सुप्रीम कोर्ट ओडिशा फटकार ओडिशा: दलितों से थाना साफ कराने पर भड़का
सुप्रीम कोर्ट ओडिशा फटकार भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को ओडिशा की न्यायपालिका के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए जमानत की उन शर्तों को “शर्मनाक और घिनौना” करार दिया, जिनमें दलित और आदिवासी समुदाय के आरोपियों को पुलिस स्टेशन साफ करने का आदेश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इन आदेशों को न केवल असंवैधानिक बताया, बल्कि इन्हें तत्काल प्रभाव से “अमान्य और शून्य” घोषित कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि न्यायपालिका से 2026 में ऐसी पिछड़ी और औपनिवेशिक सोच की उम्मीद नहीं की जा सकती।
मामले की पृष्ठभूमि: वेदांता खनन विरोध और विवादित आदेश
यह पूरा विवाद ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी जिलों में वेदांता समूह के बॉक्साइट खनन प्रोजेक्ट के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों से उपजा है। आरोप है कि इन प्रदर्शनों के हिंसक होने के बाद लगभग 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच, ओडिशा उच्च न्यायालय और निचली अदालतों ने इनमें से कई आरोपियों को जमानत तो दी, लेकिन एक ‘क्रूर’ शर्त के साथ— उन्हें दो महीने तक प्रतिदिन पुलिस स्टेशन की सफाई करनी होगी।
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“विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के लिए अलग कानून?”: सुप्रीम कोर्ट का सवाल
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर गहरी निराशा जताई कि ये अपमानजनक शर्तें केवल समाज के हाशिए पर पड़े समुदायों (दलित और आदिवासी) पर ही थोपी गईं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी खबरें सच प्रतीत होती हैं कि “विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों” के आरोपियों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता।
पीठ ने कहा, “ऐसी शर्तें न्याय देने के बजाय आरोपी की गरिमा पर प्रहार करती हैं और इस गलत धारणा पर आधारित हैं कि आरोपी पहले से ही दोषी है।”
संवैधानिक मर्यादाओं की याद: अनुच्छेद 14, 15 और 17 का हवाला
अदालतों को उनके संवैधानिक कर्तव्य की याद दिलाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) का प्रमुखता से जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका का काम कमजोर तबकों की रक्षा करना है, न कि उन्हें जाति-आधारित भेदभाव का शिकार बनाना।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आजादी के 75 वर्षों के बाद भी अगर न्यायपालिका इस तरह की ‘जाति-रंजित’ मानसिकता से ग्रस्त है, तो यह पूरी संस्था की साख पर एक बड़ा लांछन है।
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देशभर के उच्च न्यायालयों को चेतावनी और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति देश के सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए।
यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि भविष्य में कोई भी जिला न्यायाधीश या उच्च न्यायालय ऐसी अपमानजनक शर्तें न लगाए। ओडिशा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को चार सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) पेश करने का आदेश दिया गया है।
मानवाधिकारों का हनन और न्यायिक मर्यादा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी को पुलिस स्टेशन परिसर साफ करने का निर्देश देना कानून के लिए अजनबी है। कोर्ट ने ओडिशा के महाधिवक्ता पीतांबर आचार्य को संबोधित करते हुए कहा कि ऐसी शर्तें न्यायपालिका को बदनाम करती हैं।
यह मामला तब प्रकाश में आया जब ‘आर्टिकल 14’ की एक रिपोर्ट में इन आदेशों का खुलासा किया गया, जिसमें बताया गया कि प्रभावित होने वाले 8 आरोपियों में से 6 दलित और 2 आदिवासी समुदाय से थे।
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गरिमा के साथ न्याय का संकल्प
सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि भारत में न्याय का आधार ‘समानता’ है, न कि किसी व्यक्ति की सामाजिक या जातीय स्थिति।
कोर्ट ने साफ किया कि उसे आपराधिक आरोपों की सच्चाई से फिलहाल कोई सरोकार नहीं है, लेकिन जमानत की शर्तों के स्वरूप में मानवीय गरिमा का उल्लंघन किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा। यह फैसला भविष्य के लिए एक मिसाल बनेगा कि अदालती आदेशों में किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह की कोई जगह नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट की ओडिशा को फटकार, सुप्रीम कोर्ट सख्त यह फैसला भविष्य के लिए एक मिसाल बनेगा



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