“ट्रंप का टैरिफ वार”दिल्ली की चुप्पी या वाशिंगटन का प्रोपेगेंडा?
ट्रंप का टैरिफ वार अगस्त 2025 में उस वक्त एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच गया जब अमेरिकी प्रशासन ने भारत पर 25% अतिरिक्त “पेनल्टी टैरिफ” थोपकर कुल टैरिफ को 50% के स्तर पर पहुंचा दिया। वाशिंगटन ने इसे यूक्रेन युद्ध में रूस को कमजोर करने की रणनीति बताया, लेकिन विशेषज्ञों की नजर में यह अमेरिकी ऊर्जा निर्यात (क्रूड और LNG) को भारत पर जबरन थोपने की कोशिश थी।
गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिकी तेल रूसी तेल की तुलना में $10-15 प्रति बैरल महंगा था। भारत के लिए यह सीधे तौर पर ब्लैकमेल था, क्योंकि 2025 के मध्य में रूसी तेल का आयात 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bpd) के शिखर पर था, जिसने 1.4 अरब भारतीयों के लिए ईंधन की कीमतों को काबू में रखा था। ट्रंप ने इसे “रूस की फंडिंग रोकने” का मुखौटा पहनाया, पर असल में यह भारत की अर्थव्यवस्था पर हमला था।
7 फरवरी 2026: ट्रुथ सोशल पर ट्रंप का ‘धमाका’ और डील का सच
फरवरी 2026 में ट्रंप का टैरिफ वार एक नई दिशा में मुड़ा जब ट्रंप ने ‘Truth Social’ पर दावा किया कि पीएम मोदी ने रूसी तेल खरीद बंद करने का “वादा” किया है। इसके बदले 7 फरवरी 2026 से पेनल्टी टैरिफ हटाकर कुल टैरिफ 18% कर दिया गया।
व्हाइट हाउस के एक्जीक्यूटिव ऑर्डर ने इसे भारत की “प्रतिबद्धता” बताया, लेकिन नई दिल्ली की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। न कोई संयुक्त बयान आया और न ही कोई लिखित समझौता सार्वजनिक हुआ। भारत सरकार की इस रहस्यमयी चुप्पी ने वाशिंगटन के प्रचार और दिल्ली की खामोश रणनीति के बीच एक बड़ी खाई पैदा कर दी है।
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जयशंकर की दो-टूक: ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ पर कोई समझौता नहीं
अमेरिकी दावों के बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में भारत का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” से बंधा है और ऊर्जा से जुड़े फैसले केवल “लागत, उपलब्धता और जोखिम” के आधार पर लिए जाएंगे।
जयशंकर का यह कड़ा रुख दर्शाता है कि भारत किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुका है। जबकि वाशिंगटन अपनी जीत का ढोल पीट रहा है, दिल्ली बाजार की हकीकतों को देखते हुए अपने फैसले ले रही है, जहाँ अब रूसी तेल का डिस्काउंट पहले जैसा नहीं रहा।
बाजार की हकीकत: क्यों गिरा रूसी तेल का ग्राफ?
2025 के मध्य में 2 मिलियन bpd पर रहने वाला रूसी आयात जनवरी 2026 तक गिरकर 1.1 मिलियन bpd रह गया। आईईए (IEA) के मुताबिक, दिसंबर 2025 में भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी 44% से घटकर 24.9% रह गई।
इसके पीछे ट्रंप का टैरिफ वार ही नहीं, बल्कि रोसनेफ्ट-लुकोइल पर अमेरिकी प्रतिबंध और यूरोपीय रिफाइंड उत्पादों पर बैन भी जिम्मेदार थे।
भारत ने मजबूरी में नहीं, बल्कि व्यावहारिक रणनीति के तहत इराक, सऊदी अरब और अमेरिका से तेल आयात बढ़ाकर विविधीकरण किया है। रिफाइनर्स ने अप्रैल 2026 की डिलीवरी के लिए रूसी तेल से दूरी बनाई है, लेकिन इसे पूरी तरह बंद नहीं किया।
भारत-अमेरिका संबंध: ‘रणनीतिक साझेदारी’ की कड़वी सच्चाई
यह पूरा घटनाक्रम भारत-अमेरिका संबंधों में असमानता की एक खतरनाक मिसाल है। ट्रंप ने साबित किया कि “स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” भी अमेरिकी हितों के आगे बौनी हो सकती है।
क्वाड और रक्षा सौदों (जैसे F-35 या GE इंजन) के लिए भारत को अमेरिका की जरूरत है, लेकिन ऊर्जा के मामले में वाशिंगटन भारत को एक “छोटे भाई” की तरह ट्रीट कर रहा है। ट्रंप की नीतियां भरोसे को खोखला कर रही हैं। भारत को अब यह समझना होगा कि ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति में कोई भी पार्टनर तभी तक है, जब तक वह उनके एजेंडे में फिट बैठता है।
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वैश्विक बाजार पर असर और चीन का बढ़ता प्रभाव
रूस को दबाने की सनक में ट्रंप प्रशासन वैश्विक ऊर्जा बाजार को विकृत कर रहा है। भारत द्वारा रूसी तेल कम खरीदने का सीधा मतलब है कि मॉस्को अब चीन पर और अधिक निर्भर होगा, जो वैश्विक संतुलन के लिए ठीक नहीं है। भारत के लिए रूसी तेल छोड़ने का मतलब ऊर्जा कीमतों में 1-2% का उछाल और महंगाई का बढ़ना है।
ट्रंप भले ही वेनेजुएला को विकल्प बताएं, लेकिन वहां की राजनीतिक अस्थिरता और कम डिस्काउंट भारत के रिफाइनर्स के लिए घाटे का सौदा है। भारत का “ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि” का रुख किसी की गुलामी नहीं, बल्कि 1.4 अरब नागरिकों की आत्मनिर्भरता की लड़ाई है।
अग्निपरीक्षा: क्या भारत दबाव में टूट गया?
भारत की स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी अब अपनी सबसे बड़ी परीक्षा से गुजर रही है। मोदी सरकार ने घरेलू स्तर पर तो कड़ा संदेश दिया है, लेकिन अगर रूसी आयात इसी तरह गिरता रहा और अमेरिकी तेल की हिस्सेदारी बढ़ती रही, तो जनता सवाल पूछेगी।
क्या यह स्वायत्तता है या आर्थिक ब्लैकमेल के आगे घुटने टेकना? ट्रंप ने दिखाया है कि बड़े लोकतंत्र भी दबाव में आ सकते हैं, लेकिन भारत को रूस के पुराने रिश्तों और अमेरिका के नए अवसरों के बीच संतुलन बनाना ही होगा।
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इतिहास लिखेगा भारत की स्वायत्तता की कहानी
तनाव की यह घड़ी भारत की विदेश नीति का असली पैमाना है। अगर दिल्ली रूसी तेल का एक सीमित (15-20%) हिस्सा बनाए रखती है, तो यह ट्रंप का टैरिफ वार झेलकर भी स्वायत्तता की जीत होगी।
लेकिन अगर यह पूरी तरह रुक गया, तो इतिहास कहेगा कि 2026 में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा का सौदा कर लिया। समय बताएगा कि मोदी का “मल्टी-एलाइनमेंट” ट्रंप के “अमेरिका फर्स्ट” के सामने टिकता है या नहीं, और क्या जयशंकर के शब्द—कि भारत स्वतंत्र निर्णय लेने वाला देश है—हकीकत बन पाते हैं।
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