बिहार चुनाव में धांधली: ECI की SIR प्रक्रिया पर ‘लोकतंत्र की हत्या’ का आरोप
बिहार चुनाव में धांधली और लोकतंत्र की तबाही से विपक्ष सहित देश की जनता भयानक गुस्से में है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का परिणाम न केवल एक राजनीतिक भूकंप था, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों पर एक सुनियोजित हमला था।
इस हमले में, चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया ने मतदाता सूची को एक हथियार में बदल दिया। एनडीए की 202 सीटों (बीजेपी 89, जेडीयू 85, एलजेएपी 19, अन्य 9) की भारी जीत और महागठबंधन की महज 35 सीटों (आरजेडी 25, कांग्रेस 6, अन्य 4) पर सिमट जाना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक खतरनाक और कुटिल साजिश का नतीजा था।
यह ‘चुनाव चोरी’ का नया मॉडल है, जहां 174 सीटों पर डिलीटेड वोटर्स विजेता के मार्जिन से ज्यादा थे।
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SIR के आंकड़े: विपक्षी वोटबैंक को साफ करने की साजिश
जून 2025 में 7.89 करोड़ से घटकर सितंबर 2025 में 7.42 करोड़ मतदाता रह गए। इस अवधि में 68.5 लाख नाम काटे गए, जिसमें 65 लाख ड्राफ्ट स्टेज पर और 3.66 लाख क्लेम्स एंड ऑब्जेक्शंस के दौरान डिलीट हुए, जबकि 21.53 लाख नए जोड़े गए।
यह कोई सफाई नहीं, बल्कि विपक्षी वोटबैंक को साफ करने की साजिश थी, जहां महिलाएं (22.7 लाख डिलीटेड), मुस्लिम और प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।
सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त 2025 को ईसीआई को डिलीटेड वोटर्स की डिटेल्ड लिस्ट (कारणों जैसे डेथ, माइग्रेशन, डुप्लिकेशन सहित) पब्लिश करने का आदेश दिया, लेकिन आयोग ने पारदर्शिता की धज्जियां उड़ा दीं।
आंकड़ों की कड़वी सच्चाई और ‘इलेक्टोरल इंजीनियरिंग’
SIR की आंकड़ों की कड़वी सच्चाई बताती है कि यह प्रक्रिया निष्पक्षता का मुखौटा पहनकर सत्ता के हित साध रही थी। 99% डिलीशंस डेथ (22 लाख), परमानेंट माइग्रेशन (36 लाख) और डुप्लिकेशन (7 लाख) के नाम पर हुईं, लेकिन असमान वितरण ने संदेह पैदा कर दिया।
मुस्लिम बहुल जिलों जैसे किशनगंज में 1.45 लाख नाम कटे, सीमांचल में डिलीशन रेट राज्य औसत से 3 गुना ज्यादा था, जबकि हिंदू बहुल इलाकों में कम। महागठबंधन की 71 में से 75 सीटें ऐसी फ्लिप हुईं जहां डिलीटेड वोटर जीत के अंतर से ज्यादा थे।
कुरहनी में 616 वोटों की जीत के मुकाबले 24,000 डिलीशन, और हिलसा में 12 वोटों के मुकाबले 1,643 डिलीशन दर्ज हुए! विपक्ष का दावा कि बीजेपी के पन्ना प्रमुखों ने 68 लाख नाम ‘रेकी’ कर कटवाए, हवा में नहीं उड़ा। रिपोर्टर्स कलेक्टिव की जांच में 5,000 से ज्यादा डबल एंट्रीज यूपी और बिहार लिस्ट में पाई गईं, जहां बीजेपी समर्थक डुप्लिकेट वोटर बनाए गए।
यह एक सुनियोजित ‘इलेक्टोरल इंजीनियरिंग’ था, जहां प्रवासियों को ‘मृत’ या ‘डुप्लिकेट’ ठहराकर लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया।
इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में दाखिल PIL (WP(C) No. 640/2025) में ADR (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) ने अनियमितताओं की शिकायत की है।
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विपक्ष की चुप्पी और रणनीतिक भूल ने बनाई साजिश आसान
विपक्ष के आरोपों में दम है, लेकिन उनकी चुप्पी और कमजोरी ने इस साजिश को आसान बना दिया। महागठबंधन ने दावा किया कि 128 सीटों पर डिलीटेड वोटर जीत के अंतर से ज्यादा थे, जिससे 35+128=163 सीटें उनके खाते में आनी चाहिए थीं।
केरल कांग्रेस और शिवसेना (UBT) के आदित्य ठाकरे ने 128 सीटों पर रिगिंग का आरोप लगाया, जबकि द वायर की रिपोर्ट में 11 सीटों पर SIR डिलीशंस मार्जिन से ज्यादा पाए गए। लेकिन क्या उन्होंने SIR के खिलाफ सड़कों पर उतरकर लड़ाई लड़ी? नहीं, बस सोशल मीडिया पर शोर मचाया।
राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा ने 25 जिलों में 1,300 किमी की यात्रा कवर किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दायर PIL को मजबूती से लड़ने में नाकाम रहे। आरजेडी और कांग्रेस ने ‘वोट चोरी’ का नारा तो दिया, लेकिन अपील्स की डेडलाइन (14 अक्टूबर 2025) तक कोई अपील न दाखिल करना उनकी रणनीतिक भूल थी। इस बात को मैं मानता हूँ कि आज के समय में सुप्रीम कोर्ट भी बायस है, लेकिन रेकार्ड पर तो जाता खैर!
एक तरफ जहां एनडीए ने BLOs (1 लाख) और स्वयंसेवकों (4 लाख) की फौज लगाकर ‘सफाई’ की, वहीं विपक्ष ने सिर्फ आरोप लगाकर खुद को कमजोर साबित किया।
लोकतंत्र की रक्षा में विपक्ष की ऐसी सुस्ती शर्मनाक है, खासकर जब 35.69 लाख ‘अनट्रेसेबल’ वोटरों को छिपाया गया। बिहार चुनाव में धांधली के इतने पुख्ता सबूत होने के बावजूद विपक्ष की सुस्ती हैरान करती है।
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चुनाव आयोग: निष्पक्षता का मुखौटा या सत्ता की कठपुतली?
चुनाव आयोग, जो कभी भारतीय लोकतंत्र और चुनावी स्वतंत्रता का प्रतीक था, अब मोदी-शाह के सत्ता की कठपुतली बन चुका है। SIR के तहत 3.66 लाख अतिरिक्त डिलीशन और 21 लाख एडिशन के बावजूद, आयोग ने ‘अनट्रेसेबल’ वोटरों की 35.69 लाख संख्या को छिपाया।
सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता की मांग की, लेकिन आयोग ने ‘फॉरेनर्स’ हटाने का बहाना बनाकर मुस्लिम वोटरों को निशाना बनाया। किशनगंज जैसे इलाकों में डिलीशन रेट काफी ऊंचा रहा। क्या यह संयोग है कि सीमांचल जैसे विपक्षी किलों में डिलीशन रेट 3 गुना ज्यादा था? आयोग का दावा है कि कोई अपील नहीं आई, यह दावा झूठा है।
लाखों प्रवासियों ने नाम कटने की शिकायत की, लेकिन BLOs ने फॉर्म ही नहीं लिए। 98.2% वेरिफिकेशन के बावजूद 269 वोटर्स एक ही एड्रेस पर रजिस्टर्ड पाए गए।
यह संस्थागत पतन है, जहां चुनाव आयोग ‘स्पेशल’ रिवीजन के नाम पर ‘स्पेशल’ रिगिंग कर रहा है, और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने ‘एन मास एक्सक्लूजन’ पर चिंता जताई। ईसीआई का यह रवैया न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए भयानक खतरे के रूप में उभरकर सामने आ रहा है।
परिणामों का विश्लेषण: डिलीशन ने सीटें फ्लिप कीं
परिणामों का विश्लेषण बताता है कि SIR ने न केवल सीटें फ्लिप कीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद को ही जड़ से हिला दिया। 174 सीटों पर डिलीटेड वोटर मार्जिन से ज्यादा थे, जिनमें 91 सीटें फ्लिप हुईं और एनडीए ने 75 जीतीं। द क्विंट की रिपोर्ट में 100 सीटें 2020 से फ्लिप हुईं, जिनमें 75 पर SIR का असर साफ दिखता है।
महागठबंधन की 71 में से 15 ही बचीं। हिलसा में 12 वोटों की मार्जिन के मुकाबले 1,643 डिलीशन—यह क्या चुनाव है? महिला मतदाताओं की टर्नआउट 71.6% रही (पुरुष 62.8%), लेकिन SIR ने 22.7 लाख महिलाओं के नाम काटे, जिससे जेंडर रेशियो 934 से गिरकर 892 हो गया (3.93 करोड़ पुरुष, 3.51 करोड़ महिलाएं)।
युवा बेरोजगारी और प्रवासन के मुद्दों पर विपक्ष की मुहिम को कुचल दिया गया। 75 लाख प्रवासी बिहारियों को वोट डालने का मौका ही नहीं मिला।
एनडीए का 47.2% वोटशेयर और महागठबंधन का 37.3% अंतर सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि वोटर सिलेक्शन का नतीजा है। एक्जिट पोल्स (Axis My India: NDA 121-141, MGB 98-118) भी SIR के बाद शिफ्ट हुए। यह जीत नहीं, चोरी है, जहां जन सूराज पार्टी को 3.5% वोट मिले लेकिन कोई सीट नहीं जीत पाया।
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बीजेपी की केंद्रीय भूमिका: ‘वोटर प्योरिफिकेशन’ या ‘विपक्षी वोटर एलिमिनेशन’?
इस साजिश के पीछे बीजेपी की केंद्रीय भूमिका साफ दिखती है। चुनाव आयोग का SIR, पन्ना प्रमुखों की ‘रेकी’ से लेकर BLOs की ट्रेनिंग (1.5 लाख एजेंट्स) तक, सब कुछ एनडीए के इशारे पर चला।
नरेंद्र मोदी और नितीश कुमार ने SIR को ‘वोटर प्योरिफिकेशन’ का नाम दिया, लेकिन वास्तव में यह ‘विपक्षी वोटर एलिमिनेशन’ था। 2020 में महागठबंधन की 110 सीटें SIR के बाद धूल चाट गईं, क्योंकि डुप्लिकेट एंट्रीज हटाने के नाम पर असली वोटरों को हटाया गया।
विपक्ष का गणित सही था—35+126=161—लेकिन सत्ता ने गणित बदल दिया, और अमित शाह ने इसे ‘नेशनल मूड’ बताया। यह राजनीतिक नैतिकता का लोप है, जहां सत्ता लोकतंत्र को ‘मैनेज’ कर रही है। पीपल्स पल्स एक्जिट पोल ने NDA को 130-167 सीटें दीं।
बीजेपी को अपने इस जनमत की चोरी के कृत्य पर शर्म आनी चाहिए, लेकिन बेशर्मी से जश्न मना रही है, जबकि X पर #BiharSIR2025 ट्रेंडिंग में है विपक्ष के आरोपों ने आग लगाई। यह स्पष्ट है कि बिहार चुनाव में धांधली केवल एक आरोप नहीं, बल्कि संस्थागत साक्ष्य के साथ जुड़ा हुआ है।
खतरे की घंटी: जागो, वरना सब खत्म हो जाएगा!
अंत में, बिहार का यह नाटक भारत के लोकतंत्र के लिए भयानक खतरे की घंटी है, जहां SIR जैसी प्रक्रियाओं को पूरे देश में दोहराने की योजना है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, यूपी में SIR 2.0 (नवंबर 2025 से 12 राज्यों में) शुरू होने वाला है। बिहार में वोट चोरी से निर्मित चुनाव परिणाम एक खतरनाक पूर्वाभास है।
अगर 68 लाख वोटरों को ‘अदृश्य’ बनाया जा सकता है, तो अगला चुनाव क्या होगा? विपक्ष को जागना होगा, सिविल सोसाइटी को लड़ना होगा (जैसे योगेंद्र यादव की अपील), और सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना होगा, अन्यथा, भारत का लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाएगा। बिहार ने चेतावनी दी है: जागो, वरना सब खत्म हो जाएगा!
सोशल मीडिया X पर डिबेट्स और रिपोर्ट्स (जैसे Peek TV की 269 डुप्लिकेट्स वाली जांच) साबित करती हैं कि यह BJP और ECI का संयुक्त सिस्टमेटिक फ्रॉड है।
बिहार चुनाव में धांधली की ये बातें बताती हैं कि अगर इस देश, देश की आजादी, देश का लोकतन्त्र और देश की संप्रभुता को बचाना हैं तो देश की जनता को अब “आजादी की लड़ाई” के तर्ज़ पर “लोकतन्त्र की लड़ाई” सड़क पर उतर कर लड़नी होगी, और हाँ लोकतन्त्र के हत्यारों के खिलाफ देश की जनता नें अपना माइंडसेट बना लिया है उसे एक ईमानदार और मजबूत पहल का इंतजार है।



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