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भारत तालिबान राजनयिक संबंध और बदलती विदेश नीति

भारत तालिबान राजनयिक संबंध

भारत तालिबान राजनयिक संबंध दक्षिण एशिया की कूटनीतिक जटिलता का सबसे संवेदनशील विषय बन चुका है।
अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत को अपने हितों की रक्षा के साथ वैश्विक संतुलन भी बनाए रखना पड़ा।

2021 में तालिबान की सत्ता वापसी ने क्षेत्रीय राजनीति को बदल दिया।भारत ने उस समय काबुल दूतावास खाली किया था।परंतु मानवीय सहायता और रणनीतिक वार्ता का मार्ग खुला रखा गया।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत और अफगानिस्तान के संबंध सदियों पुराने हैं। लेकिन तालिबान के शासन ने इन रिश्तों को चुनौतीपूर्ण बना दिया।

1996 में तालिबान के पहले शासन को भारत ने मान्यता नहीं दी थी।भारत ने तब “नॉर्दर्न अलायंस” का समर्थन किया था जो तालिबान के विरोध में था।2001 के बाद भारत ने लोकतांत्रिक अफगान सरकार के साथ घनिष्ठ सहयोग स्थापित किया।सड़कें, अस्पताल, संसद भवन और शिक्षा परियोजनाएँ भारत की सहायता से बनीं।

यह ऐतिहासिक संदर्भ भारत की नीति के सतर्क स्वरूप को स्पष्ट करता है।

तालिबान की वापसी और भारत की रणनीति

15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर नियंत्रण कर लिया। भारत ने तुरंत अपने राजनयिकों को सुरक्षित वापस बुलाया।
लेकिन यह वापसी स्थायी नहीं थी। जल्द ही भारत ने मानवीय राहत भेजने और संवाद के द्वार खोलने शुरू किए।

गेहूँ, दवाइयाँ और टीके अफगान जनता को भारत ने भेंट किए।जून 2022 में भारत ने “टेक्निकल मिशन” के रूप में काबुल में अपनी सीमित उपस्थिति बहाल की।यह कदम संकेत था कि भारत तालिबान के साथ सीमित संपर्क रखेगा, पर औपचारिक मान्यता नहीं देगा।

वर्तमान कूटनीतिक स्थिति

भारत तालिबान राजनयिक संबंध अब “संयम और संवाद” की नीति पर आधारित हैं।
भारत तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं देता, पर संवाद जारी रखता है।

अक्टूबर 2025 में विदेश सचिव विक्रम मिश्री ने तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मुत्ताकी से दुबई में मुलाकात की।काबुल में भारतीय तकनीकी मिशन अब सीमित दूतावासीय कार्य कर रहा है।

भारत ने अफगान नागरिकों के लिए वीज़ा सेवाएँ फिर शुरू की हैं।तालिबान भी भारत की सहायता को “राजनीति से ऊपर” बताते हुए स्वागत करता है।

यह नीति भारत को एक व्यवहारिक, परंतु नैतिक रूप से संतुलित स्थिति में रखती है।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और चुनौतियाँ

भारत तालिबान राजनयिक संबंध वैश्विक मंच पर मिश्रित प्रतिक्रिया पैदा करते हैं।
अमेरिका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र तालिबान को लेकर सतर्क हैं।

भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन रखना पड़ता है।

तालिबान के महिला शिक्षा प्रतिबंधों पर भारत ने चिंता व्यक्त की है।

लेकिन उसने यह भी कहा है कि “अफगान जनता के साथ भारत हमेशा रहेगा।”

चीन और पाकिस्तान की अफगानिस्तान में बढ़ती सक्रियता भी भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती है।

राजनीतिक और सुरक्षा दृष्टि

भारत को इस बात की चिंता है कि अफगान धरती भारत विरोधी आतंकवाद के लिए इस्तेमाल न हो।
तालिबान ने भारत को भरोसा दिलाया है कि वह “भारतीय सुरक्षा चिंताओं को समझता है।”

भारत ने सुरक्षा एजेंसियों के माध्यम से “गैर-औपचारिक संपर्क चैनल” बनाए हैं।अफगानिस्तान में भारतीय परियोजनाओं की सुरक्षा पर नियमित समीक्षा की जाती है।पाकिस्तान की भूमिका पर भारत सतर्क निगरानी रखे हुए है

भारत तालिबान राजनयिक संबंध अब नई विदेश नीति के युग का प्रतीक हैं —
जहाँ आदर्शवाद और यथार्थवाद का मिश्रण आवश्यक है।

भारत ने यह साबित किया है कि संवाद बंद करना समाधान नहीं, बल्कि रणनीतिक समझ से नए रास्ते खोले जा सकते हैं।
अफगानिस्तान में स्थिरता भारत की सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय संतुलन के लिए आवश्यक है।
भारत तालिबान राजनयिक संबंध अब “संपर्क लेकिन समर्थन नहीं” की नीति पर आगे बढ़ रहे हैं
जहाँ मानवीय संवेदना, सुरक्षा चिंता और वैश्विक संतुलन तीनों का समन्वय भारत की कूटनीति का आधार बन गया है।

भविष्य की दिशा

भारत तालिबान राजनयिक संबंध आगे किस दिशा में बढ़ेंगे, यह अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य और तालिबान के व्यवहार पर निर्भर करेगा।
अगर तालिबान अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पालन करता है, तो भारत धीरे-धीरे अधिक औपचारिक संबंध स्थापित कर सकता है।

लेकिन अगर वह कट्टर नीतियों पर कायम रहता है, तो भारत “सीमित संवाद” की रणनीति जारी रखेगा।

भारत के लिए अफगानिस्तान में स्थिरता न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए, बल्कि मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुँच के लिए भी आवश्यक है।

रणनीतिक चिंताएँ और पाकिस्तान का तत्व

अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिति हमेशा भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता से प्रभावित रही है।
तालिबान और पाकिस्तान के घनिष्ठ संबंध भारत की रणनीतिक चिंता का विषय हैं।

भारत को डर है कि आईएसआई अफगान क्षेत्र को आतंकवादी समूहों के लिए आश्रय स्थल बना सकता है।इसलिए भारत अपनी सुरक्षा एजेंसियों के माध्यम से तालिबान से “बैक-चैनल संवाद” बनाए हुए है।भारत की नीति स्पष्ट है — सुरक्षा और कूटनीति एक साथ चलनी चाहिए।

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