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मोदी की इजरायल यात्रा: भारत-इजरायल के बीच ऐतिहासिक डिफेंस डील

मोदी की इजरायल यात्रा

मोदी की इजरायल यात्रा आज पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर यरूशलेम की धरती पर कदम रखने जा रहे हैं। सोमवार, 23 फरवरी 2026 को मिली जानकारी के अनुसार, इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत और इजरायल के बीच रक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाना है।

प्रधानमंत्री मोदी ने खुद कहा है कि भारत, इजरायल के साथ अपनी स्थायी और गहरी दोस्ती को बहुत महत्व देता है। यह यात्रा केवल औपचारिक मुलाकात नहीं है, बल्कि यह मिडिल ईस्ट में भारत की बदलती प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब है।

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पीएम मोदी को अपना ‘व्यक्तिगत मित्र’ बताते हुए इस दौरे का गर्मजोशी से स्वागत करने की तैयारी की है। यह दौरा तब हो रहा है जब दुनिया के कई देश युद्ध और तनाव से जूझ रहे हैं, ऐसे में भारत की यह सक्रिय कूटनीति बेहद अहम मानी जा रही है।

लेजर डिफेंस और एडवांस ड्रोन: भारत की सुरक्षा के लिए ‘ब्रह्मास्त्र’ की तैयारी

इस मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा ध्यान रक्षा क्षेत्र में होने वाले ऐतिहासिक समझौतों पर है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, भारत इजरायल से उन्नत ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइलें और विशेष रूप से इजरायल का विश्व प्रसिद्ध ‘लेजर डिफेंस सिस्टम’ खरीदने की योजना बना रहा है।

यह तकनीक भारत की सीमाओं को अभेद्य बनाने में मदद करेगी, खासकर उन इलाकों में जहाँ पारंपरिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के साथ-साथ ड्रोन खतरों से निपटना एक चुनौती है।

यात्रा के दौरान रक्षा सहयोग पर एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होने की संभावना है, जो ‘मेक इन इंडिया’ के तहत तकनीकों के हस्तांतरण को भी बढ़ावा देगा। भारत अब केवल खरीदार नहीं, बल्कि इजरायल के साथ मिलकर हथियारों का उत्पादन करने की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा है।

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फिलिस्तीन बनाम इजरायल: कैसे मोदी ने तोड़ी कूटनीति की पुरानी दीवारें?

अल जजीरा के एक विश्लेषण के अनुसार, मोदी की इजरायल यात्रा इस बात का प्रमाण है कि भारत ने फिलिस्तीन और इजरायल के बीच अपनी पुरानी ‘बैलेंसिंग एक्ट’ की कूटनीति को बदल दिया है। पहले भारत इजरायल के साथ अपने रिश्तों को फिलिस्तीन के नजरिए से देखता था और यात्राओं को गुप्त या सीमित रखता था।

लेकिन पीएम मोदी ने इस दीवार को गिरा दिया है और इजरायल के साथ एक स्वतंत्र रणनीतिक साझेदारी विकसित की है। भारत अब अपनी जरूरतों के हिसाब से इजरायल के करीब जा रहा है, बिना फिलिस्तीन के प्रति अपनी सहानुभूति को पूरी तरह छोड़े। कूटनीति के इस नए मॉडल को वैश्विक स्तर पर ‘डी-हाइफनेशन‘ कहा जा रहा है, जहाँ भारत हर देश के साथ अलग और मजबूत रिश्ते बनाने की काबिलियत दिखा रहा है।

इजरायली संसद में संबोधन और द्विपक्षीय समझौते: क्या है पीएम मोदी का एजेंडा?

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी की इजरायल यात्रा का एजेंडा काफी विस्तृत है। पीएम मोदी इजरायली संसद ‘नेसेट’ (Knesset) को संबोधित कर सकते हैं, जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के लिए एक दुर्लभ सम्मान है। उनके एजेंडे में न केवल रक्षा, बल्कि कृषि, जल प्रबंधन और साइबर सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र भी शामिल हैं।

दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौतों पर हस्ताक्षर होंगे जो स्टार्टअप इकोसिस्टम को बढ़ावा देंगे। इजरायल अपनी बूंद-बूंद सिंचाई तकनीक (Drip Irrigation) के लिए जाना जाता है, और भारत इस तकनीक को अपने कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर लागू करना चाहता है। मोदी और नेतन्याहू के बीच होने वाली व्यक्तिगत मुलाकात इन रिश्तों को एक नई भावनात्मक और रणनीतिक गहराई प्रदान करेगी।

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इजरायल की घरेलू राजनीति में उलझता दौरा: क्या नेतन्याहू को मिलेगा मोदी का सहारा?

द हिंदू की एक रिपोर्ट में इस यात्रा के एक अलग पहलू पर भी रोशनी डाली गई है। पीएम मोदी की इजरायल यात्रा इजरायल की अस्थिर घरेलू राजनीति के बीच हो रही है। बेंजामिन नेतन्याहू को अपने देश में आंतरिक विरोध और गठबंधन की राजनीति का सामना करना पड़ रहा है।

ऐसे समय में दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी का उनके साथ खड़ा होना उनकी राजनीतिक साख को मजबूत कर सकता है। विपक्षी दलों का आरोप है कि नेतन्याहू इस दौरे का इस्तेमाल अपनी छवि सुधारने के लिए कर रहे हैं।

हालांकि, भारत के लिए यह दौरा किसी एक नेता से अधिक एक देश के साथ दीर्घकालिक साझेदारी का हिस्सा है। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि इजरायल में सत्ता चाहे जिसकी भी हो, भारत के सामरिक हित सुरक्षित रहें।

मिडल ईस्ट में शक्ति संतुलन: अरब देशों की प्रतिक्रिया और भारत का प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की इजरायल के साथ बढ़ती नजदीकी का असर उसके अरब देशों के साथ रिश्तों पर भी पड़ रहा है। हालांकि, भारत ने अपनी कूटनीति को इतने सधे हुए अंदाज में पेश किया है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब जैसे देश भी अब इजरायल के साथ अपने रिश्तों को सुधार रहे हैं।

अब्राहम एकॉर्ड के बाद बने नए माहौल ने भारत के लिए इजरायल के साथ खुलकर दोस्ती करना आसान बना दिया है। भारत अब मिडिल ईस्ट में एक ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ और एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में उभर रहा है।

यह यात्रा भारत को उन वैश्विक ताकतों की कतार में खड़ा करती है जो न केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता में भी योगदान देती हैं।

जेन-जी और मिलेनियल्स के बीच ‘मोसाड’ और इजरायली टेक का क्रेज: डिजिटल युग की दोस्ती

आज के युवाओं के लिए इजरायल केवल एक देश नहीं, बल्कि ‘इनोवेशन हब’ और ‘मोसाड’ की जासूसी कहानियों का केंद्र है। भारतीय युवाओं में इजरायली डिफेंस टेक्नोलॉजी और उनके स्टार्टअप कल्चर को लेकर एक अलग तरह का आकर्षण है। सोशल मीडिया पर #IndiaIsraelFriendship जैसे हैशटैग्स के साथ युवा इस यात्रा का स्वागत कर रहे हैं।

वे देख रहे हैं कि कैसे भारत एक आत्मनिर्भर देश बनने के लिए दुनिया की सबसे उन्नत तकनीकें हासिल कर रहा है। मिलेनियल्स को इस बात में दिलचस्पी है कि कैसे जल संरक्षण और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में इजरायल का अनुभव भारत के भविष्य को बदल सकता है। यह डिजिटल पीढ़ी कूटनीति को ‘इमोजी’ और ‘सेल्फी’ के माध्यम से देख रही है, जो मोदी और नेतन्याहू की तस्वीरों में साफ झलकता है।

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भारत और इजरायल के बीच एक अटूट साझेदारी का भविष्य

अंततः, प्रधानमंत्री की यह यात्रा एक सुरक्षित और समृद्ध भारत की नींव रखने का प्रयास है। रक्षा सौदे हमें ताकतवर बनाएंगे, जबकि तकनीक हमें आत्मनिर्भर। एक सीनियर एडिटर के रूप में मेरा मानना है कि भारत ने अपनी विदेश नीति में जो साहस दिखाया है, उसका फल आने वाले दशकों तक देश को मिलेगा।

इजरायल एक ऐसा दोस्त है जिसने हर मुश्किल समय में भारत का साथ दिया है, और अब यह दोस्ती एक औपचारिक समझौते से ऊपर उठकर एक साझा भविष्य की ओर बढ़ रही है। मोदी और नेतन्याहू की यह मुलाकात दुनिया को बता देगी कि नया भारत अपनी सुरक्षा और अपने हितों के लिए किसी भी मंच पर, किसी भी देश के साथ बराबरी की मेज पर बैठने को तैयार है।

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