Loading Now

“DPDP एक्ट बनाम RTI ” क्या खत्म हो जाएगी सरकारी पारदर्शिता?

DPDP एक्ट बनाम RTI

DPDP एक्ट बनाम RTI भारत के कानूनी इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है क्योंकि अब देश का नया डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 सुप्रीम कोर्ट की कड़ी निगरानी के दायरे में आ गया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के कुछ विवादित प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक बैच पर भारत सरकार को नोटिस जारी किया।

हालांकि, कोर्ट ने इस शुरुआती चरण में कानून के संचालन पर किसी भी तरह की अंतरिम राहत या रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत अब यह बारीकी से देख रही है कि क्या इस कानून के प्रावधान प्राइवेसी, ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी के बीच वह संवैधानिक संतुलन बना पाते हैं जिसकी दरकार एक जीवंत लोकतंत्र में होती है।

RTI की शक्तियों पर प्रहार और संवैधानिक चिंताओं का अंबार

पिटीशनर्स ने अपनी दलीलों में सबसे बड़ा प्रहार उन संशोधनों पर किया है जो सूचना के अधिकार (RTI) सिस्टम की नींव को हिलाते नजर आ रहे हैं। अदालती कार्यवाही के दौरान तर्क दिया गया कि ये बदलाव नागरिकों की सूचना तक पहुंच को काफी कमजोर कर देते हैं।

सबसे गंभीर चुनौती उन नियमों को लेकर है जो “पर्सनल जानकारी” के लिए छूट के दायरे को विस्तार देते हैं। पिटीशनर का दावा है कि इसने उस लंबे समय से चले आ रहे ‘पब्लिक इंटरेस्ट टेस्ट’ को ही खत्म कर दिया है, जिसके तहत पहले पारदर्शिता को निजता से ऊपर रखा जा सकता था।

अब बदला हुआ फ्रेमवर्क सूचना के खुलासे पर लगभग पूर्ण रोक लगाता है, जो कोर्ट द्वारा प्राइवेसी और जनता के जानने के अधिकार के बीच पहले से स्थापित बैलेंस को बिगाड़ रहा है।

इसे भी पढ़े:- बिल्डरों की ‘ढाल’ बना कानून? सुप्रीम कोर्ट बोला- RERA खत्म करना बेहतर

धारा 44(3) और लोकतंत्र के लिए ‘मौत की घंटी’ का दावा

इस कानूनी लड़ाई के केंद्र में DPDP एक्ट बनाम RTI का वह विवाद है जो सीधे तौर पर एक्ट के सेक्शन 44(3) से जुड़ा है। यह सेक्शन सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) को पूरी तरह बदल देता है। एक्टिविस्ट वेंकटेश नायक और NCPRI जैसे संगठनों ने वकील प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर के जरिए कोर्ट को बताया कि पहले के कानून में व्यक्तिगत जानकारी तभी छिपाई जा सकती थी जब उसका सार्वजनिक गतिविधि से संबंध न हो।

लेकिन अब, ‘पर्सनल जानकारी’ के नाम पर मिली व्यापक छूट पारदर्शिता के लिए घातक है। नायक की पिटीशन के शब्द बेहद कड़े हैं, जिसमें उन्होंने इस बदलाव को “पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी के लिए मौत की घंटी” और “ओपन गवर्नेंस के लिए विनाशकारी” करार दिया है।

पत्रकारों और नागरिक समाज की दलीलें: जवाबदेही पर गहराता संकट

कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वालों में केवल एक्टिविस्ट ही नहीं, बल्कि ‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव ट्रस्ट’ जैसे पत्रकार समूह और सिविल सोसाइटी भी शामिल हैं। इनका तर्क है कि डेटा सुरक्षा राज्य का जायज मकसद जरूर है, लेकिन मौजूदा स्वरूप में यह कानून प्राइवेसी की सुरक्षा के बहाने सार्वजनिक अधिकारियों को जांच से बचाने का एक सुरक्षा कवच बन सकता है।

आशंका जताई गई है कि अब लोक सेवकों की नियुक्तियों, ऑडिट रिपोर्ट, और सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल से जुड़ी किसी भी RTI एप्लीकेशन को ‘पर्सनल जानकारी’ के नाम पर ऑटोमैटिकली रिजेक्ट किया जा सकेगा। यह बदलाव उन तंत्रों को कमजोर करता है जो भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करने के लिए अनिवार्य हैं।

सुप्रीम कोर्ट का रुख: बड़ी बेंच को सौंपा गया मामला

मामले की गंभीरता को देखते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने माना कि इसमें महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल निहित हैं। बेंच ने स्पष्ट किया कि सरकार का पक्ष सुने बिना संसद द्वारा निर्मित कानून में दखल देना जल्दबाजी होगी।

हालांकि, कोर्ट ने इन कानूनी पेचीदगियों की गहराई से जांच करने के लिए याचिकाओं को एक बड़ी बेंच को भेजने का फैसला किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में और अधिक जजों की पीठ इस पर विचार करेगी कि DPDP एक्ट बनाम RTI के इस द्वंद्व में संवैधानिक श्रेष्ठता किसकी है। फिलहाल मार्च 2026 की संभावित तारीख तक कानून लागू रहेगा।

इसे भी पढ़े:- सोनम वांगचुक की हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को सख्त फटकार

डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की निष्पक्षता और सरकारी दखल पर सवाल

याचिकाओं में केवल सूचना के अधिकार तक ही सीमित आपत्ति नहीं है, बल्कि कानून के ढांचे पर भी बड़े सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025 के तहत बनने वाले ‘डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड’ की स्वतंत्रता को चुनौती दी है।

आरोप है कि बोर्ड के सदस्यों के चयन में कार्यपालिका (Executive) का दबदबा होगा, जो शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के खिलाफ है। इसके अलावा, एक्ट की धारा 36 और नियमों की धारा 23 केंद्र सरकार को बिना किसी स्पष्ट सुरक्षा उपाय के कंपनियों और डेटा हैंडलर्स से डेटा मांगने का असीमित अधिकार देती है।

यह सरकार को बिना किसी निगरानी के नागरिकों के डेटा तक पहुंचने का रास्ता देता है, जिससे अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा हो सकता है।

इकोनॉमिक सर्वे की चिंता और अधिकारियों की ‘सावधानी’

दिलचस्प बात यह है कि इस कानूनी बहस के बीच हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा जारी इकोनॉमिक सर्वे में भी RTI के कार्यक्षेत्र को ‘बेहतर’ बनाने की बात कही गई थी। सर्वे में तर्क दिया गया था कि यदि अधिकारियों की हर टिप्पणी सार्वजनिक हो जाएगी, तो वे साहसिक निर्णय लेने या स्पष्ट राय देने से बचेंगे और ‘सावधानी भरी भाषा’ का प्रयोग करेंगे।

सरकार का यह नजरिया पिटीशनर्स के उस डर को पुख्ता करता है कि प्रशासन अब पारदर्शिता के बजाय गोपनीयता की ओर बढ़ रहा है। DPDP एक्ट बनाम RTI की यह कानूनी जंग अब इस बात का फैसला करेगी कि क्या सरकारी अधिकारियों के जीवन में दो दशकों से चली आ रही पारदर्शिता अब “अंधेरे और अस्पष्टता” के दौर में बदल जाएगी।

इसे भी पढ़े:- पशुपालकों का आजीविका संकट: अडानी पोर्ट्स को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत

भविष्य की सुनवाई और संवैधानिक संतुलन की उम्मीद

11 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने और 13 नवंबर 2025 को धारा 44 के लागू होने के बाद, अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट की अगली बड़ी सुनवाई पर टिकी हैं। कोर्ट को यह तय करना है कि क्या अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत सूचना का मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 21 के प्राइवेसी के अधिकार के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है या नहीं।

जैसा कि DPDP एक्ट बनाम RTI मामले में एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने कहा—प्राइवेसी की चिंताओं से निपटने के लिए “छेनी की जगह हथौड़े” का इस्तेमाल किया गया है। आने वाले हफ्तों में होने वाली विस्तृत सुनवाई यह तय करेगी कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘जानने का अधिकार’ कितना सुरक्षित रह पाता है।

इसे भी पढ़े:- बंगाल मतदाता सूची संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बढ़ी समय सीमा

Spread the love

Post Comment

You May Have Missed