“राहुल बनाम सब्सटैंटिव मोशन” यह लोकतंत्र की हत्या है या कानूनी कार्रवाई?
सत्ताधारी खेमा राहुल गांधी के खिलाफ प्रिवलेज मोशन की धमकी देकर महज 24 घंटे में राहुल बनाम सब्सटैंटिव मोशन की ओर मुड़ गया, जो संसदीय प्रक्रिया की बजाय राजनीतिक चालबाजी और प्रक्रियागत मजबूरी का स्पष्ट प्रमाण है।
किरेन रिजिजू ने 12 फरवरी 2026 को लोकसभा में खुलेआम कहा था कि राहुल गांधी के “असंसदीय” बयानों, जिनमें अमेरिका के साथ इंटरिम ट्रेड डील पर आरोप, पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब का जिक्र, और पीएम मोदी पर “देश बेचने” जैसे दावे शामिल थे, के लिए प्रिवलेज मोशन लाया जाएगा।
लेकिन अगले ही दिन 13 फरवरी को रिजिजू ने पुष्टि कर दी कि सरकार अपना प्रस्तावित मोशन ड्रॉप कर रही है, क्योंकि बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने पहले ही “सब्सटैंटिव मोशन” का नोटिस दे दिया है।
प्रक्रियागत खामियां और प्रिवलेज कमेटी का अभाव
असल वजह कोई नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ी प्रक्रियागत खामी है। लोकसभा में वर्तमान में प्रिवलेज कमेटी का गठन ही नहीं हुआ है। पिछली कमेटी का कार्यकाल जून 2024 में समाप्त हो चुका था और नई कमेटी अस्तित्व में नहीं आई है। इसके साथ ही, डिप्टी स्पीकर का पद 2014 से खाली पड़ा है।
बिना प्रिवलेज कमेटी के ‘ब्रीच ऑफ प्रिवलेज’ की जांच करना तकनीकी रूप से असंभव हो जाता। यही कारण है कि सरकार ने “प्राइवेट मेंबर” निशिकांत दुबे के मोशन को अपनाकर अपनी कमजोरी छिपाई और जनता के सामने “सख्त कार्रवाई” का दिखावा किया। राहुल बनाम सब्सटैंटिव मोशन का यह खेल दरअसल सरकार की वैधानिक विवशता को ढंकने का एक तरीका मात्र है।
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तकनीकी यू-टर्न के पीछे छिपी रणनीतिक घबराहट
यह यू-टर्न महज तकनीकी नहीं, बल्कि रणनीतिक घबराहट और अधिक गंभीर हमले की तैयारी का संकेत है। प्रिवलेज मोशन आमतौर पर ‘ब्रीच ऑफ प्रिवलेज’ पर आधारित होता है, जहां सदन या स्पीकर की गरिमा को ठेस पहुंचाने का आरोप लगता है। इसमें कमेटी जांच के बाद सिफारिश करती है, जो प्रायः चेतावनी, माफी या कुछ समय के निलंबन तक सीमित रहती है।
लेकिन राहुल बनाम सब्सटैंटिव मोशन के तहत दुबे की मांग सीधे राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द करने और उन्हें आजीवन चुनाव लड़ने से वंचित करने की है। यह प्रिवलेज के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर सीधे राजनीतिक अस्तित्व पर प्रहार करने की कोशिश है।
गंभीर आरोप: साजिश और विदेशी ताकतों का जिक्र
निशिकांत दुबे का मोशन केवल बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अत्यंत गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसमें दावा किया गया है कि राहुल गांधी “एंटी-इंडिया फोर्सेस” जैसे जॉर्ज सोरोस, फोर्ड फाउंडेशन और USAID के साथ मिलकर विदेशी दौरों के जरिए देश को अस्थिर करने की साजिश रच रहे हैं।
किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि मोशन स्वीकार होने पर स्पीकर से सलाह लेकर इसे प्रिवलेज कमेटी, एथिक्स कमेटी या सीधे सदन में चर्चा के लिए भेजा जा सकता है। यह बदलाव दिखाता है कि सत्ता पक्ष अब राहुल को राजनीतिक रूप से समाप्त करना चाहता है, क्योंकि प्रिवलेज रूट में मामला लटकने का जोखिम ज्यादा था।
संवैधानिक प्रावधान और 1988 की संसदीय गाइडलाइंस
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि 1988 की संसदीय गाइडलाइंस, लोकसभा की प्रक्रिया नियमावली और संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक, किसी सदस्य को उसकी सदस्यता से वंचित करना इतना सरल नहीं है। ऐतिहासिक रूप से प्रिवलेज कमेटी की सिफारिशों को सदन में बहुमत से पास करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, जैसे केशव सिंह केस और MSM शर्मा केस, ने स्पष्ट किया है कि संसदीय विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105) का दुरुपयोग व्यक्तिगत बदले या राजनीतिक प्रतिशोध के लिए नहीं किया जा सकता। राहुल बनाम सब्सटैंटिव मोशन में “देश विभाजन की साजिश” जैसे अतिरंजित आरोप तो हैं, लेकिन इसकी कानूनी स्थिरता संदिग्ध है।
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निष्कासन की मांग और सुप्रीम कोर्ट की चुनौती
अगर यह सब्सटैंटिव मोशन बहुमत से पास भी हो जाता है, तो इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 के तहत अयोग्यता के आधार बहुत सीमित हैं, जिनमें दल-बदल (Defection) या लाभ का पद (Office of Profit) जैसे बिंदु शामिल हैं, न कि राजनीतिक भाषण।
1988 के जर्नल ऑफ पार्लियामेंटरी इंफॉर्मेशन और लोकसभा नियमों में भी ऐसे मामलों में जांच, न्यूनतम सजा और नैतिकता पर जोर दिया गया है, न कि सीधे आजीवन प्रतिबंध पर। सत्ता पक्ष का “लाइफटाइम बैन” तक की बात करना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत नजर आता है।
बजट सत्र की आलोचना से उपजी बेचैनी
सत्ताधारी दल की यह हरकत राहुल गांधी की बजट सत्र में की गई तीखी आलोचना से उपजी बेचैनी को उजागर करती है। चाहे वह भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर “राष्ट्रीय हितों से समझौता” का आरोप हो, एपस्टीन फाइल्स में हरदीप पुरी के कथित लिंक का जिक्र हो, या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उठाए गए सवाल—सरकार तथ्यों से जवाब देने के बजाय आवाज दबाने की कोशिश कर रही है।
प्रिवलेज मोशन से पीछे हटना इस बात का पुख्ता सबूत है कि उन्हें पता था कि डिप्टी स्पीकर की अनुपस्थिति और कमेटी न होने से मामला फंस सकता है। इसलिए दुबे के नाम पर “प्राइवेट मेंबर” कार्ड खेलकर सरकार ने अपने हाथ साफ रखने की कोशिश की है।
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लोकतंत्र की नींव और भविष्य का संकट
राहुल गांधी के द्वारा उठाए गए मुद्दों के डर के कारण रचा गया यह पूरा ड्रामा भारतीय संसद की गरिमा को प्रभावित कर रहा है। जब विपक्ष के नेता पर “झूठ बोलने” का आरोप लगाकर सदन चलाया जाता है, लेकिन खुद सत्ता पक्ष प्रक्रियागत खामियों के कारण पीछे हट जाता है, तो यह लोकतंत्र की कमजोरी को दर्शाता है।
राहुल बनाम सब्सटैंटिव मोशन के जरिए किसी को आजीवन चुनाव से बाहर करने की मांग विपक्ष को कुचलने की एक खुली कोशिश है।
अगर यह परिपाटी बनती है, तो भविष्य में हर मुखर आलोचक इसी तरह निशाना बनाया जाएगा और संसद बहस की जगह प्रतिशोध का अखाड़ा बन जाएगी। अंततः, यह यू-टर्न राजनीतिक असुरक्षा का प्रतीक है जो सत्ता की असली कमजोरी को जनता के सामने उजागर कर रहा है।
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