिंग से हटकर जीवन के अधिक मौलिक और जरूरी पहलुओं पर केंद्रित होगा।

वेम्बु के अनुसार, तब लोग “परिवार, मिट्टी, पानी, प्रकृति, कला, संगीत, संस्कृति, खेल, त्योहार और आस्था” के लिए अधिक समय निकाल पाएंगे।

वह स्वयं ग्रामीण जीवन शैली अपना चुके हैं और उनका मानना है कि यदि हम ग्रामीण गरीबी को हल कर सकें, तो यह एक बहुत ही सुंदर और संतोषजनक जीवन होगा। उनके लिए AI कोडिंग का भविष्य इंसानी क्षमताओं को तकनीकी बंधनों से मुक्त करने का एक जरिया बन सकता है।

निराशावादी भविष्य: केंद्रीकृत नियंत्रण और असमानता

वहीं, वेम्बु ने एक दूसरा और डरावना परिदृश्य भी पेश किया है, जिसे उन्होंने ‘निराशावादी नज़रिया’ कहा है। इस भविष्य में तकनीक ‘केंद्रीकृत नियंत्रण’ (Centralized Control) की ओर ले जाएगी। जहाँ कुछ बड़ी संस्थाओं का AI पर एकाधिकार होगा और वे इससे भारी किराया वसूलेंगी।

इससे समाज में असमानता और सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ेगा। वेम्बु ने चेतावनी दी कि अगर डेटा और कंप्यूटिंग पावर का मालिकाना हक कुछ हाथों में सिमट गया, तो यह सामाजिक विभाजन और रेंट-सीकिंग की प्रवृत्ति को जन्म देगा। यह भविष्य सॉफ्टवेयर इंजीनियरों और आम जनता दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

बुनकर का ऐतिहासिक उदाहरण और रोजगार की अनिश्चितता

एक ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए वेम्बु ने प्रोग्रामर्स की तुलना औद्योगिक क्रांति के समय के बुनकरों से की। उन्होंने कहा कि जैसे मशीनों के आने से कपड़े सस्ते और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो गए, लेकिन उससे बुनकरों को कोई लाभ नहीं हुआ, बल्कि वे विस्थापित हो गए। सॉफ्टवेयर के साथ भी ऐसा ही हो सकता है।

सॉफ्टवेयर की बाढ़ आ जाएगी, लेकिन कोडिंग करने वालों की कमाई या नौकरी की सुरक्षा बढ़ेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्हें अब इस बात पर भरोसा नहीं है कि भविष्य में पेड प्रोग्रामर की नौकरियां आज जितनी ही रहेंगी या बढ़ेंगी।

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डेवलपर कम्युनिटी में छिड़ी तीखी बहस

वेम्बु की इन बेबाक टिप्पणियों ने भारतीय डेवलपर समुदाय में एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। ‘नमस्ते जावास्क्रिप्ट’ के निर्माता अक्षय सैनी जैसे जानकारों ने इसे ‘बेवजह डराने वाला’ बयान बताया है। वहीं, कुछ अन्य डेवलपर्स का मानना है कि प्लान ‘B’ या ‘C’ तैयार रखना अब वक्त की जरूरत है।

विशेषज्ञों का कहना है कि न केवल IT, बल्कि हर इंडस्ट्री पर इसका असर पड़ेगा और हमारे जीने का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा। जैसा कि अनीश मूनका ने बिना कोडिंग के ऐप बनाकर दिखाया, यह स्पष्ट है कि कोडिंग के पारंपरिक प्रतिमान टूट रहे हैं। वेम्बु ने अंत में दोहराया कि वह यह सब घबराहट में नहीं, बल्कि शांत भाव से वास्तविकता को स्वीकार करते हुए कह रहे हैं।

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