“हरदीप पुरी एपस्टीन ईमेल्स”14 मुलाकातों का सच या कोई गहरा राज?
हरदीप पुरी एपस्टीन ईमेल्स जनवरी 2026 में अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा एपस्टीन फाइल्स की नवीनतम ट्रैंच जारी की गई है, जिसमें तीन मिलियन (30 लाख) से अधिक पेज शामिल हैं। इन दस्तावेजों ने वैश्विक स्तर पर एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। ये दस्तावेज मुख्य रूप से ईमेल, मीटिंग लॉग्स और अन्य संचारों पर आधारित हैं, जो जेफरी एपस्टीन के उस व्यापक नेटवर्क को उजागर करते हैं जिसने दुनिया के रसूखदार लोगों को अपने घेरे में ले रखा था।
भारत में इसकी सबसे बड़ी और तीखी हलचल केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के नाम से जुड़ी है। कांग्रेस ने सनसनीखेज दावा किया है कि 2014 से 2017 के बीच कुल 62 ईमेल एक्सचेंज हुए, जिनमें से हरदीप पुरी एपस्टीन ईमेल्स की संख्या 32 (पुरी की ओर से) और 30 (एपस्टीन की ओर से) बताई गई है। इसके साथ ही कुल 14 मीटिंग्स का भी दावा किया गया है, जो राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
मोदी सरकार के गठन के साथ ही शुरू हुआ मुलाकातों का सिलसिला
कांग्रेस द्वारा उठाए गए सवालों के केंद्र में इन मुलाकातों की टाइमिंग है। दस्तावेजों के हवाले से यह दावा किया गया है कि ये मुलाकातें मोदी सरकार के गठन के ठीक बाद शुरू हो गई थीं। रिकॉर्ड्स के अनुसार, जून 2014 में ही कई मीटिंग्स दर्ज हैं, जिनमें 5, 6, 8 और 9 जून जैसी तारीखें शामिल हैं।
हालांकि, इन दस्तावेजों में अब तक किसी स्पष्ट आपराधिक गतिविधि का कोई प्रमाण नहीं मिला है। अधिकांश संचार पूरी तरह प्रोफेशनल प्रतीत होते हैं, जिनमें भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था, ‘मेक इन इंडिया’ पहल और सिलिकॉन वैली के बड़े निवेशकों से कनेक्शन जोड़ने जैसे विषयों पर चर्चा की गई है।
इसके बावजूद, मुलाकातों की गहनता और विशेष रूप से एपस्टीन के न्यूयॉर्क टाउनहाउस में हुई बैठकें नैतिक सवाल खड़े करती हैं, क्योंकि एपस्टीन को 2008 में ही बाल यौन शोषण के गंभीर अपराधों के लिए दोषी ठहराया जा चुका था।
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केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी का पलटवार: “स्मियर कैंपेन” और राहुल गांधी पर हमला
इन आरोपों के सामने आने के बाद केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बार-बार इनका खंडन किया है। पुरी का कहना है कि उन्होंने एपस्टीन से केवल “तीन या चार बार” मुलाकात की थी और वह भी इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट (IPI) के काम के सिलसिले में, जहां वे इंडिपेंडेंट कमीशन ऑन मल्टीलेटरलिज्म से जुड़े थे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हरदीप पुरी एपस्टीन ईमेल्स मुख्य रूप से लिंक्डइन के को-फाउंडर रीड हॉफमैन से संपर्क साधने और भारत में डिजिटल अवसरों पर चर्चा करने के लिए थे।
एक ईमेल में पुरी ने एपस्टीन की असिस्टेंट को भारत में प्राथमिकता के आधार पर वीजा दिलाने में मदद की थी, जिसे उन्होंने एक सामान्य व्यावसायिक संदर्भ बताया। पुरी ने इस पूरे मामले को एक “स्मियर कैंपेन” (छवि बिगाड़ने का अभियान) करार दिया है और राहुल गांधी पर राजनीतिक द्वेष के तहत हमले करने का आरोप लगाया है।
कांग्रेस के तीखे सवाल: 14 मीटिंग्स और 2017 तक के संपर्कों का हिसाब
विपक्ष इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने विशिष्ट तारीखों का हवाला देते हुए सरकार को घेरा है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर पुरी केवल तीन-चार मुलाकातों की बात कर रहे हैं, तो दस्तावेजों में 2014 में ही 9 मीटिंग्स और कुल 14 मुलाकातों का जिक्र क्यों है?
कांग्रेस ने मांग की है कि पुरी इन सभी मीटिंग्स की पूरी डिटेल्स सार्वजनिक करें। दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि अंतिम ईमेल जून 2017 में भेजा गया था, जिसके बाद संपर्क पूरी तरह बंद हो गया।
यद्यपि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि पुरी एपस्टीन की किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल थे, लेकिन हरदीप पुरी एपस्टीन ईमेल्स और संपर्कों की यह मात्रा मोदी सरकार के शुरुआती दिनों की संवेदनशीलता को देखते हुए विपक्ष के लिए एक बड़ा हथियार बन गई है।
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बिल गेट्स का इंडिया एआई समिट और अचानक बढ़ा विवाद
इस राजनीतिक विवाद के बीच बिल गेट्स का इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 (16-20 फरवरी, दिल्ली) में शामिल होना एक नई उलझन बन गया। गेट्स को इस समिट में कीनोट स्पीकर बनाया गया था, लेकिन एपस्टीन फाइल्स में उनके नाम का उल्लेख होने के बाद समिट की आधिकारिक वेबसाइट से अचानक उनका नाम हटा दिया गया।
‘की अटेंडीज’ लिस्ट में “नो स्पीकर्स फाउंड” दिखने लगा, जिससे कयासों का बाजार गर्म हो गया। रिपोर्ट्स में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया कि गेट्स शायद शामिल नहीं होंगे क्योंकि एपस्टीन कनेक्शन से सरकार को “असुविधा” हो सकती है।
हालांकि, गेट्स फाउंडेशन ने तुरंत इन खबरों का खंडन किया और 19 फरवरी को सुबह 11:50 बजे बयान जारी कर स्पष्ट किया कि बिल गेट्स समिट में हिस्सा लेंगे और अपना कीनोट एड्रेस डिलीवर करेंगे।
यौन रोगों के दावे और बिल गेट्स का एपस्टीन पर पश्चाताप
बिल गेट्स ने खुद जेफरी एपस्टीन से मिलने को अपनी “बड़ी गलती” माना है और कहा है कि वह उस मुलाकात के “हर पल को रिग्रेट” (पछतावा) करते हैं। ताजा फाइल्स में गेट्स का नाम ईमेल्स और मीटिंग नोट्स में दर्ज है। इनमें 2013 का एक नोट भी शामिल है जिसमें एपस्टीन ने गेट्स के बारे में एसटीडी (यौन रोग) से जुड़ा एक विवादित दावा किया था।
गेट्स फाउंडेशन ने इसे “पूरी तरह बकवास” बताकर खारिज कर दिया है। हालांकि किसी भी अपराध का कोई प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन सोशल मीडिया पर यह असत्यापित और सनसनीखेज अफवाहें फैलीं कि गेट्स अपनी पत्नी को “रूसी लड़कियों” से लगे रोगों के लिए गुप्त दवाइयां देते थे।
समिट में गेट्स की मौजूदगी ने अब एक नैतिक दुविधा पैदा कर दी है, जबकि एआई जैसे क्षेत्र में सैम ऑल्टमैन और सुंदर पिचाई जैसे वैश्विक दिग्गजों का साथ भारत के लिए जरूरी है।
सरकार की चुप्पी और विपक्ष का ‘कमजोर नैतिकता’ वाला वार
इस पूरे प्रकरण पर मोदी सरकार की चुप्पी या “रिव्यू” की खबरों ने असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ फाउंडेशन का बयान है और दूसरी तरफ वेबसाइट से नाम हटना, जो प्रशासनिक दुविधा को उजागर करता है। आंध्र प्रदेश में गेट्स की यात्रा पर भी कांग्रेस ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि “ऐसे व्यक्ति से मिलना नहीं चाहिए”।
कांग्रेस इस मुद्दे को मोदी सरकार की “कमजोर नैतिकता” और “कवर-अप” (मामले को दबाने) के प्रयास के रूप में पेश कर रही है। वहीं, भाजपा का कहना है कि यह केवल आधारहीन अनुमानों पर आधारित एक राजनीतिक हमला है। लेकिन हरदीप पुरी एपस्टीन ईमेल्स की संख्या और मुलाकातों का बेमेल डेटा पुरी के शुरुआती बयानों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान जरूर लगाता है।
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पारदर्शिता की मांग और एपस्टीन नेटवर्क की काली छाया
सत्ता के गलियारों में पावरफुल लोगों के संपर्क अक्सर जटिल होते हैं, लेकिन संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले लोगों से जुड़ाव हमेशा जोखिम भरा होता है। भारत जैसे लोकतंत्र में, जहां जनता अपने नेताओं से उच्च नैतिकता की उम्मीद करती है, वहां चुप्पी या अस्पष्टता केवल साजिश की थ्योरीज (Conspiracy Theories) को जन्म देती है।
यह सच है कि अब तक फाइल्स में कोई “बड़ा राज” या ठोस अपराध प्रमाण सामने नहीं आया है, केवल असुविधाजनक संपर्क ही दिखे हैं। लेकिन सरकार को इन संपर्कों पर स्पष्ट और पारदर्शी स्टैंड लेना चाहिए।
पुरी को अपने सभी ईमेल और मीटिंग नोट्स सार्वजनिक करने चाहिए ताकि अफवाहों का अंत हो सके। एपस्टीन की काली छाया ने भले ही कोई नया कानूनी उल्लंघन साबित न किया हो, लेकिन इसने राजनीतिक जवाबदेही की एक नई बहस छेड़ दी है।
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