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न्यायपालिका की नैतिक जवाबदेही पर सवाल?सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

न्यायपालिका की नैतिक जवाबदेही

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 21 मई को न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले में FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की नैतिक जवाबदेही से जुड़े इस मामले में पहले से ही इन-हाउस जांच हो चुकी है और रिपोर्ट राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को सौंपी जा चुकी है। यह फैसला न केवल न्यायपालिका की नैतिक जवाबदेही के सिद्धांतों पर नई बहस छेड़ता है, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता और कार्यपालिका के बीच संतुलन के जटिल सवालों को भी उठाता है।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से संपर्क करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां शामिल थे, ने याचिकाकर्ता मैथ्यूज नेदुम्परा से कहा कि वे पहले राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से संपर्क करें।

कोर्ट के प्रमुख बयान:

21 मई 2024 को जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने इस मामले में अपना महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया :

 राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से संपर्क करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां शामिल थे, ने याचिकाकर्ता मैथ्यूज नेदुम्परा से कहा कि वे पहले राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से संपर्क करें।

📜 कोर्ट के प्रमुख बयान:

  • “यदि आप परमादेश रिट चाहते हैं, तो पहले संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करें।”
  • “जब तक कार्यपालिका (राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री) से संपर्क नहीं किया जाता, याचिका विचारणीय नहीं है।”
  • “यदि कार्यपालिका कोई कार्रवाई नहीं करती, तो फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।”

इस तरह, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की नैतिक जवाबदेही से जुड़े इस मामले में कार्यपालिका को पहला अवसर देने का निर्णय लिया।

मामले के मुख्य बिंदु

✅ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की – कहा कि पहले राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से संपर्क करें।
✅ वीरस्वामी केस पर पुनर्विचार की मांग नामंजूर – कोर्ट ने कहा कि अभी इसकी आवश्यकता नहीं।
✅ जांच समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं – लेकिन इसे राष्ट्रपति और पीएम को भेजा गया है।
✅ जस्टिस वर्मा का स्थानांतरण – उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा गया।
✅ न्यायपालिका की निष्पक्षता पर चर्चा – आरोपों के बावजूद आपराधिक कार्रवाई न होने से सवाल उठे।

जांच समिति की पृष्ठभूमि

22 मार्च को तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की एक इन-हाउस समिति बनाई गई थी:

  • पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू,
  • हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया,
  • कर्नाटक हाईकोर्ट की जज अनु शिवरामन।

इन न्यायाधीशों ने दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वर्मा के घर हुई नकदी बरामदगी की जांच की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में आरोपों को गंभीर और विश्वसनीय माना।

मामले की विस्तृत पृष्ठभूमि

1. घटनाक्रम: क्या हुआ था?

  • मार्च 2024 में दिल्ली स्थित न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम में आग लगने की घटना हुई।
  • आग बुझाने के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी (कथित तौर पर करोड़ों रुपये) बरामद हुई।
  • इस घटना ने तत्काल मीडिया और सार्वजनिक हलकों में तूफान ला दिया।

2. जांच प्रक्रिया का आरंभ

  • 22 मार्च 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की एक उच्च-स्तरीय समिति गठित की:
    • पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू (अध्यक्ष)
    • हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया
    • कर्नाटक हाईकोर्ट की न्यायाधीश अनु शिवरामन
  • समिति ने 6 सप्ताह तक गहन जांच की और 8 मई को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

3. समिति की रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • आरोपों को “गंभीर और विश्वसनीय” पाया गया।
  • रिपोर्ट को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा गया।
  • न्यायमूर्ति वर्मा को दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया।

वीरस्वामी केस पर पुनर्विचार की मांग खारिज

याचिकाकर्ताओं ने 1991 के वीरस्वामी बनाम भारत संघ मामले को चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि किसी भी मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले मुख्य न्यायाधीश की अनुमति लेना अनिवार्य है।

याचिकाकर्ताओं के तर्क:

  • यह फैसला अब पुराना हो चुका है और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
  • न्यायाधीशों के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए नए मानदंड बनाए जाने चाहिए।
  • महाभियोग प्रक्रिया के अलावा, आपराधिक जांच भी होनी चाहिए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि फिलहाल इस मुद्दे पर पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है।

वीरस्वामी केस : एक ऐतिहासिक संदर्भ

1991 का वीरस्वामी बनाम भारत संघ मामला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक मील का पत्थर है। इस फैसले के प्रमुख निष्कर्ष थे:

  1. संरक्षण उपाय: किसी भी मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने से पहले मुख्य न्यायाधीश की अनुमति अनिवार्य।
  2. तर्क: यह प्रावधान न्यायाधीशों को “अनावश्यक उत्पीड़न” से बचाने और न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाया गया।
  3. वर्तमान विवाद: याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह प्रावधान अब न्यायपालिका की नैतिक जवाबदेही के सिद्धांतों के विरुद्ध है और इसे संशोधित किया जाना चाहिए।

न्यायपालिका की निष्पक्षता पर बहस

इस मामले ने एक बार फिर न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि:

  • अगर एक न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, तो उसकी सिर्फ स्थानांतरण या महाभियोग से ही जांच नहीं होनी चाहिए।
  • यह पता लगाया जाना चाहिए कि किन मामलों में न्यायिक निर्णय प्रभावित हुए।
  • जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायपालिका की नैतिक जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए।

न्यायपालिका की निष्पक्षता सवालों में है, जब जांच में विश्वसनीयता सामने आने के बावजूद आपराधिक कार्रवाई में देरी हो रही है। इससे न्याय प्रणाली की पारदर्शिता पर भी जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है।

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