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‘ओपन टू वर्क’, प्रोफेसर नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी से बाहर या अंदर?

नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी

प्रोफेसर नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नाम इस समय इंटरनेट पर सबसे ज्यादा चर्चा में है, और इसकी वजह है दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026′

इस हाई-प्रोफाइल इवेंट में एक रोबोटिक कुत्ते ‘ओरियन’ को प्रदर्शित करते हुए प्रोफेसर नेहा सिंह ने दावा किया था कि इसे यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ में विकसित किया गया है। जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ, टेक एक्सपर्ट्स ने पहचान लिया कि यह असल में चीन की कंपनी ‘यूनिट्री रोबोटिक्स’ का ‘Unitree Go2’ मॉडल है।

इसके बाद सोशल मीडिया पर मचे बवाल और गलगोटिया यूनिवर्सिटी को समिट से बाहर किए जाने के बाद यह खबरें उड़ने लगीं कि प्रोफेसर नेहा सिंह को निलंबित कर दिया गया है। आज 20 फरवरी 2026 को यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार नितिन कुमार गौड़ ने आधिकारिक तौर पर इन अफवाहों पर विराम लगाते हुए स्थिति स्पष्ट की है।

नौकरी से नहीं निकाला गया, लेकिन जांच जारी: क्या कहती है गलगोटिया यूनिवर्सिटी की आधिकारिक सफाई?

सोशल मीडिया पर किए जा रहे उन दावों के विपरीत, जिनमें कहा जा रहा था कि प्रोफेसर नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी से निकाली जा चुकी हैं, रजिस्ट्रार ने पुष्टि की है कि वे अभी भी संस्थान का हिस्सा हैं।

रजिस्ट्रार नितिन कुमार गौड़ के अनुसार, नेहा सिंह को निलंबित (Suspend) नहीं किया गया है, बल्कि उन्हें जांच पूरी होने तक पद पर बने रहने और सहयोग करने के लिए कहा गया है। यूनिवर्सिटी ने माना है कि एआई समिट के दौरान “शब्दों का गलत चयन” हुआ था, जिसके कारण यह भ्रम फैला कि रोबोट पूरी तरह से इन-हाउस आविष्कार है।

प्रशासन का कहना है कि वे इस बात की गहराई से जांच कर रहे हैं कि आखिर एक नॉन-टेक्निकल फैकल्टी (नेहा सिंह कम्युनिकेशंस की हेड हैं) ने तकनीकी विवरणों पर गलत जानकारी क्यों दी।

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लिंक्डइन पर ‘ओपन टू वर्क’ स्टेटस ने लगाई आग: क्या प्रोफेसर ने खुद दिया इस्तीफा?

विवाद तब और गहरा गया जब प्रोफेसर नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी की इस हेड ऑफ डिपार्टमेंट का लिंक्डइन प्रोफाइल ‘ओपन टू वर्क’ (Open to Work) मोड पर दिखाई दिया। नेटिजन्स ने इसे इस बात का सबूत मान लिया कि उन्हें या तो निकाल दिया गया है या उन्होंने भारी दबाव में इस्तीफा दे दिया है।

हालांकि, यूनिवर्सिटी ने स्पष्ट किया है कि यह उनका निजी निर्णय हो सकता है या पुराना स्टेटस हो सकता है, लेकिन आधिकारिक तौर पर उनका करियर अभी गलगोटिया में खत्म नहीं हुआ है।

रजिस्ट्रार ने जोर देकर कहा कि किसी एक व्यक्ति की गलती के लिए पूरी यूनिवर्सिटी की प्रतिष्ठा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता, लेकिन अनुशासन की प्रक्रिया कानून के दायरे में ही पूरी की जाएगी।

‘आपका 6 मेरा 9 हो सकता है’: नेहा सिंह का वो बयान जो मीम बन गया

अपनी सफाई में प्रोफेसर नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी की तरफ से जो तर्क दिए गए, उसने विवाद को और हवा दे दी। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि यह सब ‘नजरिए’ (Perspective) की बात है, “आपका छह मेरा नौ हो सकता है।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि जब उन्होंने ‘डेवलप’ (Develop) शब्द का इस्तेमाल किया, तो उनका मतलब था कि छात्र इस पर आगे रिसर्च कर रहे हैं, न कि यह कि इसे स्क्रैप से बनाया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि कैमरे के सामने उत्साह और शोर-शराबे की वजह से वे अपनी बात स्पष्ट रूप से नहीं रख पाईं।

हालांकि, इस ‘छह और नौ’ वाले तर्क को सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल किया गया, और इसे जिम्मेदारी से बचने का एक तरीका बताया गया।

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चाइनीज रोबोट और कोरियाई ड्रोन: गलगोटिया यूनिवर्सिटी की डबल फजीहत?

यह मामला केवल एक रोबोडॉग तक सीमित नहीं रहा। प्रोफेसर नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी के जिस पवेलियन को लीड कर रही थीं, वहां एक ‘सॉकर ड्रोन’ को लेकर भी सवाल उठे।

दावा किया गया कि इसे यूनिवर्सिटी ने खुद बनाया है, लेकिन बाद में इसे दक्षिण कोरियाई कंपनी ‘हेलसेल’ का ‘स्ट्राइकर वी3’ मॉडल बताया गया। समिट के आयोजकों और भारत सरकार के आईटी मंत्रालय ने इस ‘गलत बयानी’ (Misrepresentation) को गंभीरता से लिया और गलगोटिया के स्टॉल की बिजली काट दी गई और उन्हें परिसर खाली करने का आदेश दिया गया।

यह भारत की AI महत्वाकांक्षाओं को वैश्विक मंच पर दिखाने के प्रयास में एक बड़ा धक्का साबित हुआ, जिससे सरकार बेहद नाराज दिखी।

खाकी और खादी के बीच फंसी यूनिवर्सिटी: विपक्षी दलों ने बनाया चुनावी मुद्दा

प्रोफेसर नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी विवाद अब केवल शिक्षा जगत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीति के अखाड़े में भी पहुँच गया है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर चीनी उत्पादों को अपना बताना देश के साथ धोखा है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए यूनिवर्सिटी पर तंज कसा कि उन्होंने अपनी गलती मानने के बजाय अपने कर्मचारी (नेहा सिंह) को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की है।

इन राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने यूनिवर्सिटी प्रशासन पर दबाव बढ़ा दिया है, जिसके कारण वे अब बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं ताकि संस्थान की छवि और अधिक खराब न हो।

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जेन-जी और टेक कम्युनिटी का गुस्सा: ‘कॉपी-पेस्ट’ इनोवेशन पर उठे गंभीर सवाल

आज के दौर की प्रोफेसर नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी जैसी घटनाएं तकनीकी रूप से जागरूक युवाओं और टेक कम्युनिटी को बहुत अखरती हैं।

रेडिट और ट्विटर पर यूजर्स ने उन सभी पुराने वीडियो को खोद निकाला जहाँ यूनिवर्सिटी ने ‘थर्मोकोल’ के विमानों को एआई टेक्नोलॉजी बताकर प्रचारित किया था। युवाओं का तर्क है कि सीखने के लिए विदेशी टेक्नोलॉजी खरीदना गलत नहीं है, लेकिन उसे ‘स्वदेशी आविष्कार’ बताकर क्रेडिट लेना अकादमिक बेईमानी (Academic Dishonesty) है।

इस विवाद ने भारत के निजी विश्वविद्यालयों में ‘इनोवेशन’ और ‘मार्केटिंग’ के बीच की धुंधली रेखा को उजागर कर दिया है, जहाँ अक्सर असली रिसर्च से ज्यादा चमक-धमक वाले विज्ञापनों पर ध्यान दिया जाता है।

क्या प्रोफेसर नेहा सिंह की वापसी संभव है या यह करियर का ‘डेड एंड’ है?

अंततः, प्रोफेसर नेहा सिंह गलगोटिया यूनिवर्सिटी का यह पूरा मामला किसी भी पेशेवर के लिए एक बड़ी सीख है। एक ‘गलत बयान’ कैसे पूरी संस्था को दुनिया भर में उपहास का पात्र बना सकता है, यह इसका जीवंत उदाहरण है।

फिलहाल नेहा सिंह निलंबित नहीं हैं, लेकिन ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show-cause Notice) और आंतरिक जांच की तलवार उन पर लटकी हुई है। यदि जांच में यह साबित होता है कि उन्होंने जानबूझकर गुमराह करने की कोशिश की, तो उनकी नौकरी पर खतरा बरकरार है।

वहीं दूसरी ओर, यूनिवर्सिटी को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी कि वे अपने प्रतिनिधियों को सही तकनीकी जानकारी के साथ ही मीडिया के सामने भेजें। यह विवाद आने वाले समय में भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए ‘प्रजेंटेशन बनाम रियलिटी’ का एक बड़ा केस स्टडी बनेगा।

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