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“गांधी हत्या का षड्यंत्र”कपूर आयोग के खुलासे और विचारधारा की चुनौतियां

गांधी हत्या का षड्यंत्र

गांधी हत्या का षड्यंत्र कोई आकस्मिक घटना या किसी अकेले व्यक्ति की तात्कालिक सनक का परिणाम नहीं थी, जैसा कि अक्सर सतही तौर पर मान लिया जाता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो स्पष्ट होता है कि यह एक गहरी और सुनियोजित साजिश थी, जिसमें हिंदू महासभा के कट्टरपंथी तत्वों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी।

महात्मा गांधी की हत्या के मामले में अदालत में कुल नौ आरोपियों पर मुकदमा चला, जिनमें से आठ को दोषी पाया गया। 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी दी गई, जबकि विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे, दत्तात्रेय परचुरे, मदनलाल पाहवा, शंकर किस्तैया और दिगंबर बैज को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

इस पूरे मामले में दिगंबर बैज सरकारी गवाह बन गया था, जिसके कारण उसे कानूनी इम्युनिटी प्राप्त हुई। वहीं, विनायक दामोदर सावरकर को सबूतों के अभाव में बरी तो कर दिया गया, लेकिन जांच के दौरान कई गवाहों ने उनकी संलिप्तता की ओर स्पष्ट इशारा किया था।

कपूर आयोग के निष्कर्ष और सावरकर समूह की भूमिका

1965 से 1969 के बीच चले कपूर आयोग ने इस पूरे मामले की जड़ तक जाकर जांच की और अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा कि पुलिस की लापरवाही और सावरकर समूह की साजिश ने ही इस हत्या को संभव बनाया था। आयोग ने सावरकर के दो अत्यंत करीबी सहयोगियों—बॉडीगार्ड अप्पा रामचंद्र कासर और सेक्रेटरी गजानन विष्णु दामले के बयानों को महत्वपूर्ण माना।

इन गवाहों ने बताया था कि जनवरी 1948 के मध्य में गोडसे और आप्टे ने सावरकर से मुलाकात की थी। कपूर आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि “ये सभी तथ्य सावरकर और उनके समूह द्वारा हत्या की साजिश के अलावा किसी अन्य सिद्धांत को नकारते हैं।

” यह प्रमाणित करता है कि हत्या का तंत्र किसी एक व्यक्ति से कहीं बड़ा था; यह एक विचारधारा का जाल था जो गांधी को निरंतर हिंदू-विरोधी बताकर घृणा फैला रहा था।

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20 जनवरी का विफल बम धमाका और हत्या की तैयारी

30 जनवरी 1948 को बिरला हाउस में प्रार्थना सभा के दौरान गोडसे द्वारा चलाई गई तीन गोलियां इस सिलसिले का अंतिम प्रहार थीं। इससे पहले 20 जनवरी 1948 को मदनलाल पाहवा ने बम फेंका था, जो गांधी को मारने की पहली असफल कोशिश थी।

इस विफल प्रयास ने ही उजागर कर दिया था कि इस योजना में कई लोग शामिल हैं। गांधी हत्या का षड्यंत्र रचने वालों के पास पिस्तौल लाने, सटीक टाइमिंग तय करने, हमले के बाद भागने की व्यवस्था करने और गुप्त बैठकों का एक पूरा नेटवर्क मौजूद था।

मुख्य साजिशकर्ताओं में नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे, गोपाल गोडसे (नाथूराम का भाई), विष्णु करकरे, दत्तात्रेय परचुरे और मदनलाल पाहवा सक्रिय रूप से शामिल थे, जो एक संगठित घृणा को अंजाम देने के लिए एकजुट हुए थे।

घृणा की विचारधारा: गांधी को बदनाम करने का अभियान

इस हत्या के पीछे जो विचारधारा थी, उसकी जड़ें हिंदू राष्ट्रवाद के एक कट्टर संस्करण में गहरी धंसी हुई थीं। गांधीजी को “मुस्लिम-परस्त” या “पाकिस्तान का पिता” कहकर बदनाम किया गया और उनके खिलाफ ऐसा वातावरण तैयार किया गया जिसमें उनकी हत्या को “राष्ट्र-रक्षा” के रूप में पेश किया जा सके।

विभाजन के घावों को कुरेदते हुए मुसलमानों को “दूसरा” बताया गया और गांधी की अहिंसा को कमजोरी के रूप में प्रचारित किया गया। यही वह विचारधारा थी जिसने गोडसे जैसे लोगों के मन में जहर भरा।

आज भी वही भाषा अक्सर राजनीतिक मंचों और डिजिटल स्पेस में गूंजती सुनाई देती है, जो समावेशिता और सर्वधर्म समभाव के प्रतीक गांधी को एक संकीर्ण दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करती है।

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सरदार पटेल की चेतावनी और आरएसएस पर प्रतिबंध

इतिहास गवाह है कि गांधी जी की हत्या के तुरंत बाद देश के गृह मंत्री सरदार पटेल ने कड़े कदम उठाए थे। यद्यपि 1948 की ट्रायल कोर्ट और कपूर आयोग ने आरएसएस पर संगठनात्मक रूप से सीधा दोष साबित नहीं माना, लेकिन पटेल ने 1948 में आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था।

इसका कारण यह था कि हत्या के बाद कई जगहों पर मिठाइयां बांटी गईं और संघ द्वारा फैलाए गए “घृणा के जहर” ने ही ऐसा माहौल बनाया जिसमें यह त्रासदी संभव हुई। पटेल ने आरएसएस प्रमुख गोलवलकर को लिखे पत्र में स्पष्ट कहा था कि हिंदू महासभा और आरएसएस की गतिविधियां “सांप्रदायिक जहर” फैलाने वाली हैं।

नाथूराम गोडसे स्वयं पुणे में आरएसएस का सक्रिय सदस्य रहा था और उसके भाई गोपाल गोडसे ने भी स्वीकार किया था कि वे दोनों भाई संघ से जुड़े थे।

वर्तमान दौर में गोडसे का महिमामंडन: एक नई चुनौती

चिंताजनक तथ्य यह है कि गांधी हत्या का षड्यंत्र रचने वाली वह विचारधारा आज भी जीवित और सक्रिय नजर आती है। 2020 के बाद से गोडसे को “देशभक्त” या “शहीद” बताने की प्रवृत्ति तेज हुई है। हिंदू महासभा द्वारा गोडसे की मूर्तियां लगाने के प्रयास, उनका जन्मदिन मनाना और सोशल मीडिया पर उनका महिमामंडन करना इसी का हिस्सा है।

2024-2025 में भी राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज रही है, जहाँ विपक्षी दलों ने बार-बार कहा कि “गोडसे-पूजक भारत की परिभाषा नहीं बदल पाएंगे।” जहां गांधी ने अस्पृश्यता मिटाने और एकता की लड़ाई लड़ी, वहीं आज भी जातिवाद और सांप्रदायिकता नए रूपों में फल-फूल रही है, जो गांधी की समावेशी भारतीयता को चुनौती देती है।

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शिक्षा और समाज पर वैचारिक प्रहार

आज सवाल केवल उन व्यक्तियों का नहीं है जिन्हें सजा मिली, बल्कि सवाल उस विचार का है जिसने अनगिनत दिमागों को प्रदूषित किया। गोडसे को तो फांसी हो गई, लेकिन उसकी विचारधारा को सजा नहीं मिल सकी; इसके विपरीत, उसे अब सार्वजनिक रूप से सम्मान देने की मांग की जाती है।

कुछ संगठनों द्वारा गोडसे के अदालती बयान को स्कूली पाठ्यक्रमों में शामिल करने की जिद एक खतरनाक खेल है, जो अहिंसा के प्रतीक की हत्या को वैध ठहराने की कोशिश करता है। वर्तमान में स्थिति यह है कि जिस “सेक्युलरिज्म” के लिए गांधी ने अपने प्राणों की आहुति दी, उसे ही आज अपमानित किया जा रहा है और हिंसा को राष्ट्रवाद का चोला पहनाया जा रहा है।

क्या अधूरी रह गई है गांधी की हत्या?

हमें यह समझना होगा कि यदि हम गांधी की हत्या से सही सबक लेना चाहते हैं, तो हमें आरोपियों की गिनती से आगे बढ़ना होगा। गांधी हत्या का षड्यंत्र आज भी एक सतत परियोजना की तरह महसूस होता है, जो गांधी की विरासत को कमजोर कर एक विभाजित भारत की कल्पना करती है।

कपूर आयोग की रिपोर्ट आज भी हमें याद दिलाती है कि कैसे सरकारी लापरवाही और संगठित घृणा एक महापुरुष का अंत कर सकती है।

जब तक हम उस जहर को जड़ से नहीं उखाड़ फेंकते जो अहिंसा को कमजोरी बताता है, तब तक गांधी की हत्या का खतरा और उसकी छाया हमारे लोकतंत्र पर बनी रहेगी। भारत की आत्मा की रक्षा तभी संभव है जब शिक्षा, कानून और सार्वजनिक विमर्श के माध्यम से इस हिंसक विचारधारा का डटकर मुकाबला किया जाए।

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