हिमंत सरमा का पलटवार, 500 करोड़ का हर्जाना मांग कोर्ट में कांग्रेस को घेरा
500 करोड़ का हर्जाना मांगने वाले इस हाई-प्रोफाइल मानहानि मामले में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को बड़ी कानूनी राहत मिली है। गुवाहाटी की एक कामरूप (मेट्रो) कोर्ट ने कांग्रेस नेताओं गौरव गोगोई, भूपेश बघेल और जितेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री के खिलाफ किसी भी तरह के “बदनाम करने वाले बयान” देने से तत्काल प्रभाव से रोक दिया है।
सिविल जज (सीनियर डिवीजन) नयन ज्योति सरमा ने यह आदेश मुख्यमंत्री द्वारा दायर उस मुकदमे पर दिया, जिसमें उन्होंने कांग्रेस नेताओं द्वारा उनकी पत्नी और परिवार के सदस्यों के नाम पर बड़ी मात्रा में जमीन खरीदने के आरोपों को चुनौती दी थी।
जज ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि कोर्ट का मानना है कि अगर यह अंतरिम रोक नहीं लगाई गई, तो इससे न्याय का मकसद खत्म हो जाएगा और कई कानूनी कार्यवाहियां शुरू होने की संभावना बढ़ जाएगी। कोर्ट ने कांग्रेस नेताओं को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है कि इस रोक को पूरी तरह लागू क्यों न रखा जाए।
कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस और जमीन हड़पने के विस्फोटक आरोप
विवाद की शुरुआत 4 फरवरी को हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से हुई, जिसमें कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। पार्टी की स्टेट यूनिट के हेड गौरव गोगोई ने जितेंद्र सिंह और भूपेश बघेल के साथ मिलकर आरोप लगाया था कि हिमंत बिस्वा सरमा और उनके परिवार ने नियमों का उल्लंघन करके राज्य के विभिन्न हिस्सों में लगभग 12,000 बीघा जमीन हड़पी है।
गौरव गोगोई ने दावा किया था कि पार्टी मुख्यमंत्री की संपत्ति के स्रोतों की जांच कर रही है और उनके पास कथित रूप से बेनामी संपत्तियां हैं। कांग्रेस के इन तीखे हमलों के बाद, मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि “हिट-एंड-रन पॉलिटिक्स” का जमाना अब खत्म हो गया है और उन्होंने इन नेताओं को कोर्ट में अपने आरोप साबित करने की चुनौती दी थी।
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500 करोड़ का मानहानि केस और कानूनी कार्रवाई का विवरण
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेताओं के आरोपों को “झूठे, गलत इरादे वाले और बदनाम करने वाले” करार देते हुए 10 फरवरी को मानहानि का केस फाइल किया। इस केस के माध्यम से मुख्यमंत्री ने कांग्रेस नेताओं से 500 करोड़ का हर्जाना मांगा है। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि कांग्रेस ने बिना किसी सबूत के उनकी छवि खराब करने की कोशिश की है।
कोर्ट ने मुख्यमंत्री की दलीलों और उनके द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों की जांच करने के बाद गौरव गोगोई, बघेल और सिंह के साथ-साथ एक जाने-माने असमिया अखबार को भी इस मामले में पक्षकार बनाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक ये नेता 9 मार्च को कोर्ट में पेश नहीं होते, तब तक वे मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई भी अपमानजनक सामग्री प्रकाशित, प्रसारित या सर्कुलेट नहीं करेंगे।
मुख्यमंत्री की संपत्ति का ब्योरा और एडवोकेट जनरल की दलीलें
असम के एडवोकेट जनरल देवजीत लोन सैकिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुख्यमंत्री का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने तर्क दिया कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा 30 से अधिक वर्षों से नियमित इनकम टैक्स असेसी रहे हैं। सैकिया ने स्पष्ट किया कि 2001 से अब तक मुख्यमंत्री और उनके परिवार की सभी संपत्तियों का विवरण उनके द्वारा लड़े गए सभी चुनावों के हलफनामों (एफिडेविट) में मौजूद है।
राज्य सरकार के नियमों के अनुसार, मुख्यमंत्री और सभी मंत्रियों को प्रतिवर्ष अपनी संपत्तियों की घोषणा करनी होती है और सरमा इसे नियमित रूप से करते रहे हैं। एजी ने कहा कि कांग्रेस के आरोपों के विपरीत, उनकी सारी दौलत इनकम टैक्स फाइलिंग, सोसाइटी रजिस्टर और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सब कुछ पब्लिक डोमेन में है, तो कांग्रेस 12,000 बीघा के आंकड़े पर कैसे पहुंची।
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राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश और ‘HBS टैक्स’ का विवाद
एडवोकेट जनरल ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस आगामी चुनावों को देखते हुए मुख्यमंत्री को बदनाम करके राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि राज्य में ‘HBS टैक्स’ जैसी कोई चीज नहीं है, जैसा कि कांग्रेस आरोप लगा रही है। सैकिया के अनुसार, हिमंत बिस्वा सरमा को 2021 में उनकी पार्टी के विधायकों ने निर्विरोध नेता चुना था, इसलिए कांग्रेस के अन्य आरोप भी मनगढ़ंत और गुमराह करने वाले हैं।
मुख्यमंत्री ने अपनी याचिका में साफ किया है कि अगर विपक्षी नेता अपने दावों को डॉक्यूमेंट्री सबूतों के साथ साबित नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें 500 करोड़ का हर्जाना भरना होगा। कोर्ट ने माना है कि बिना किसी ठोस आधार के ऐसे बयान देना मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है।
अखबारों की रिपोर्टिंग और नैचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का उल्लंघन
कोर्ट की कार्यवाही के दौरान यह बात भी सामने आई कि कुछ स्थानीय अखबारों ने कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बिना किसी पुष्टि के रिपोर्ट प्रकाशित कीं। मुख्यमंत्री के वकील ने कोर्ट को बताया कि इन अखबारों ने नैचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का पालन नहीं किया और एकपक्षीय रिपोर्ट छापी।
कोर्ट ने अपने आदेश में एक विशिष्ट असमिया डेली के मालिक जयंत बरुआ, उसके पब्लिशर और स्टाफ रिपोर्टर को भी नोटिस जारी किया है। इस अखबार को भी 5 फरवरी को छपी खबर के आधार पर कोई और अपमानजनक रिपोर्ट प्रकाशित करने से तब तक के लिए रोक दिया गया है जब तक कि वे 9 मार्च को कोर्ट में अपनी सफाई पेश नहीं कर देते।
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AI वीडियो विवाद और चुनाव से पहले बढ़ती राजनीतिक कड़वाहट
यह कानूनी लड़ाई उस समय और तेज हो गई जब कांग्रेस की असम यूनिट ने भाजपा के खिलाफ एक पुलिस शिकायत दर्ज कराई। विवाद भाजपा की असम यूनिट द्वारा पोस्ट किए गए एक एआई-जनरेटेड वीडियो को लेकर था, जिसमें मुख्यमंत्री को राइफल के साथ दिखाया गया था और मुसलमानों को निशाना बनाने वाले नारे जैसे “विदेशी फ्री असम” और “पाकिस्तान क्यों नहीं गए?” शामिल थे।
हालांकि भाजपा ने इसे अनधिकृत बताते हुए डिलीट कर दिया और अपने सोशल मीडिया सेल के एक कन्वीनर को हटा दिया, लेकिन कांग्रेस ने इसे सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाला बताया। इसी बीच मुख्यमंत्री ने कांग्रेस नेताओं पर 500 करोड़ का हर्जाना ठोक कर यह साफ कर दिया कि वे किसी भी बेबुनियाद आरोप को बर्दाश्त नहीं करेंगे। असम में मार्च और मई के बीच चुनाव होने की उम्मीद है, जिससे यह कानूनी जंग और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
अगली सुनवाई और 9 मार्च की तारीख पर टिकी निगाहें
गुवाहाटी कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 9 मार्च की तारीख तय की है। कोर्ट ने गौरव गोगोई समेत सभी सात प्रतिवादियों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है। एडवोकेट जनरल देवजीत सैकिया ने बताया कि मुख्यमंत्री ने अपने आलोचकों को सबूत देने की खुली चुनौती दी है। अब कांग्रेस नेताओं को कोर्ट में यह साबित करना होगा कि उनके पास 12,000 बीघा जमीन के मालिकाना हक से जुड़े कौन से पुख्ता दस्तावेज हैं।
यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो कोर्ट की यह अंतरिम रोक स्थायी हो सकती है और मानहानि के मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ेगी। राज्य के लोग और राजनीतिक विश्लेषक अब 9 मार्च का इंतजार कर रहे हैं, जो असम की राजनीति की भविष्य की दिशा तय करेगा।
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