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चंद्रमा लैंडिंग में फिर विफलता- निजी चंद्र अभियान विफल

निजी चंद्र अभियान विफल

निजी चंद्र अभियान विफल होने की श्रेणी में जापान का हकुतो-आर मिशन फिर से शामिल हो गया है। 2023 में पहली बार असफल लैंडिंग के बाद, इस बार भी मिशन चंद्र सतह से कुछ ही दूरी पर संपर्क टूटने के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

  • जापानी कंपनी ispace का यह मिशन था
  • रेज़िलिएंस लैंडर और माइक्रो रोवर शामिल थे
  • लैंडिंग से ठीक पहले टेलीमेट्री गायब
  • लेज़र रेंजफाइंडर ने डेटा देने में देरी की
  • लैंडर की रफ्तार समय पर धीमी नहीं हो सकी

अंतिम चरण में टूटा सपना

मिशन कंट्रोल के अनुसार, लैंडर ने ऊँचाई घटाकर इंजन तो चालू किया, लेकिन चंद्रमा की सतह मापने वाला सिस्टम देरी से सक्रिय हुआ। इस कारण, यान समय पर धीमा नहीं हो पाया और अनुमानतः कठिन लैंडिंग करते हुए क्रैश हो गया।

“हमारा उद्देश्य जारी रहेगा, लेकिन हर असफलता निजी खिलाड़ियों के लिए एक सीख है।” — ispace CEO

निजी मिशनों की चुनौतियाँ बढ़ीं

पिछले दो वर्षों में कई निजी कंपनियों ने चंद्र लैंडिंग का प्रयास किया, लेकिन सफलता की दर बेहद कम रही है।

कंपनीमिशनपरिणाम
ispaceहकुतो-आरदोनों बार विफल
फायरफ्लाईब्लू घोस्टआंशिक सफलता
इंट्यूटिव मशीननोवा-सीअधूरी लैंडिंग
एस्ट्रोबोटिकपेरेग्रीनटेकऑफ़ में असफल
स्पेसआईएलबेरेशीट (इजराइल)2019 में क्रैश

रूस और भारत के भी प्रयास

भारत का चंद्रयान-2 2019 में अंतिम चरण में विफल हुआ था, जबकि चंद्रयान-3 ने 2023 में सफलतापूर्वक लैंडिंग की। वहीं रूस का लूना-25 मिशन भी लैंडिंग चरण में क्रैश हो गया था।

वैज्ञानिक लक्ष्यों की कीमत पर प्रयोग

हर असफलता से वैज्ञानिक डेटा जरूर मिलता है, लेकिन इससे महंगे संसाधनों का नुकसान भी होता है। निजी कंपनियों की मुख्य चुनौतियाँ:

  • विश्वसनीय सेंसर और लेज़र माप प्रणाली का अभाव
  • ईंधन प्रणाली या थ्रस्टर में असमय विफलता
  • अंतिम क्षणों में गाइडेंस लूप का टूटना
  • पेलोड के सुरक्षित अवतरण की कठिनाई

नासा का CLPS और भविष्य की दिशा

कमर्शियल लूनर पेलोड सर्विस (CLPS) के तहत नासा ने कई निजी कंपनियों को चंद्रमा मिशन के अनुबंध दिए हैं। इनका उद्देश्य है:

  • चंद्रमा पर सस्ते और नियमित अभियान
  • पेलोड डिलीवरी की दक्षता
  • भविष्य के मानव मिशनों के लिए बेस बनाना

इस प्रोग्राम में Firefly, Intuitive Machines और Astrobotic जैसी कंपनियाँ शामिल हैं।

निजी स्पेसरेस में सीख और संघर्ष

निजी चंद्र अभियान विफल होना एक तकनीकी हार से ज़्यादा है – यह एक बड़ी आर्थिक और वैचारिक चुनौती भी है। लेकिन इसी असफलता के ज़रिए निजी कंपनियाँ सीख रही हैं और भविष्य के लिए अधिक परिपक्व हो रही हैं।

“चंद्रमा तक पहुँचना सिर्फ विज्ञान नहीं, धैर्य और पुनः प्रयास की परीक्षा भी है।”

एस्ट्रोबोटिक का पेरेग्रीन मिशन: उड़ान में ही विफलता

अमेरिका की निजी कंपनी Astrobotic Technologies का Peregrine Mission One चंद्रमा पर उतरने वाला था, लेकिन इसे प्रक्षेपण के तुरंत बाद गंभीर तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

  • मिशन 8 जनवरी 2024 को लॉन्च किया गया था
  • लॉन्च के कुछ घंटे बाद ही प्रणोदन प्रणाली में रिसाव हुआ
  • इससे यान का ईंधन खत्म होने लगा, जिससे यह चंद्रमा तक नहीं पहुँच सका
  • अंततः यान को पृथ्वी के वातावरण में लौटाकर नष्ट किया गया

यह मिशन NASA के CLPS कार्यक्रम का हिस्सा था और इससे यह उम्मीद की जा रही थी कि निजी कंपनियाँ भविष्य में चंद्र मिशनों को नियमित रूप से अंजाम देंगी। लेकिन इस पहली उड़ान की असफलता ने तकनीकी परिपक्वता पर सवाल उठाए।

इज़राइल का बेरेशीट मिशन: आखिरी क्षणों में क्रैश

इज़राइली संगठन SpaceIL द्वारा विकसित Beresheet मिशन 2019 में चंद्रमा पर उतरने वाला पहला निजी प्रयास था, लेकिन यह भी आखिरी चरण में क्रैश हो गया।

  • यह मिशन फरवरी 2019 में लॉन्च किया गया
  • 11 अप्रैल 2019 को लैंडिंग के प्रयास के दौरान मुख्य इंजन फेल हो गया
  • इंजन फिर से चालू करने की कोशिश की गई, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी
  • यान तेज़ रफ्तार से चंद्रमा की सतह से टकरा गया

इस क्रैश के बावजूद, इस मिशन ने यह साबित किया कि एक छोटा देश और निजी संगठन भी चंद्रमा तक यान भेज सकता है। यह घटना बाद में कई नई निजी स्पेस एजेंसियों को प्रेरणा का स्रोत बनी।

भारतीय चंद्र मिशन: पिछली असफल कोशिश

भारत का चंद्रयान-2 मिशन, जिसे 2019 में लॉन्च किया गया था, विज्ञान और तकनीक की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि था। लेकिन इसकी लैंडिंग प्रणाली अंतिम क्षणों में विफल हो गई।

  • विक्रम लैंडर चंद्र सतह से लगभग 2.1 किमी पहले संपर्क से बाहर हो गया
  • लैंडर तेज गति से गिरा और दुर्घटनाग्रस्त हो गया
  • इस मिशन का ऑर्बिटर आज भी चंद्रमा की कक्षा में सक्रिय है और डेटा भेज रहा है
  • ISRO ने दुर्घटना के बाद तकनीकी सुधारों के साथ चंद्रयान-3 के लिए तैयारी की

सबक और सुधार

इस असफलता ने ISRO को महत्वपूर्ण सबक सिखाया – जैसे सेंसर की विश्वसनीयता, सटीक गाइडेंस और ऑटोमैटिक लैंडिंग सिस्टम की जरूरत। इन्हीं सुधारों के साथ चंद्रयान-3 को 2023 में भेजा गया और उसने सफलतापूर्वक दक्षिणी ध्रुव पर लैंडिंग की।

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