Loading Now

राहुल का ‘समर्पण’ आरोप: भारत-US ट्रेड डील पर संसद में भारी बवाल

राहुल का 'समर्पण' आरोप

राहुल का ‘समर्पण’ आरोप लोकसभा में बजट चर्चा के दौरान राहुल गांधी की तीखी टिप्पणी ने भारत-अमेरिका के अंतरिम व्यापार समझौते को एक बड़े राजनीतिक तूफान के केंद्र में खड़ा कर दिया है। 11 फरवरी 2026 को दिए गए अपने भाषण में गांधी ने इसे मोदी सरकार का “पूर्ण समर्पण” करार दिया।

उन्होंने ठोस आंकड़ों के साथ आरोप लगाया कि इस समझौते के तहत अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ औसत 3% से बढ़ाकर 18% कर दिया है, जो कि सीधे तौर पर 6 गुना वृद्धि है।

राहुल का ‘समर्पण’ आरोप इसी बात पर केंद्रित था कि भारत ने बदले में अमेरिकी औद्योगिक सामानों और कई कृषि उत्पादों जैसे ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स, रेड सोरघम, ट्री नट्स, फल, सोयाबीन ऑयल, वाइन और स्पिरिट्स पर टैरिफ को शून्य या न्यूनतम कर दिया है।

गांधी ने कहा कि व्हाइट हाउस फैक्ट शीट से स्पष्ट है कि 25% पेनल्टी टैरिफ हटाने का आधार भारत की “रूसी तेल आयात रोकने की प्रतिबद्धता” है, जिसे ट्रंप ने मोदी के साथ फोन कॉल में हासिल करने का दावा किया था।

ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा हमला: ‘अब अमेरिका तय करेगा कि हम किससे तेल खरीदें’

राहुल गांधी ने ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर सरकार को बुरी तरह घेरा। उन्होंने कहा कि “अब अमेरिका तय करेगा कि हम किससे तेल खरीदें, न कि हमारा प्रधानमंत्री।” यह टिप्पणी राष्ट्रीय स्वायत्तता की गंभीर कमी को उजागर करती है। गांधी के अनुसार, समझौते ने भारत को उस रूसी तेल से दूर होने के लिए मजबूर किया है जो 2025 में अपने पीक पर 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुँचा था और कुल आयात का 35-40% हिस्सा था।

इस डिस्काउंटेड क्रूड से भारत को अरबों डॉलर की बचत हुई थी, लेकिन डील के बाद रिफाइनर्स ने अप्रैल डिलीवरी के स्पॉट कार्गो ठुकरा दिए हैं।

जनवरी 2026 में रूसी तेल का आयात गिरकर 1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है और मार्च तक इसके 500,000-600,000 बैरल प्रतिदिन तक गिरने का अनुमान है। गांधी ने इसे “देश बेचना” कहा, क्योंकि इसकी कीमत ऊर्जा स्वतंत्रता को दांव पर लगाकर चुकाई जा रही है।

इसे भी पढ़े : 77वें गणतंत्र दिवस पर राहुल गांधी सीटिंग अरेंजमेंट पर मचा सियासी घमासान

कृषि क्षेत्र पर चेतावनी: ‘मोदी सरकार ने किसानों का खून-पसीना बेच दिया’

कृषि क्षेत्र पर गांधी की चेतावनी सबसे विनाशकारी रही। उन्होंने आरोप लगाया कि समझौते ने अमेरिकी कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम या खत्म कर दिए हैं, जिससे भारतीय बाजारों में सस्ते आयात की बाढ़ आ जाएगी और किसान कुचल दिए जाएंगे।

हालांकि सरकार संवेदनशील क्षेत्रों जैसे गेहूं, चावल, दूध और पोल्ट्री को “संरक्षित” बता रही है, लेकिन गांधी ने कहा कि व्हाइट हाउस फैक्ट शीट में दालों (पल्सेस) का जिक्र हटाने के बाद भी नट्स, फल और सोयाबीन ऑयल जैसे उत्पाद किसानों को तबाह कर देंगे।

राहुल का ‘समर्पण’ आरोप इस बात पर भी था कि $500 बिलियन मूल्य के अमेरिकी सामान खरीदने का वादा भारतीय किसानों के लिए अमेरिकी सब्सिडी वाले उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करना असंभव बना देगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जहाँ कृषि 45% कार्यबल को रोजगार देती है, इस फैसले से चरमरा सकती है और छोटे किसानों की आत्महत्या जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं।

उद्योगों की कमर टूटी: टेक्सटाइल और स्थानीय निर्माताओं पर 18% टैरिफ का बोझ

समझौते की असमानता को उजागर करते हुए गांधी ने टेक्सटाइल, लेदर, जेम्स और ऑर्गेनिक केमिकल्स जैसे उद्योगों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जहाँ भारत ने अमेरिकी सामानों पर टैरिफ घटाए, वहीं अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 18% टैरिफ बरकरार रखा है।

यह उद्योग 4.5 करोड़ लोगों को रोजगार देता है और जीडीपी में 2% का योगदान देता है। गांधी ने तुलना करते हुए कहा कि बांग्लादेश को जीरो टैरिफ मिल रहा है, जबकि भारत के लिए यह 18% है, जो स्थानीय निर्माताओं को मार डालेगा और निर्यात में 10-15% की गिरावट लाएगा।

उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने बड़े कॉरपोरेट्स के निहित स्वार्थों के चलते यह समझौता जल्दबाजी में किया है, जिसमें भारत को न्यूनतम राहत मिली है लेकिन कन्सेशन्स बहुत ज्यादा देने पड़े हैं।

दबाव की राजनीति: अडानी केस और एपस्टीन फाइल्स का उठा मुद्दा

संसद में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को “कॉम्प्रोमाइज्ड” बताते हुए अडानी के US केस और एपस्टीन फाइल्स का विवादास्पद जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि ये सरकार के लिए “दबाव बिंदु” (Pressure Points) हैं। गांधी का आरोप है कि अडानी केस मोदी और भाजपा के फाइनेंशियल स्ट्रक्चर को टारगेट करता है, जबकि एपस्टीन फाइल्स की अनरिलीज्ड सामग्री से व्यक्तिगत छवि पर खतरा है।

उन्होंने कहा कि पिछले 18 महीनों से संवेदनशील मामलों पर सरकार की चुप्पी राष्ट्रीय हितों से ज्यादा व्यक्तिगत बचाव को दिखाती है। गांधी के अनुसार, 4 महीने से अटकी यह डील ट्रंप के दबाव में अचानक साइन हुई क्योंकि “प्रधानमंत्री की आँखों में डर दिखता है।” यह राहुल का ‘समर्पण’ आरोप व्यक्तिगत कमजोरी को राष्ट्रीय नीति से जोड़कर सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है।

इसे भी पढ़े : रूसी तेल पर जवाब: क्या भारत रोकेगा आयात? विदेश मंत्रालय ने बताया

इंडिया एलायंस का विजन: डेटा संप्रभुता और बराबरी की भाषा

अपनी सरकार की तुलना करते हुए राहुल गांधी ने दावा किया कि यदि इंडिया एलायंस सत्ता में होता, तो वह ट्रंप से “बराबरी की भाषा” में बात करता। उन्होंने डेटा को “21वीं सदी का सबसे बड़ा एसेट” बताया और कहा कि वे डेटा लोकलाइजेशन, डिजिटल टैक्स और सोर्स कोड डिस्क्लोजर पर नियंत्रण रखते।

गांधी ने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार ने डेटा लोकलाइजेशन हटाकर और डिजिटल टैक्स पर कैप लगाकर बड़े टेक (Big Tech) को फायदा पहुँचाया है और भारत का बेशकीमती डेटा अमेरिका को सौंप दिया है।

उन्होंने कहा कि इंडिया एलायंस किसानों और ऊर्जा हितों को प्राथमिकता देता और पाकिस्तान जैसी तुलना कभी स्वीकार नहीं करता। गांधी के अनुसार, डेटा का फ्री फ्लो भारत की डिजिटल संप्रभुता पर एक स्थायी घाव है।

आर्थिक प्रभाव: मुद्रास्फीति और आयात बिल में भारी बढ़ोतरी का डर

आर्थिक विश्लेषण पेश करते हुए गांधी ने बताया कि महंगे अमेरिकी या वेनेजुएला तेल पर निर्भरता से भारत में मुद्रास्फीति 2-3% तक बढ़ सकती है। अमेरिका से तेल आयात 2025 में सिर्फ 8.1% था, और अब रूसी तेल की कमी को पूरा करने के लिए महंगे विकल्प अपनाने से आयात बिल पर 1-2% का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

भारत की विविधीकरण नीति अब पूरी तरह अमेरिकी दबाव में बदल गई है। राहुल का ‘समर्पण’ आरोप इस पर भी केंद्रित था कि व्हाइट हाउस के एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में “डायरेक्ट या इंडायरेक्ट” रूसी तेल खरीद पर 25% टैरिफ स्नैपबैक (Snapback) का प्रावधान है, जो भारत की विदेश नीति पर अमेरिकी मॉनिटरिंग को संस्थागत बनाता है। यह कूटनीतिक दबाव भारत की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक नुकसान पहुँचाएगा।

इसे भी पढ़े : एपस्टीन फाइल्स का सच: प्रधानमंत्री मोदी पर लगे आरोपों की पूरी पड़ताल

राष्ट्रीय संप्रभुता बनाम सुपरपावर के साथ साझेदारी

अंत में, राहुल गांधी की स्पीच भारत के लिए एक कड़ी चेतावनी की तरह उभरी है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सुपरपावर के साथ सौदेबाजी में “समानता” का दावा करना तो आसान है, लेकिन हकीकत में भारत की कमजोरियां उजागर हो गई हैं।

यह डील केवल राष्ट्रीय गौरव पर हमला नहीं है, बल्कि ऊर्जा, कृषि, उद्योग और डेटा संप्रभुता को स्थायी नुकसान पहुँचाने वाला कदम है। विपक्ष इसे “देश बेचना” करार दे रहा है और सरकार की चुप्पी इस आलोचना को और बल दे रही है।

गांधी ने जोर देकर कहा कि असल चुनौती आत्मनिर्भरता की है और व्यापार समझौतों से ऊर्जा निर्णयों को अलग रखना होगा। यदि सरकार इन ठोस आरोपों का जवाब नहीं देती, तो यह समझौता भारतीय इतिहास में एक “असंतुलित सौदे” के रूप में दर्ज किया जाएगा।

इसे भी पढ़े : शिक्षा का राजनीतिकरण: राहुल गांधी का RSS और BJP पर बड़ा हमला

Spread the love

Post Comment

You May Have Missed