बंगाल मतदाता सूची संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बढ़ी समय सीमा
बंगाल मतदाता सूची संशोधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल में चुनावी सूचियों के विशेष गहन संशोधन (SIR) की प्रक्रिया के दौरान तैनात माइक्रो-ऑब्जर्वर की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होगी।
अदालत ने यह साफ कर दिया है कि केवल चुनावी पंजीकरण अधिकारी (ERO) ही दावों और आपत्तियों पर अंतिम आदेश पारित करने के लिए अधिकृत हैं। शीर्ष अदालत ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को राज्य द्वारा नियुक्त उपयुक्त ग्रुप B अधिकारियों के साथ माइक्रो-ऑब्जर्वर को बदलने की अनुमति प्रदान कर दी है, जिससे इस पूरी प्रक्रिया में एक नया मोड़ आ गया है।
ग्रुप B अधिकारियों की तैनाती और अदालत के सख्त निर्देश सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि वह SIR कर्तव्यों के लिए चुनाव आयोग के निपटान में 8,550 ग्रुप B अधिकारियों को रखे। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास इन अधिकारियों की उपयुक्तता का आकलन करने, जहां आवश्यक हो मौजूदा माइक्रो-ऑब्जर्वर को बदलने और उन्हें संक्षिप्त प्रशिक्षण देने का पूर्ण विवेक होगा।
प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए पीठ ने आदेश दिया कि सभी पहचाने गए ग्रुप B अधिकारी अगले दिन शाम 5 बजे तक संबंधित जिला कलेक्टरों या ERO को रिपोर्ट करें। बंगाल मतदाता सूची संशोधन के तहत इन अधिकारियों के बायोडाटा की संक्षेप में जांच की जाएगी, जिसके बाद उन्हें माइक्रो-ऑब्जर्वर के रूप में कार्य करने के लिए एक या दो दिन का छोटा प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
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समय सीमा में विस्तार और ERO के वैधानिक अधिकार अदालत ने दस्तावेजों और आपत्तियों की जांच के लिए निर्धारित समय सीमा को 14 फरवरी से कम से कम एक सप्ताह आगे बढ़ा दिया है। यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि प्रभावित व्यक्तियों द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों की जांच में अधिक समय लगने की संभावना है।
पीठ ने जोर देकर कहा कि माइक्रो-ऑब्जर्वर सहायता करना जारी रख सकते हैं, लेकिन वे ERO के वैधानिक अधिकार को खत्म या प्रतिस्थापित नहीं कर सकते।
फाइनल SIR लिस्ट से नाम हटाने का अधिकार केवल ERO के पास ही सुरक्षित रहेगा। बंगाल मतदाता सूची संशोधन की इस प्रक्रिया में यदि आपत्ति करने वाले व्यक्तिगत सुनवाई के लिए उपस्थित नहीं भी होते हैं, तब भी ERO योग्यता के आधार पर जांच करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं।
हिंसा और धमकी के आरोपों पर DGP से जवाब तलब अदालत ने SIR अधिकारियों के खिलाफ धमकी और हिंसा के आरोपों का गंभीर संज्ञान लिया है। चुनाव आयोग ने दावा किया है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद राज्य पुलिस द्वारा कोई FIR दर्ज नहीं की गई है।
इस पर नाराजगी जताते हुए पीठ ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) को एक व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने याद दिलाया कि 19 जनवरी के आदेश में विशेष रूप से राज्य पुलिस को संशोधन अभ्यास के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में यह भी आरोप लगाया कि उच्च पदों पर बैठे लोग चुनाव अधिकारियों के खिलाफ दुश्मनी भड़का रहे हैं, जिसे अदालत ने ‘परेशान करने वाला’ माना।
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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका और ‘लॉजिकल गड़बड़ी’ का मुद्दा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो पिछली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश हुई थीं, ने इस अभ्यास को बंगाल के लोगों को “बुल्डोज़” करने वाला बताया था। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने तर्क दिया कि नाम की स्पेलिंग में मामूली गलतियों या अनुवाद की त्रुटियों के कारण लाखों लोगों को “तार्किक विसंगति” (Logical Discrepancy) के तहत वर्गीकृत किया गया है।
कोर्ट ने इस पर राहत देते हुए कहा कि मामूली तकनीकी खामियों की वजह से लोगों को मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जा सकता। बंगाल मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया में ममता बनर्जी का तर्क था कि यह अभ्यास केवल नाम हटाने के लिए किया जा रहा है, न कि नए नाम शामिल करने के लिए।
अदालती कार्यवाही में वरिष्ठ वकीलों की दलीलें राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट को बताया कि ग्रुप B अधिकारियों की सूची पिछले निर्देशों के पालन में तैयार की गई है और ये अधिकारी कार्य करने में सक्षम हैं।
हालांकि, चुनाव आयोग के वकील दामा शेषाद्रि नायडू ने चिंता जताई कि कई अधिकारियों के पास अर्ध-न्यायिक आदेश पारित करने का अनुभव नहीं है।
दूसरी ओर, केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यह संदेश जाना चाहिए कि भारत का संविधान सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होता है। सनातनी संसद की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता वी गिरि ने भी राज्य द्वारा असहयोग और हिंसा की घटनाओं के गंभीर आरोप लगाए।
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चुनाव आयोग की शक्तियां और प्रक्रिया में पारदर्शिता सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौजूदा ERO और AERO को बदलने का विवेक पूरी तरह से चुनाव आयोग के पास सुरक्षित है। यदि आयोग किसी अधिकारी के प्रदर्शन में कमी पाता है, तो उसे बदला जा सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि वह SIR प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होने देगी। चुनाव आयोग ने कोर्ट को सूचित किया था कि इससे पहले राज्य सरकार ने केवल 80 ग्रेड-2 अधिकारी उपलब्ध कराए थे, जबकि आवश्यकता कहीं अधिक थी। अब 8,000 से अधिक अधिकारियों की सूची सौंपे जाने के बाद, आयोग उनकी दक्षता के आधार पर उन्हें नियुक्त करेगा।
अंतिम मतदाता सूची और भविष्य की रूपरेखा सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई के बाद अब पूरी नजर 14 फरवरी के बाद मिलने वाले अतिरिक्त एक सप्ताह के समय पर है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अंतिम फैसला केवल वैधानिक अधिकारियों द्वारा ही लिया जाएगा ताकि चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता बनी रहे।
यह मामला तृणमूल कांग्रेस के नेताओं, नागरिक समाज समूहों और मुख्यमंत्री द्वारा दायर याचिकाओं के एक बैच का हिस्सा है, जो विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं। अदालत के इन निर्देशों से अब उम्मीद जताई जा रही है कि विशेष गहन संशोधन की यह प्रक्रिया बिना किसी डर और पक्षपात के पूरी हो सकेगी।
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