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आरएंडडी बजट में सड़ांध: इंडिया एआई समिट में खुली दावों की पोल

आरएंडडी बजट में सड़ांध

आरएंडडी बजट में सड़ांध दिल्ली में फरवरी 2026 में आयोजित “India AI Impact Summit” को अब सोशल मीडिया पर “Apna Insult Summit” का टैग मिल चुका है और यह एक वायरल मीम बन गया है। पहले दिन से ही इस वैश्विक आयोजन में भारी भीड़, मील लंबी कतारें, असंगठित सिक्योरिटी स्वीप्स और इंटरनेट की बेहद खराब कनेक्टिविटी ने भारत की छवि को नुकसान पहुँचाया।

इतना ही नहीं, समिट में पानी और खाने की भारी कमी देखी गई और कुछ स्टॉल्स से सामान चोरी होने की शिकायतों ने इवेंट को वैश्विक स्तर पर शर्मिंदगी का शिकार बना दिया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस स्थिति को “utter chaos” करार देते हुए इसे एक “PR hungry government” की बड़ी नाकामी बताया।

स्थिति तब और हास्यास्पद हो गई जब प्रधानमंत्री मोदी के आगमन पर मुख्य हॉल को खाली कराया गया और एक्जिबिटर्स को उनके ही स्टॉल्स से बाहर निकाल दिया गया। इंटरनेट फेलियर के कारण कई महत्वपूर्ण तकनीकी डेमो फेल हो गए। आरएंडडी बजट में सड़ांध का असर साफ दिखा, जिसके बाद आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी और उन्होंने स्थिति सुधारने के लिए ‘वॉर रूम’ सेटअप करने का वादा किया।

घोषणाओं और हकीकत के बीच गहराता अंतर

यह केवल एक इवेंट की विफलता नहीं है, बल्कि भारत की एआई महत्वाकांक्षा और ग्राउंड-लेवल एक्जीक्यूशन के बीच मौजूद गहरे गैप का प्रतीक है। जब देश ग्लोबल एआई लीडर बनने का दावा करता है, तब बेसिक लॉजिस्टिक्स, कनेक्टिविटी और ऑर्गनाइजेशन की ऐसी खामियाँ सवाल खड़े करती हैं। आरएंडडी बजट में सड़ांध के कारण ही भारत अनुसंधान के मामले में पिछड़ रहा है।

इकनॉमिक सर्वे 2025-26 और हालिया सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत का Gross Expenditure on Research and Development (GERD) जीडीपी का महज 0.64% है। यह आंकड़ा पिछले कई वर्षों से 0.6-0.7% के बीच स्थिर बना हुआ है, जिसकी पुष्टि यूनेस्को, वर्ल्ड बैंक और DST के आँकड़े भी करते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि जहाँ दुनिया नवाचार की ओर भाग रही है, भारत अभी भी बुनियादी निवेश के लिए संघर्ष कर रहा है।

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वैश्विक तुलना में भारत का अनुसंधान खर्च बेहद कम

यदि हम वैश्विक आंकड़ों से तुलना करें, तो भारत का निवेश चिंताजनक है। चीन अपनी जीडीपी का 2.4-2.7%, अमेरिका 3.5-3.6%, जबकि इजरायल और दक्षिण कोरिया 5% से ज्यादा खर्च करते हैं। भारत का कुल GERD लगभग 1.27 लाख करोड़ रुपये (पीपीपी में 58 बिलियन डॉलर) रहा, जो चीन और अमेरिका के खर्च का दसवां हिस्सा भी नहीं है।

सबसे बड़ी समस्या निजी क्षेत्र की कम भागीदारी है, जो केवल 36-41% है, जबकि विकसित देशों में यह हिस्सा 70% से अधिक होता है। सरकार ने ‘India AI Mission’ (₹10,372 करोड़) और ₹1 लाख करोड़ का RDI फंड जैसी योजनाएं तो शुरू की हैं, लेकिन आरएंडडी बजट में सड़ांध के कारण ये अभी तक बड़े पैमाने पर असर नहीं दिखा पा रही हैं। पिछले 10 सालों में प्रतिशत के मामले में कोई बड़ा उछाल न आना सिस्टमिक विफलता का प्रमाण है।

रिसर्च कल्चर की दुर्दशा और ‘WhatsApp University’ का बोलबाला

देश में शोध की संस्कृति की हालत और भी गंभीर है। पीएचडी स्कॉलर्स को “30-35 साल पढ़ने वाले” कहकर अक्सर तंज का शिकार बनाया जाता है। जेएनयू, जादवपुर और हैदराबाद यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों को राजनीतिक रूप से टारगेट किया जाता है, जिससे शोध का माहौल खराब होता है।

भारत में यूपीएससी और सरकारी नौकरी को ही “सपनों का शिखर” माना जाता है, जिससे शोध कार्यों को सेकंड-क्लास ट्रीटमेंट मिलता है। यूजीसी जैसी संस्थाएं विवादों में फंसी रहती हैं और शिक्षा मंत्री की भूमिका पर कोई गंभीर चर्चा नहीं होती।

कैंपस में अब “WhatsApp University” कल्चर फैल गया है, जहां तथ्यों से ज्यादा फॉरवर्डेड मैसेज पर यकीन किया जाता है। हालाँकि क्यूएस रैंकिंग में भारतीय यूनिवर्सिटीज की संख्या 2015 के 11 से बढ़कर 2026 में 54 हो गई है और भारत रिसर्च आउटपुट में दुनिया में तीसरे स्थान पर है, लेकिन गुणवत्ता, फंडिंग और इंडस्ट्री लिंक की कमी से वास्तविक इनोवेशन नहीं हो पा रहा है।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व और एआई पॉलिसी का दोगलापन

एआई समिट में बिहार जैसे राज्यों से तकनीकी पृष्ठभूमि न रखने वाले प्रतिनिधियों की भागीदारी पर भी सवाल उठे हैं। हालांकि “सातवीं पास” मंत्री का कोई सीधा संदर्भ नहीं मिला, लेकिन यह राजनीतिक नियुक्तियों की उस व्यापक समस्या को उजागर करता है जहां अयोग्य लोग तकनीकी मंचों पर प्रतिनिधित्व करते हैं।

वैश्विक स्तर पर जहाँ सैम ऑल्टमैन और सुंदर पिचाई जैसे दिग्गज एआई गवर्नेंस पर चर्चा कर रहे थे, वहां भारत में कई बार ऐसे इवेंट्स केवल ‘फोटो-ऑप’ और ‘PR शोकेस’ बनकर रह जाते हैं। एक तरफ “AI for All” और “विकसित भारत” का नारा दिया जाता है, तो दूसरी तरफ ग्राउंड पर अयोग्य नेतृत्व संदेश को कमजोर करता है। यह स्पष्ट है कि आरएंडडी बजट में सड़ांध केवल आर्थिक नहीं बल्कि प्रशासनिक भी है।

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गलगोटिया यूनिवर्सिटी और ‘फेक इनोवेशन’ का शर्मनाक मामला

समिट के दौरान निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की गुणवत्ता पर भी पोल खुल गई। गलगोटिया यूनिवर्सिटी का मामला सबसे ताजा उदाहरण है, जहाँ उनकी कम्युनिकेशन प्रोफेसर नेहा सिंह ने दावा किया कि रोबोट डॉग “Orion” उनकी यूनिवर्सिटी के Centre of Excellence द्वारा विकसित है।

हालांकि, फैक्ट-चेक में पता चला कि यह चीन की Unitree Robotics का ‘Go2’ मॉडल है जिसकी कीमत मात्र $1600-2800 है। सोशल मीडिया पर फजीहत के बाद यूनिवर्सिटी को स्टॉल खाली करने का आदेश मिला।

यूनिवर्सिटी ने सफाई दी कि प्रोफेसर “ill-informed” थीं, लेकिन यह संस्थागत समस्या को दिखाता है जहाँ असली शोधकर्ताओं के बजाय मार्केटिंग फैकल्टी को तकनीकी डेमो के लिए भेजा जाता है। यह दिखाता है कि आरएंडडी बजट में सड़ांध किस तरह निजी संस्थानों में “दिखावे की संस्कृति” को जन्म दे रही है।

प्राइवेट इन्वेस्टमेंट और तकनीकी आत्मनिर्भरता की चुनौतियाँ

भारत टेक क्षेत्र में फ्रंट-रनर बनना चाहता है, लेकिन पिछले दशक में अनुसंधान बजट जीडीपी के प्रतिशत में स्थिर रहा है। हालाँकि 38,000+ GPUs को ऑनबोर्ड किया गया है और 12 स्वदेशी LLM टीमों को शॉर्टलिस्ट किया गया है, लेकिन निजी निवेश अभी भी अपर्याप्त है।

2013 से अब तक का $11.1 बिलियन का प्राइवेट एआई इन्वेस्टमेंट भारत जैसे विशाल देश के लिए बहुत कम है। जब तक रिसर्च को राजनीति से मुक्त नहीं किया जाएगा और यूनिवर्सिटीज में फंडिंग व मेंटरशिप को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक “विकसित भारत @2047” का सपना केवल कागजों पर ही रहेगा। निजी क्षेत्र को वास्तविक टैक्स इंसेंटिव्स और आईपीआर प्रोटेक्शन के साथ जोड़ना अब समय की मांग है।

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पीआर इवेंट्स से आगे निकलने की जरूरत

कुल मिलाकर, भारत की असली समस्या टैलेंट की कमी नहीं, बल्कि सिस्टमिक उपेक्षा और एक्जीक्यूशन गैप है। एआई समिट की अव्यवस्था और गलगोटिया का रोबोट फियास्को वैश्विक बेइज्जती नहीं, बल्कि हमारी घरेलू हकीकत का आईना है।

अगर हमें वास्तव में प्रगति करनी है, तो आरएंडडी पर कम से कम 2% जीडीपी खर्च करना होगा और विश्वविद्यालयों को राजनीति से मुक्त कर उन्हें शोध का केंद्र बनाना होगा।

केवल पीआर इवेंट्स और फोटो सेशन से ग्लोबल लीडरशिप नहीं मिलेगी। सच्ची प्रगति तभी आएगी जब नवाचार को राष्ट्रीय सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया जाएगा। अन्यथा, ऐसे “इंसल्ट समिट” और फर्जी नवाचार के किस्से हमारी छवि को धूमिल करते रहेंगे और वैश्विक नेतृत्व का सपना अधूरा रह जाएगा।

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