आंगनवाड़ी विवाद खत्म: केंद्रपाड़ा में दलित कुक की नियुक्ति पर बनी सहमति
ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले से सामाजिक न्याय और सद्भाव की एक बड़ी खबर सामने आई है, जहाँ पिछले 86 दिनों से जारी आंगनवाड़ी विवाद अब पूरी तरह सुलझ गया है।
राजनगर ब्लॉक के नुआगांव गांव में एक दलित महिला, शर्मिष्ठा सेठी की कुक-कम-हेल्पर के तौर पर नियुक्ति के बाद शुरू हुआ यह गतिरोध जिला प्रशासन और स्टेट कमीशन फॉर विमेन के हस्तक्षेप के बाद खत्म हुआ। शनिवार को हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद गांव वाले सोमवार से अपने बच्चों को आंगनवाड़ी सेंटर भेजने पर राजी हो गए हैं।
इस समझौते को पुख्ता करने के लिए एक कम्युनिटी दावत का भी आयोजन किया गया, जहाँ 23 वर्षीय दलित कुक शर्मिष्ठा ने खुद ग्रामीणों को खाना परोसा। यह न केवल एक प्रशासनिक जीत है, बल्कि समाज की रूढ़िवादी सोच के खिलाफ एक बड़ी कामयाबी भी मानी जा रही है।
संसद तक गूँजी नुआगांव की आवाज़: मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्यसभा में उठाया मुद्दा
इस मामले ने उस वक्त तूल पकड़ा और पूरे देश का ध्यान खींचा जब 12 फरवरी को राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे जीरो आवर के दौरान उठाया। खड़गे ने चिंता जताते हुए कहा कि 21वीं सदी में जब हम सामाजिक सुधार और एकता की बात करते हैं, तब एक खास समुदाय के लोग दलित महिला के हाथ का बना खाना खाने से बच्चों को रोक रहे हैं।
उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने समय रहते कार्रवाई की होती, तो यह 85-86 दिनों का बॉयकॉट नहीं होता। खड़गे के हस्तक्षेप के बाद जिला प्रशासन ने नए सिरे से कोशिशें तेज कीं। शर्मिष्ठा सेठी, जो एक ग्रेजुएट हैं,
उनकी नियुक्ति नवंबर 2025 में हुई थी क्योंकि वे अकेली आवेदिका थीं, लेकिन उनकी जाति के कारण गांव के ऊँची जाति के परिवारों ने सेंटर का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया था।
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आंगनवाड़ी विवाद, प्रशासन की मैराथन बैठकें और घर-घर जाकर सुलह की कोशिशें
इस आंगनवाड़ी विवाद को सुलझाने के लिए शनिवार को एक बड़ी बैठक हुई जिसमें 150 से ज्यादा गांववालों ने हिस्सा लिया। यह बुधवार की बैठक से बिल्कुल अलग था, जिसमें प्रशासन के बुलावे पर सिर्फ दो लोग ही आए थे। इस बैठक में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट नवकृष्ण जेना, सब-कलेक्टर अरुण नायक, और स्टेट विमेन कमीशन की मेंबर कल्पना मलिक सहित पुलिस अधिकारियों और एक्टिविस्टों ने शिरकत की।
अधिकारियों ने न केवल सामूहिक चर्चा की, बल्कि वे घर-घर जाकर लोगों से मिले और उन्हें सामाजिक मेलजोल बढ़ाने की अहमियत समझाई। ग्रामीणों को जागरूक किया गया कि वे अपने बच्चों को उनके संवैधानिक अधिकारों और प्री-स्कूल शिक्षा से वंचित नहीं कर सकते।
नुक्कड़ नाटक और पाला गायकों के जरिए मिटाया जातिवाद का जहर
जातिगत भेदभाव के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए प्रशासन ने पारंपरिक तरीकों का सहारा लिया। गांव में ‘नुक्कड़ नाटक’ और स्थानीय ओडिया कला ‘पाला’ के जरिए लोगों को बताया गया कि छुआछूत और भेदभाव के सामाजिक खतरे क्या हैं।
पाला गायकों ने अपनी कला के माध्यम से भाईचारे का संदेश दिया। सब-कलेक्टर अरुण नायक ने बताया कि इन कोशिशों से गांववालों को यह समझने में मदद मिली कि बॉयकॉट से उनके बच्चों के भविष्य का नुकसान हो रहा है।
प्रशासन ने आर्टिकल 21(A) के तहत शिक्षा के अधिकार के बारे में भी ग्रामीणों को जानकारी दी, जिससे उनकी पुरानी सोच में बदलाव आया और मामला आपसी सहमति से सुलझ गया।
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शर्मिष्ठा सेठी का संघर्ष: ग्रेजुएट हेल्पर जिसकी आंखों में थे आंसू
शर्मिष्ठा सेठी, जो इस पूरे आंगनवाड़ी विवाद के केंद्र में थीं, ने बताया कि बॉयकॉट के दौरान उनका दिल पूरी तरह टूट गया था। वे कहती हैं, “मेरी क्या गलती थी? मैं एक्सपीरियंस लेना चाहती हूं और भविष्य में टीचर बनना चाहती हूं।”
शर्मिष्ठा ग्रेजुएट होने के बावजूद बच्चों की सेवा करने के लिए इस पद पर आईं, लेकिन छुआछूत की वजह से वे तीन महीने तक सेंटर के गेट पर अकेली बैठकर बच्चों का इंतजार करती थीं।
उन्होंने कहा कि वे अब बच्चों के वापस आने का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं और महिलाओं व बच्चों को सरकार द्वारा दिया गया पौष्टिक आहार देने के लिए बेताब हैं। उनकी इस सहनशीलता और प्रशासन के सहयोग ने आखिरकार गांव की दीवारें गिरा दीं।
गर्भवती महिलाओं और बच्चों के पोषण पर पड़ा था बुरा असर
नदी किनारे बसे इस नुआगांव में करीब 45 परिवार रहते हैं, जिनमें सात दलित परिवार शामिल हैं। घड़ियामाला सरपंच शैलेंद्र मिश्रा के मुताबिक, 86 दिनों के इस बॉयकॉट के कारण न केवल 20 से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई, बल्कि गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं ने भी सेंटर आना बंद कर दिया था।
उन्हें ममता योजना के तहत मिलने वाला सत्तू, अंडे, आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंट, टीकाकरण और हेल्थ एजुकेशन नहीं मिल पा रही थी। यह बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बन गया था। हालांकि, अब जब बॉयकॉट खत्म हो गया है, तो सभी को दोबारा न्यूट्रिशनल सपोर्ट मिलना शुरू हो जाएगा।
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भविष्य की योजनाएं: गांववालों ने सड़क और पेंशन की भी रखी मांग
सुलह के दौरान गांववालों ने अपनी अन्य समस्याओं की ओर भी प्रशासन का ध्यान खींचा। नुआगांव के निवासियों ने सड़क संपर्क, तटबंधों को मजबूत करने, वृद्धावस्था पेंशन और आंगनवाड़ी व स्कूल की पक्की बिल्डिंग बनाने की मांग रखी।
सब-कलेक्टर ने उन्हें भरोसा दिलाया कि इन शिकायतों की प्राथमिकता के आधार पर जांच की जाएगी। इस बातचीत के दौरान ग्रामीणों का रुख नरम हुआ और गोबरधन प्रधान जैसे ग्रामीणों ने कहा कि वे पुराने झगड़े भूलकर अब शर्मिष्ठा की नौकरी का विरोध नहीं करेंगे।
मामला सुलझने के बाद अब 450 की आबादी वाले इस गांव में भाईचारा और सामाजिक मेलजोल फिर से बहाल होता दिख रहा है।
सामाजिक सद्भाव की मिसाल: सोमवार से फिर गूँजेगी बच्चों की किलकारी
ओडिशा स्टेट कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (OSCPCR) की मेंबर सुजाता नायक और महिला आयोग की मेंबर कल्पना मलिक ने पुष्टि की है कि माता-पिता की सहमति के बाद सोमवार से आंगनवाड़ी सेंटर सामान्य रूप से काम करेगा।
यह आंगनवाड़ी विवाद अब खत्म हो चुका है और प्रशासन ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निगरानी रखने का वादा किया है। सरपंच ने कहा कि यह एक छोटी सी घटना थी, लेकिन अब गांव में भाईचारा बना हुआ है।
शर्मिष्ठा अब उन बच्चों की ‘वर्चुअल मां’ बनने के अपने सपने को पूरा कर सकेंगी, जिन्हें वे अच्छे मैनर्स, स्वास्थ्य और पर्सनल हाइजीन की शिक्षा देना चाहती थीं।
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