उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया रिमांड पर नई पाबंदी लगाई
उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक आदेश
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने 5 जुलाई को एक महत्वपूर्ण परिपत्र जारी किया। यह आदेश सभी न्यायिक मजिस्ट्रेटों के लिए बाध्यकारी है। इस न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया मामलों में रिमांड देने से पहले सर्वोच्च न्यायालय के नियमों का पालन अनिवार्य है। मजिस्ट्रेटों को पुलिस की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट की जांच करनी होगी। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी। यह कदम व्यवस्था में व्याप्त खामियों को दूर करेगा।
दोहरी सुरक्षा प्रणाली का शुभारंभ
इस परिपत्र ने दो स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की है। पहला चरण इमरान प्रतापगढ़ी मामले (2025) के दिशानिर्देशों पर आधारित है। इसमें पुलिस को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(3) के तहत प्रारंभिक जांच करनी होगी। दूसरे चरण में मजिस्ट्रेट को अर्नेश कुमार दिशानिर्देश (2014) सुनिश्चित करने होंगे। इनके अंतर्गत गिरफ्तारी के वाजिब कारण जैसे गवाहों को प्रभावित करना या साक्ष्य छेड़छाड़ की आशंका शामिल हैं। यह स्तरित समीक्षा प्रक्रिया मनमानी गिरफ्तारियों पर प्रभावी अंकुश लगाएगी।
पूर्व के न्यायिक निर्देशों की सीमाएँ
अन्य न्यायालयों ने भी पहले ऐसे प्रयास किए थे। वर्ष 2021 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अर्नेश कुमार दिशानिर्देश लागू किए थे। परन्तु वे केवल सुझावात्मक प्रकृति के थे। वर्तमान में आंध्र प्रदेश न्यायालय का परिपत्र पूर्णतः अनिवार्य है। इसके साथ ही अवमानना की कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान है। यह परिवर्तन व्यावहारिक क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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व्यवहार में आने वाली बाधाएँ
कागजी कानून और जमीनी हकीकत का अंतर
उच्च न्यायालय द्वारा रेखांकित नियम पहले से विद्यमान हैं। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता पुलिस को गिरफ्तारी का कारण दर्ज करने को कहती है। नई संहिता प्रारंभिक जांच को अनिवार्य बनाती है। किन्तु व्यवहार में इनकी खुलेआम अवहेलना होती है। पुलिस थानों में नियमों को नजरअंदाज किया जाता है। न्यायालयों द्वारा बार-बार याद दिलाना गंभीर समस्या की ओर इंगित करता है।
संस्थागत विफलता के व्यापक परिणाम
इस अनदेखी का सीधा प्रभाव कानूनी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर पड़ता है। संवैधानिक अधिकार अधिकारियों की मनमानी का शिकार बनते हैं। पुलिस प्रायः न्यायिक निगरानी को दरकिनार कर देती है। अस्पष्ट आधारों पर गिरफ्तारियाँ की जाती हैं। यह तंत्र की गहरी खराबी को दर्शाता है।
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सामाजिक प्रभाव: भय का वातावरण
लोकतांत्रिक मूल्यों पर संकट
सोशल मीडिया पोस्ट्स पर स्वचालित एफआईआर लोकतंत्र के लिए खतरा है। प्रोफेसरों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को प्रायः निशाना बनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 प्रभावहीन हो जाते हैं। केवल एफआईआर दर्ज होने मात्र से व्यक्ति की प्रतिष्ठा धूमिल होती है। रोजगार के अवसर नष्ट हो जाते हैं।
स्वत: सेंसरशिप में वृद्धि
आम जनता में भय का वातावरण बनता है। लोग सत्ता की आलोचना करने से कतराने लगते हैं। रचनात्मक अभिव्यक्ति का स्थान आपराधिक संदेह ले लेता है। वर्ष 2023 में 128 पत्रकारों के विरुद्ध राजद्रोह के मामले दर्ज हुए। मुफ्त अभिव्यक्ति संगठन के आँकड़े यही दर्शाते हैं। अधिकांश मामलों में अदालतों ने बाद में राहत दी।
न्याय प्राप्ति में कठिनाइयाँ
आम नागरिकों के समक्ष चुनौतियाँ
उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना बहुत खर्चीला है। सामान्य परिवार लंबी कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकते। मुकदमेबाजी में वर्षों का समय लग जाता है। देश भर की न्यायालयों में 4.8 करोड़ से अधिक मामले लंबित पड़े हैं। इससे पीड़ितों को न्याय में भारी विलंब होता है।
जवाबदेही तंत्र का अभाव
गलत एफआईआर दर्ज करने वालों पर शायद ही कोई कार्रवाई होती है। पुलिस अधिकारी लगभग दण्डमुक्ति के भाव से कार्य करते हैं। गुजरात उच्च न्यायालय ने वर्ष 2024 में एक मामले में कड़ी टिप्पणी की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एफआईआर कोई प्रतिशोध का हथियार नहीं है। पर व्यवहार में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं दिखाई देता।
राष्ट्रीय आँकड़ों की चौंकाने वाली सच्चाई
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताज़ा आँकड़े गंभीर चिंता का विषय हैं। वर्ष 2022-23 में सोशल मीडिया से जुड़े 2,800 से अधिक मामले दर्ज हुए। इनमें से लगभग 65% मामले राजनीतिक आलोचना से सम्बंधित थे। चिंताजनक बात यह है कि केवल 12% मामलों में ही सजा हुई। यह आँकड़े तंत्र की विफलता को स्पष्ट करते हैं।
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हालिया न्यायिक हस्तक्षेप के उदाहरण
केरल उच्च न्यायालय ने मई 2024 में एक कवि को महत्वपूर्ण राहत दी। पुलिस ने उसकी सामाजिक विषयों पर लिखी कविता को आपत्तिजनक बताया था। न्यायालय ने कहा कि कलात्मक अभिव्यक्ति अपराध नहीं हो सकती। दिल्ली न्यायालय ने जून माह में एक पत्रकार की गिरफ्तारी को निरस्त किया। यह मामला त्वरित न्यायिक हस्तक्षेप का उत्कृष्ट उदाहरण है।
सुधार की दिशा में आवश्यक कदम
उच्च न्यायालय के आदेश का प्रभावी क्रियान्वयन
आंध्र प्रदेश न्यायालय का परिपत्र सराहनीय पहल है। इसे प्रभावी बनाने के लिए तीन प्रमुख कदम उठाए जाने चाहिए। सभी जिलों में न्यायिक अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण अनिवार्य हो। पुलिस कर्मियों को प्रारंभिक जांच के प्रोटोकॉल का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए। मासिक अनुपालन रिपोर्टिंग की पारदर्शी व्यवस्था शुरू की जाए।
नागरिक समाज की सक्रिय भूमिका
जागरूक नागरिक ही वास्तविक परिवर्तन ला सकते हैं। गैर-सरकारी संगठनों को कानूनी सहायता केंद्र स्थापित करने चाहिए। सोशल मीडिया के माध्यम से संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाई जाए। संसद सदस्यों से कानून में आवश्यक सुधार की माँग की जानी चाहिए।
निष्कर्ष: स्वतंत्रता की रक्षा का संकल्प
उच्च न्यायालय का यह हस्तक्षेप समय की महती आवश्यकता थी। ट्वीट या कविता जैसी अभिव्यक्तियों के लिए हिरासत लोकतंत्र के विरुद्ध है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ये नियम केवल कागजों तक सीमित न रहें। नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना होगा। न्यायालयों को निरंतर निगरानी तंत्र विकसित करना होगा। एक स्वस्थ लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार मूलभूत आधार है। इसकी रक्षा करना हम सभी का सामूहिक दायित्व है।



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