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ED बनाम पश्चिम बंगाल: सुप्रीम कोर्ट ने FIR पर लगाई रोक, ममता को नोटिस

ED बनाम पश्चिम बंगाल

ED बनाम पश्चिम बंगाल सुप्रीम कोर्ट ने आज एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप करते हुए राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के दफ्तर और इसके को-फाउंडर प्रतीक जैन के कोलकाता स्थित आवास पर हुई तलाशी के सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारियों के खिलाफ पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा दर्ज FIR पर अंतरिम रोक लगा दी है।

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि याचिकाओं में केंद्रीय जांच में राज्य एजेंसियों द्वारा कथित हस्तक्षेप के “बहुत गंभीर सवाल” उठाए गए हैं।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कुमार, कोलकाता पुलिस कमिश्नर और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

कानून के शासन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम पंचोली की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कानून के शासन का पालन करने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। अदालत ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि इस तरह के मुद्दों को अनसुलझा छोड़ दिया जाता है, तो इससे देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है।

बेंच ने अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका पर विचार करते हुए कहा कि पहली नज़र में यह मामला केंद्रीय जांच और राज्य के हस्तक्षेप के बीच एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या किसी पार्टी की गतिविधियों की आड़ में केंद्रीय एजेंसियों को उनकी वैधानिक शक्तियों का प्रयोग करने से रोका जा सकता है?

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ED बनाम पश्चिम बंगाल: जांच में बाधा और ‘चौंकाने वाला पैटर्न’

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ED का पक्ष रखते हुए कोर्ट को बताया कि यह मामला राज्य प्रशासन द्वारा हस्तक्षेप का एक “चौंकाने वाला पैटर्न” प्रदर्शित करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी वैधानिक अधिकारियों ने अपनी शक्तियों का प्रयोग किया, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने व्यक्तिगत रूप से दखल दिया।

ED का दावा है कि कोयला घोटाले की मनी लॉन्ड्रिंग जांच के सिलसिले में I-PAC के कार्यालय में की गई तलाशी के दौरान अधिकारियों को न केवल प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, बल्कि उन्हें उनके कर्तव्यों का पालन करने से भी रोका गया।

एजेंसी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल के अधिकारियों के इस हस्तक्षेप से जांच की निष्पक्षता और अधिकारियों के मनोबल पर गंभीर चोट पहुंची है।

CCTV फुटेज और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि 8 जनवरी को हुई तलाशी से संबंधित परिसरों और आसपास के इलाकों की रिकॉर्डिंग वाले सभी CCTV फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक स्टोरेज डिवाइस को अगली सुनवाई तक सुरक्षित रखा जाए।

यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि साक्ष्यों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ न हो सके। गौरतलब है कि ED ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि पश्चिम बंगाल पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के साथ मिलकर जांच में बाधा डाली और महत्वपूर्ण डिजिटल उपकरणों व साक्ष्यों को हटाने में मदद की।

DGP राजीव कुमार को निलंबित करने की मांग और FIR पर रोक

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए ED ने एक नए आवेदन के माध्यम से पश्चिम बंगाल के DGP राजीव कुमार को निलंबित करने की भी मांग की है। एजेंसी का आरोप है कि DGP और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रतीक जैन के आवास पर तलाशी में बाधा डाली।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने राहत देते हुए पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज की गई तीन FIR में आगे की किसी भी कार्यवाही पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। ED ने इस पूरे प्रकरण की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से कराने की भी गुहार लगाई है, जिस पर कोर्ट भविष्य में विचार कर सकता है।

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I-PAC और ममता बनर्जी का पक्ष: ‘चुनावी डेटा’ और क्षेत्राधिकार का सवाल

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इन आरोपों को “सरासर झूठ” करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि I-PAC कार्यालय में तृणमूल कांग्रेस का चुनाव से संबंधित अत्यंत गोपनीय डेटा मौजूद था और छापेमारी का समय केवल चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने के लिए तय किया गया था।

सिब्बल ने याचिका की स्वीकार्यता पर भी सवाल उठाए और कहा कि इन मुद्दों को कलकत्ता हाई कोर्ट में ले जाना चाहिए था। वहीं, राज्य सरकार और पुलिस नेतृत्व की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मुख्यमंत्री केवल अनधिकृत पहुंच की जानकारी मिलने पर वहां पहुंची थीं और तलाशी शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई थी।

कलकत्ता हाई कोर्ट के हंगामे पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान उस अप्रिय घटना का भी संज्ञान लिया जो 9 जनवरी को कलकत्ता हाई कोर्ट में घटी थी। बेंच ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हाई कोर्ट को ED की याचिका पर सुनवाई टालने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि कोर्ट रूम में भारी हंगामा हुआ था, जिससे न्यायिक कार्यवाही बाधित हुई।

यह प्रकरण दर्शाता है कि ED बनाम पश्चिम बंगाल का यह विवाद केवल जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अदालती प्रक्रियाओं और संवैधानिक मर्यादाओं को भी प्रभावित कर रहा है।

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अगली सुनवाई और भविष्य की दिशा

इस पूरे मामले में अब सभी की निगाहें 3 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सभी प्रतिवादियों को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।

कोर्ट इस बुनियादी सवाल की जांच करेगा कि क्या राज्य की कानून लागू करने वाली एजेंसियां किसी गंभीर अपराध में केंद्रीय एजेंसी की जांच में हस्तक्षेप करने का अधिकार रखती हैं।

फिलहाल, ED बनाम पश्चिम बंगाल के इस कानूनी युद्ध में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने केंद्रीय जांच एजेंसी को बड़ी राहत दी है और राज्य सरकार को अपनी भूमिका स्पष्ट करने के लिए कठघरे में खड़ा कर दिया है।

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