ग्लोबल ट्रेड वॉर 2026: भारत पर अमेरिकी टैरिफ और ईयू की रणनीति
ग्लोबल ट्रेड वॉर 2026 की आहट के बीच अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने एक सनसनीखेज बयान देते हुए यूरोपीय संघ (EU) की कड़ी आलोचना की है। बेसेंट ने आरोप लगाया कि जब अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर दंडात्मक टैरिफ लगाए, तो यूरोपीय देशों ने अपने व्यापारिक हितों को प्राथमिकता देते हुए ऐसा करने से इनकार कर दिया।
बेसेंट के मुताबिक, यूरोपीय देशों ने भारत के साथ प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को बचाने के लिए नई दिल्ली पर कोई सख्ती नहीं दिखाई, जिसे उन्होंने “बेवकूफी भरा कदम” करार दिया है।
यूरोपीय देशों पर ‘रूसी युद्ध’ को फाइनेंस करने का गंभीर आरोप
स्कॉट बेसेंट ने पोलिटिको के साथ एक इंटरव्यू में कहा कि यूरोपीय देश एक तरफ रूस के खिलाफ खड़े होने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय रिफाइनरियों से वही तेल खरीद रहे हैं जो रूस से आता है।
उन्होंने इसे एक विडंबना बताते हुए कहा, “सबसे बड़ी विडंबना और बेवकूफी की बात यह है कि भारतीय रिफाइनरियों से रूसी तेल से बना रिफाइंड उत्पाद यूरोपीय खरीद रहे हैं। वे अपने ही खिलाफ युद्ध को फाइनेंस कर रहे हैं।” ग्लोबल ट्रेड वॉर 2026 के इस दौर में अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने सहयोगियों की इस दोहरी नीति से खुश नहीं है।
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25% रूसी तेल टैरिफ को ‘सफलता’ बताते हुए वापसी के संकेत
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी ने दावा किया कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ बेहद सफल रहे हैं। बेसेंट ने कहा कि इन टैरिफ के डर से भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद लगभग बंद कर दी है।
उन्होंने डेटा साझा करते हुए बताया कि यूक्रेन युद्ध से पहले भारत का रूसी तेल आयात महज 2-3% था, जो बाद में बढ़कर 17-19% तक पहुंच गया था। हालांकि, अब आयात कम होने के कारण अमेरिका इन अतिरिक्त 25% टैरिफ को हटाने का “रास्ता” तलाश रहा है, जो भारतीय निर्यातकों के लिए एक बड़ी राहत हो सकती है।
भारत-EU के बीच ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ पर दुनिया की नजर
एक तरफ अमेरिका दबाव की नीति अपना रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत और यूरोपीय संघ के बीच “सभी डील्स की मां” कहे जाने वाले फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर बातचीत अंतिम चरण में है। रॉयटर्स के मुताबिक, 27 जनवरी को इस समझौते की घोषणा हो सकती है।
इस डील के तहत यूरोपीय कारों और वाइन पर टैरिफ कम होंगे, जबकि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल और केमिकल सेक्टर को यूरोप का बड़ा बाजार मिलेगा। यूरोपीय कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन और एंटोनियो कोस्टा इस ऐतिहासिक समझौते को अंतिम रूप देने के लिए दिल्ली पहुंच रहे हैं।
टैरिफ का भारतीय निर्यात पर विनाशकारी असर: GTRI रिपोर्ट
ग्लोबल ट्रेड वॉर 2026 के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी चोट पहुंची है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 में जो निर्यात 8.83 बिलियन डॉलर था, वह अक्टूबर 2025 तक गिरकर 6.31 बिलियन डॉलर रह गया। यह 28.5% की भारी गिरावट है।
जेम्स एंड ज्वेलरी, लेदर, फिशरीज और टेक्सटाइल जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। भारतीय डायमंड और ज्वेलरी अमेरिकी बाजार में इतने महंगे हो गए कि उनकी प्रतिस्पर्धा खत्म होने लगी।
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क्या 25% अतिरिक्त ड्यूटी हटने से मिलेगी संजीवनी?
अगर वॉशिंगटन भारत पर से रूसी तेल से जुड़े 25% टैरिफ हटा लेता है, तो भारत पर लगने वाली कुल ड्यूटी घटकर आधी रह जाएगी। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में, विशेषकर वियतनाम, मैक्सिको और चीन के मुकाबले भारतीय सामानों की लैंडिंग कॉस्ट कम होगी।
इससे न केवल भारत का ट्रेड बैलेंस बेहतर होगा, बल्कि MSME सेक्टर को भी राहत मिलेगी। फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग सामान और ऑटो कंपोनेंट्स जैसे उद्योगों के लिए यह खबर किसी संजीवनी से कम नहीं है, जो लंबे समय से अमेरिकी बाजार में मंदी का सामना कर रहे हैं।
भारत की खरी-खरी: राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि
अमेरिकी दबाव के बावजूद, भारत ने अपनी ऊर्जा नीति पर कड़ा रुख बरकरार रखा है। भारत ने अमेरिकी कार्रवाइयों को “गलत और बेमतलब” बताते हुए स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा जरूरतें और फैसले केवल राष्ट्रीय हितों से संचालित होते हैं।
हालांकि, हालिया आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि रूसी कच्चे तेल की खरीद में कुछ गिरावट आई है, जिसे स्कॉट बेसेंट अपनी नीति की जीत बता रहे हैं। इसी बीच, कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल और अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के बीच लगातार सकारात्मक बातचीत जारी है।
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रणनीतिक संबंधों और व्यापारिक भविष्य का नया अध्याय
ग्लोबल ट्रेड वॉर 2026 के तनावपूर्ण माहौल में भी भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए हुए है। जहां एक ओर वह अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर चर्चा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यूरोप के साथ अपनी नई रक्षा और व्यापारिक साझेदारी को अंतिम रूप दे रहा है।
26 जनवरी को रिपब्लिक डे पर यूरोपीय नेताओं की मौजूदगी और 27 जनवरी का समिट यह तय करेगा कि भारत आने वाले समय में वैश्विक व्यापार की बिसात पर खुद को किस तरह स्थापित करता है।
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