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भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने बचाई भारत की साख

भारतीय निर्यातकों को राहत

भारतीय निर्यातकों को राहत अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी 2026 को एक ऐतिहासिक फैसले में 6-3 के भारी बहुमत से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापक “रिसिप्रोकल” टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया है। ये टैरिफ इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए थे, जिसे कोर्ट ने असंवैधानिक माना है।

चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने कड़े शब्दों में लिखा कि IEEPA राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की स्पष्ट शक्ति नहीं देता; यह कानून आपातकाल में संपत्ति नियंत्रण के लिए बनाया गया है, न कि आयात पर मनमाना कर लगाने के लिए। इस फैसले ने “लिबरेशन डे” टैरिफ (10% वैश्विक और कुछ देशों पर उच्च दर) को पूरी तरह रद्द कर दिया है।

इसमें भारत पर थोपा गया 18% (जो पहले 50% तक प्रस्तावित था) का भारी-भरकम टैक्स भी शामिल था। अनुमान है कि $160-200 बिलियन से अधिक का टैरिफ राजस्व अब अवैध हो गया है, और इसकी रिफंड प्रक्रिया यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में शुरू होगी। इस फैसले से भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिली है, क्योंकि अब सप्लाई चेन में स्थिरता आएगी।

IEEPA आधारित टैरिफ का अंत: भारत के लिए व्यापारिक जीत

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सीधा असर भारत के निर्यात क्षेत्र पर पड़ेगा। आंकड़ों के अनुसार, भारत का लगभग 55% निर्यात, जिसमें टेक्सटाइल, फार्मास्युटिकल्स और जेम्स एंड ज्वेलरी जैसे प्रमुख सेक्टर शामिल हैं, अब 18% की दमनकारी ड्यूटी से मुक्त हो जाएगा।

अब केवल स्टैंडर्ड MFN (मोस्ट फेवर्ड नेशन) टैरिफ ही लागू रहेंगे, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलने के साथ ही अब अमेरिका को होने वाले शिपमेंट में अनिश्चितता का माहौल भी खत्म होगा। यह फैसला उन सभी दावों को खारिज करता है जिनके तहत राष्ट्रपति ने व्यापारिक करों को राष्ट्रीय आपातकाल से जोड़ने की कोशिश की थी।

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इंटरिम ट्रेड फ्रेमवर्क का सच और 6 फरवरी का जॉइंट स्टेटमेंट

फरवरी 2026 की शुरुआत में, ट्रंप प्रशासन ने भारत के साथ एक ‘इंटरिम ट्रेड फ्रेमवर्क’ की घोषणा की थी। 6 फरवरी 2026 को जारी व्हाइट हाउस के जॉइंट स्टेटमेंट के अनुसार, अमेरिका ने भारत पर रिसिप्रोकल टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया था और रूस से तेल खरीद पर लगने वाली 25% अतिरिक्त पेनल्टी को भी हटा लिया था।

बदले में, भारत ने अमेरिकी इंडस्ट्रियल गुड्स पर टैरिफ जीरो करने, कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने और $500 बिलियन मूल्य के अमेरिकी उत्पाद खरीदने का भारी वादा किया था। ट्रंप ने तब दावा किया था कि भारत रूस से तेल लेना बंद कर देगा, हालांकि जॉइंट स्टेटमेंट में ऐसी कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं थी। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को ही अवैध कर दिया है, तो उस दबाव का आधार ही ढह गया है जिसके तहत यह समझौता हुआ था।

भारतीय कृषि पर मंडराता खतरा: क्या अब पलटेंगे वादे?

भारत ने इस समझौते के तहत अमेरिकी कृषि उत्पादों—जैसे DDGS, रेड सोरघम, सोयाबीन ऑयल, फल और वाइन—पर टैरिफ कम करने या जीरो करने का वादा किया था। यह भारतीय किसानों के लिए एक बहुत बड़ा खतरा था, क्योंकि दूध, अनाज, पोल्ट्री और फल-सब्जी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में 30% से 150% तक ड्यूटी हुआ करती थी।

सस्ते अमेरिकी आयात से स्थानीय उत्पादन बर्बाद होने की आशंका थी। अब भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलने के बाद मोदी सरकार के पास यह तर्क देने का सुनहरा मौका है कि चूंकि अमेरिकी दबाव ही गैरकानूनी था, इसलिए कृषि बाजार खोलने के वादे अब बाध्यकारी नहीं होने चाहिए। GTRI जैसे थिंक टैंक भी मानते हैं कि सरकार को अब किसानों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।

रूस से तेल खरीद: ट्रंप के दबाव से मिली मुक्ति

रूस से तेल खरीद का मुद्दा इस पूरे प्रकरण में सबसे संवेदनशील रहा है। ट्रंप ने इसे यूक्रेन युद्ध से जोड़ते हुए भारत पर भारी दबाव बनाया था और एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के जरिए रूसी क्रूड पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया था। ट्रंप के दावे के बावजूद, भारत ने कभी भी रूस से तेल बंद करने की लिखित प्रतिबद्धता नहीं दी थी।

अब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद रूस से सस्ता तेल खरीदने पर कोई कानूनी बाधा नहीं बची है। रूस 2025 में भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है और यह भारत की “मल्टी-एलाइनमेंट” नीति का आधार है। अब सरकार बिना किसी प्रतिबंध के डर के अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है और वैश्विक स्तर पर अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता दिखा सकती है।

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ट्रंप की अगली चाल और भारत के लिए रणनीतिक अवसर

भले ही IEEPA के तहत टैरिफ रद्द हो गए हों, लेकिन ट्रंप अभी भी सेक्शन 301 (अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस) या सेक्शन 232 (नेशनल सिक्योरिटी) जैसे कानूनों का सहारा ले सकते हैं। हालांकि, ये प्रक्रियाएं लंबी होती हैं और इनमें गहन जांच और कोर्ट की समीक्षा की आवश्यकता होती है।

यह भारत के लिए ‘समय खरीदने’ का एक बेहतरीन अवसर है। भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलने के बाद अब सरकार को अपनी शर्तों पर बातचीत करनी चाहिए। अगर मोदी सरकार पुराने इंटरिम डील पर अड़ी रहती है, तो इसे एक तरह का ‘आत्मसमर्पण’ माना जाएगा, क्योंकि जिस ‘टैरिफ गन’ की नोक पर यह डील हुई थी, वह अब संवैधानिक रूप से खाली साबित हो चुकी है।

एकतरफा व्यापारिक धौंस की हार और वैश्विक संदेश

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वैश्विक स्तर पर अमेरिका की एकतरफा व्यापारिक धौंस की पोल खोलता है। ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति संवैधानिक कसौटी पर विफल रही है, जहां कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टैक्स (टैक्स/टैक्स) लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस को है, राष्ट्रपति को नहीं।

वियतनाम और ब्राजील जैसे कई विकासशील देशों ने भी इस फैसले के बाद राहत की सांस ली है। भारत के लिए संदेश साफ है कि अमेरिकी दबाव में घुटने टेकने की जरूरत नहीं है; कानूनी लड़ाई से जीत संभव है। मोदी सरकार को अब साहस दिखाते हुए अपनी आर्थिक संप्रभुता और किसानों के हितों की रक्षा करनी चाहिए।

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मोदी सरकार के लिए संप्रभुता का ‘अंतिम टेस्ट’

अंत में, यह फैसला भारत के लिए सिर्फ राहत नहीं, बल्कि एक कठिन परीक्षा है। क्या हम अब भी अमेरिकी कृषि लॉबी की धमकियों और $500 बिलियन की खरीद के वादे के आगे झुकेंगे, या फिर एक मजबूत राष्ट्र के रूप में अपनी शर्तों पर नई डील करेंगे?

रूस से तेल, भारतीय किसानों की सुरक्षा और टैरिफ का बोझ, ये सब अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले कदमों पर टिका है। यह एक ऐतिहासिक अवसर है; यदि इसका फायदा नहीं उठाया गया, तो इतिहास इसे एक गंवाए हुए अवसर के रूप में दर्ज करेगा, जहां भारत ने अपनी संप्रभुता को सस्ते में बेच दिया।

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