किसान आत्महत्या: अब तो खून के आँसू रोते हैं महाराष्ट्र के खेत!
हर तीन घंटे। जी हां यह वह भयावह समय अंतराल है। इसी समय अंतराल के दौरान महाराष्ट्र का एक किसान अपनी जान लेता है। सिर्फ जनवरी से मार्च 2025 के 90 दिनों में। इस अवधि में 767 किसान आत्महत्या दर्ज हुईं। यानी औसतन हर रोज आठ किसानों ने खुदकुशी की। यह कोई नई बात नहीं है।
पिछले साढ़े चार साल से यह दर लगभग स्थिर बनी हुई है। यह दर्शाता है। विदर्भ और मराठवाड़ा के किसानों पर दशकों से मंडरा रहा संकट और गहराया है। 2014 के बड़े वादों के बावजूद यह सिलसिला थम नहीं रहा। आर्थिक संकट, पर्यावरणीय चुनौतियाँ और नीतिगत विफलताएँ इसकी मुख्य वजह हैं।
किसान आत्महत्या का भयावह पैमाना
संकट की भयावहता समझने के लिए आँकड़े देखें। पिछले 24 वर्षों में सिर्फ विदर्भ के अमरावती मंडल में। यहाँ 21,219 से अधिक किसान आत्महत्या हुईं। यवतमाल जिला सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहाँ 6,211 मौतें दर्ज हुईं। अकेले जनवरी 2025 में इन जिलों में 80 खेतीहरों ने जान दी। मराठवाड़ा का हिंगोली जिला भी पीछे नहीं। वहाँ उसी तिमाही में 24 आत्महत्याएँ हुईं।
विदर्भ जिलेवार आत्महत्या आँकड़े (24 वर्ष):
जिला किसान आत्महत्याएँ
यवतमाल 6,211
अमरावती 5,395
बुलढाणा 4,442
अकोला 3,123
वाशिम 2,048
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े चौंकाने वाले हैं। 2015 से 2024 के बीच महाराष्ट्र में 37,142 किसानों ने आत्महत्या की। 2022 में देश की कुल कृषि क्षेत्रकर्मी आत्महत्याओं का आधा से अधिक। यह महाराष्ट्र से था। इस वर्ष यहाँ 2,708 किसानों ने जान गँवाई। पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों में शून्य आत्महत्या दर्ज। यह अंतर चिंताजनक है।
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किसान आत्महत्या के मुख्य कारण
यह त्रासदी कई जटिल कारणों से उपजी है। आर्थिक दबाव सबसे बड़ी वजह है। बढ़ती लागत और गिरती आमदनी किसानों को कर्ज़ के जाल में धकेलती है।
कर्ज़ का बोझ: बीज, खाद, डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलता। 2024 में कपास का बाज़ार भाव MSP ₹7,550 के मुकाबले ₹5,000-6,000 था। सोयाबीन MSP ₹4,892 की जगह ₹3,800-4,000 पर बिका। इससे सोयाबीन किसानों को ₹8,500 करोड़ का घाटा हुआ।
जलवायु संकट: विदर्भ-मराठवाड़ा में सिंचाई सुविधा मात्र 10-12% है। पश्चिम महाराष्ट्र के गन्ना क्षेत्रों में यह 60% है। किसान अनियमित बारिश पर निर्भर हैं। सूखा और असमय वर्षा फसलें बर्बाद करती है। भूजल स्तर खतरनाक गिरावट पर है। कुँए 1000 फीट तक सूख रहे हैं। बोरवेल ड्रिल करने की लागत अत्यधिक है।
नीतिगत विफलताएँ: किसान नेता विजय जवांधिया बताते हैं। एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू नहीं हुईं। कृषि को समवर्ती सूची में नहीं डाला गया। किसानों को महँगाई भत्ता नहीं मिलता। आदानों पर 18% जीएसटी लगती है। किसान सालाना PM किसान सम्मान निधि से ₹12,000 पाते हैं। पर जीएसटी के रूप में सरकार उनसे ज्यादा वसूल लेती है।
सामाजिक-मानसिक दबाव: शिक्षा, स्वास्थ्य और दैनिक खर्चे बढ़ रहे हैं। आय स्थिर है। मानसिक स्वास्थ्य सहायता की गंभीर कमी है। अवसाद के शिकार किसानों को परामर्श नहीं मिलता। अप्रैल 2025 में परभणी के सचिन-ज्योति जाधव दंपत्ति की आत्महत्या ने दो बेटियों को अनाथ कर दिया। यह मानसिक स्वास्थ्य संकट की गंभीरता दिखाता है।
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सरकारी प्रयास: कागजी खानापूर्ति?
केंद्र और राज्य सरकारें कई योजनाएँ चलाती हैं। पर उनका ज़मीनी असर नहीं दिखता। सरकारी जवाब अक्सर यही होता है। कृषि राज्य का विषय है। केंद्र नीतिगत समर्थन और फंडिंग देता है। कृषि बजट आवंटन 2013-14 के ₹21,933.5 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹1,22,528.77 करोड़ हुआ। केंद्र 28 योजनाओं के ज़रिए किसानों की आय बढ़ाने का दावा करता है। परन्तु सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है।
मुआवजा व्यवस्था: आत्महत्या पीड़ित परिवार को ₹1 लाख मिलना चाहिए। जनवरी-मार्च 2025 की 767 घटनाओं में सिर्फ 376 मामलों को मंजूरी मिली। 8 जिलों ने ₹2.95 करोड़ की माँग की। सिर्फ ₹18 लाख जारी किए गए।
MSP का खोखलापन: 562 खरीद केंद्रों के बावजूद फसलें MSP से नीचे बिकती हैं। कानूनी गारंटी का अभाव है। किसानों को बाज़ार की दया पर छोड़ दिया जाता है।
गन्ना पक्षपात: राज्य की नीतियाँ गन्ना किसानों के पक्ष में झुकी हैं। उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने गन्ना किसानों के लिए विशेष कानून का प्रस्ताव रखा। विदर्भ के कपास किसान स्वयं को उपेक्षित पाते हैं। जवांधिया कहते हैं, “कपास किसान विदर्भ में ‘अनाथ’ जैसे हैं।”
किसान आत्महत्या रोकने के ज़मीनी उपाय
इस भयावह संकट का समाधान जटिल है। परन्तु कुछ ठोस कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए।
कानूनी MSP गारंटी: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी अधिकार बनाना होगा। ताकि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित मिले। यह कर्ज़ के जाल से बचाने में मदद करेगा।
सिंचाई क्रांति: विदर्भ-मराठवाड़ा में सिंचाई बुनियादी ढाँचे पर तत्काल निवेश जरूरी है। खड़कपूर्णा जैसे लंबित बाँधों को शीघ्र पूरा करना होगा। जल संरक्षण परियोजनाओं को बढ़ावा देना होगा। ताकि किसान सूखे के भय से मुक्त हो सकें।
कर्ज़ माफी एवं पुनर्गठन: छोटे और सीमांत किसानों के लिए व्यापक कर्ज़ माफी की आवश्यकता है। साथ ही भविष्य के लिए कम ब्याज दर पर ऋण की व्यवस्था करनी होगी। कर्ज़ का पारदर्शी पुनर्गठन जीवन रेखा साबित हो सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता: ग्रामीण स्तर पर मनोवैज्ञानिक परामर्श सेवाएँ स्थापित करनी होंगी। किसानों में तनाव प्रबंधन और आत्महत्या रोकथाम के बारे में जागरूकता बढ़ानी होगी। स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना होगा।
फसल विविधीकरण एवं जैविक खेत: किसानों को जलसांद्रता वाली फसलों से हटाकर। उन्हें कम पानी में उगने वाली फसलों की ओर प्रोत्साहित करना होगा। जैविक खेती को बढ़ावा देकर। उनकी लागत कम करनी होगी। बाज़ार की अनिश्चितता से बचाना होगा।
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निष्कर्ष: वादों से परे कार्रवाई की घड़ी
कैलाश नागरे की आत्महत्या एक चेतावनी थी। वह 2020 के यंग फार्मर अवार्ड विजेता थे। उन्होंने सिंचाई की माँग को लेकर सरकारी निष्क्रियता के खिलाफ भूख हड़ताल की। फिर जान दे दी। जाधव दंपत्ति की मौत ने दो नन्हीं जिंदगियों को अनाथ कर दिया। ये घटनाएँ सिस्टम की विफलता की कहानी कहती हैं।
विदर्भ और मराठवाड़ा के प्रतिनिधि बड़े नेता हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी। पर किसानों का दर्द उनकी प्राथमिकता सूची में नीचे है। राजनीतिक दल एक दूसरे पर दोषारोपण में व्यस्त हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा, “सोचिए… सिर्फ 3 महीने में 767 किसानों ने आत्महत्या की। ये सिर्फ आँकड़े नहीं, 767 उजड़े घर हैं।”
भाजपा विपक्षी दलों के पिछले कार्यकाल को कोसती है। जब तक कर्ज़ का बोझ हल्का नहीं होगा। जब तक पानी की कमी दूर नहीं होगी। जब तक बाज़ार में अनिश्चितता खत्म नहीं होगी। तब तक महाराष्ट्र के खेत किसानों के लिए कब्रगाह बने रहेंगे। किसान आत्महत्या का यह सिलसिला थमेगा नहीं।
वक्त आ गया है। वादों से परे ठोस और दृढ़ कार्रवाई की जाए। ताकि महाराष्ट्र के अन्नदाता निराशा के खेतों में फसल न काटें। बल्कि सम्मान और आशा के साथ जी सकें।



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