डिजिटल युग में गोपनीयता का अधिकार: भारतीय संदर्भ
गोपनीयता का अधिकार: परिभाषा और महत्व
आज के डिजिटल युग में गोपनीयता का अधिकार हर नागरिक की मौलिक आवश्यकता बन गया है। यह अधिकार व्यक्ति को यह तय करने की स्वतंत्रता देता है कि उसकी निजी जानकारी कैसे, कब और किसके साथ साझा की जाए। गोपनीयता केवल जानकारी छिपाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा का प्रतीक है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन लेनदेन और सरकारी डेटाबेस के विस्तार ने इसकी प्रासंगिकता को और बढ़ा दिया है।
गोपनीयता क्या है?
गोपनीयता का अर्थ है अपने जीवन, डेटा और संचार पर पूर्ण नियंत्रण रखना। यह अधिकार हमें अनचाही निगरानी, डेटा चोरी और दुरुपयोग से बचाता है। डिजिटल युग में, जहाँ हर गतिविधि ऑनलाइन हो रही है, गोपनीयता का महत्व और भी बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी या ऑनलाइन खरीदारी के दौरान दिए गए बैंक विवरण का दुरुपयोग हो सकता है।
गोपनीयता का इतना महत्व क्यों?
गोपनीयता का अधिकार व्यक्तिगत सुरक्षा, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और मानवाधिकारों से जुड़ा है। डेटा लीक होने पर वित्तीय धोखाधड़ी या पहचान चोरी का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, निगरानी के डर के बिना विचारों का आदान-प्रदान लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार घोषणा (UDHR) और ICCPR जैसे अंतर्राष्ट्रीय समझौते भी गोपनीयता को मौलिक अधिकार मानते हैं।
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भारत में गोपनीयता का कानूनी सफर
भारत में गोपनीयता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का हिस्सा है। 2017 के पुट्टास्वामी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसे मौलिक अधिकार घोषित किया, जिससे डेटा संरक्षण कानूनों को नई दिशा मिली। इस फैसले ने स्पष्ट किया कि बिना सहमति के व्यक्तिगत डेटा एकत्र करना असंवैधानिक है।
संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 21 के अलावा, अनुच्छेद 19(1) (a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ गोपनीयता को जोड़ता है। न्यायालय ने कई मामलों में कहा कि निजता के बिना स्वतंत्र अभिव्यक्ति अधूरी है। उदाहरण के लिए, आधार कार्ड योजना पर फैसले में गोपनीयता के महत्व पर जोर दिया गया। साथ ही, अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत गोपनीयता को मजबूती देता है।
महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय
भारतीय न्यायपालिका ने गोपनीयता के अधिकार को विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई है। 1962 के खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश मामले में पुलिस की निगरानी को गोपनीयता के उल्लंघन के रूप में चिह्नित किया गया। 1978 के मेनका गांधी मामले में अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या करते हुए निजता को शामिल किया गया। 2018 के आधार मामले में बायोमेट्रिक डेटा के संग्रह में गोपनीयता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।
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डिजिटल युग की चुनौतियाँ: गोपनीयता पर संकट
तकनीकी प्रगति ने गोपनीयता का अधिकार नए खतरों में धकेल दिया है। सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स और सरकारी डिजिटलीकरण ने डेटा को संवेदनशील बनाया है। डेटा उल्लंघन, सरकारी निगरानी और कॉर्पोरेट डेटा शोषण जैसी चुनौतियाँ गंभीर हैं।
उदाहरण के लिए, 2023 में कोटक महिंद्रा बैंक के 3.2 लाख ग्राहकों का डेटा लीक हुआ, जिससे वित्तीय धोखाधड़ी का खतरा पैदा हो गया। इसी तरह, व्हाट्सएप ने 2021 में उपयोगकर्ताओं का डेटा फेसबुक के साथ साझा किया, जिससे गोपनीयता उल्लंघन की आशंका बढ़ी। सरकारी योजनाओं जैसे आधार में बायोमेट्रिक डेटा का संग्रह भी विवादों में रहा है।
एक और चुनौती एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा नस्ल, लिंग या धर्म के आधार पर भेदभावपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं। यह न केवल गोपनीयता बल्कि समानता के अधिकार को भी प्रभावित करता है।
गोपनीयता संरक्षण के लिए भारत के प्रयास
गोपनीयता का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए भारत ने हाल के वर्षों में कानूनी और तकनीकी कदम उठाए हैं। 2023 का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह अधिनियम डेटा संग्रह के लिए स्पष्ट सहमति अनिवार्य करता है और “भूल जाने के अधिकार” को मान्यता देता है।
इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 साइबर अपराधों और डेटा सुरक्षा से जुड़े नियमों को परिभाषित करता है। बी.एन. श्रीकृष्ण समिति की सिफारिशों ने डेटा स्थानीयकरण और उपयोगकर्ता अधिकारों पर जोर दिया है। तकनीकी स्तर पर, डेटा एन्क्रिप्शन और AI-आधारित सुरक्षा उपकरणों का उपयोग बढ़ रहा है।
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यूरोपीय GDPR और भारतीय कानून: तुलना
भारत का गोपनीयता का अधिकार यूरोपीय GDPR (जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन) से प्रेरित है, लेकिन कुछ अंतर हैं। दोनों में डेटा संग्रह के लिए सहमति, डेटा हटाने का अधिकार और पारदर्शी नियम समान हैं। हालाँकि, भारत सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर डेटा एक्सेस की विशेष छूट है।
GDPR में जुर्माना वैश्विक टर्नओवर का 4% तक हो सकता है, जबकि भारत में अधिकतम जुर्माना ₹500 करोड़ निर्धारित है। इसके अलावा, भारत में कुछ डेटा को देश के भीतर स्टोर करना अनिवार्य है, जबकि GDPR में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
नागरिकों के लिए गोपनीयता सुरक्षा के टिप्स
गोपनीयता का अधिकार सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं है, यह हर नागरिक की ज़िम्मेदारी भी है। व्यक्तिगत स्तर पर सोशल मीडिया सेटिंग्स को प्राइवेट रखना, मजबूत पासवर्ड का उपयोग और VPN जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं। साथ ही, अनावश्यक ऐप्स को हटाने से डेटा एकत्रीकरण रोका जा सकता है।
सामाजिक जागरूकता के लिए डेटा सुरक्षा पर वर्कशॉप, स्कूली पाठ्यक्रम में साइबर सुरक्षा को शामिल करना और मीडिया के माध्यम से प्रचार आवश्यक है। नागरिकों को अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए और गोपनीयता उल्लंघन की स्थिति में शिकायत करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
भविष्य की राह: क्या करना चाहिए?
गोपनीयता का अधिकार डिजिटल युग में नागरिकों की स्वतंत्रता का आधार बना रहे, इसके लिए सरकार और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। सरकार को GDPR जैसी स्वतंत्र डेटा संरक्षण प्राधिकरण बनाना चाहिए और कानूनों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना चाहिए। तकनीकी निवेश कर साइबर सुरक्षा ढाँचे को मजबूत करना भी आवश्यक है।
नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए और सुरक्षा उपायों को अपनाना चाहिए। सक्रिय भागीदारी से ही गोपनीयता की रक्षा संभव है।
डिजिटल युग में गोपनीयता का अधिकार न केवल एक कानूनी अवधारणा है, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ है। भारत ने इस दिशा में प्रगति की है, लेकिन डेटा सुरक्षा, जागरूकता और तकनीकी सुधारों पर लगातार काम करना होगा। याद रखें: गोपनीयता की रक्षा करना केवल सरकार या कंपनियों की ज़िम्मेदारी नहीं, यह हर नागरिक का कर्तव्य है।



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