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असम चुनाव 2026: सरमा का सांप्रदायिक कार्ड और दिल्ली की चुप्पी का सच

सरमा का सांप्रदायिक कार्ड

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की जनवरी 2026 में की गई टिप्पणियां, खासकर कांग्रेस और राहुल गांधी को ‘देशविरोधी’ करार देते हुए उन्हें ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ के एजेंडे का समर्थक बताना, कोई आकस्मिक चुनावी भाषण नहीं हैं। यह दरअसल सरमा का सांप्रदायिक कार्ड है जो एक सुनियोजित और जहरीली रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा देना है।

24 जनवरी 2026 को सरमा ने सार्वजनिक रूप से यह कहकर सनसनी फैला दी कि उनका काम ‘मियां’ (बंगाली-भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल होने वाला अपमानजनक शब्द) लोगों को ‘सताना’ (make them suffer) है।

उन्होंने दावा किया कि बीजेपी कार्यकर्ताओं ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान 5 लाख से अधिक शिकायतें दर्ज की हैं, जिसके आधार पर 4-5 लाख ‘मियां वोट’ हटाए जाएंगे। यह बयान न सिर्फ एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की गरिमा को तार-तार करता है, बल्कि असम की बहुलतावादी संस्कृति पर भी सीधा प्रहार है।

मिया वोट हटाने का दावा और संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन

असम में ‘असमिया अस्मिता’ के नाम पर मुसलमानों को ‘घुसपैठिए’ बताकर उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। सरमा की हालिया बयानबाजी इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। इंडिया हेट लैब की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, सरमा का सांप्रदायिक कार्ड उनके भाषणों में स्पष्ट दिखता है; उन्होंने 2025 में कम से कम 16 एंटी-मुस्लिम हेट स्पीच दिए।

यह आंकड़ा 2023 के 16 और 2024 के 36 हेट स्पीच से कम नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि असम में हुए कुल 32 हेट स्पीच इवेंट्स में सरमा के बयान सबसे प्रमुख थे। SIR के जरिए लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाने की धमकी देना लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है।

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एनआरसी और सीएए के बाद बढ़ा तनाव: बेदखली और राज्य प्रायोजित उत्पीड़न

एनआरसी, सीएए और अब SIR के क्रियान्वयन के बाद असम में सांप्रदायिक तनाव अपने चरम पर पहुंच चुका है। इंडिया हेट लैब की जुलाई 2025 की रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया कि जून 2025 से असम में बंगाली-मूल के मुसलमानों के खिलाफ हेट स्पीच, उत्पीड़न, हिंसा और राज्य-प्रायोजित बेदखली में अप्रत्याशित तेजी आई।

मुख्यमंत्री की रैलियों और सोशल मीडिया कैंपेन ने कम से कम 18 हिंसक घटनाओं को ईंधन दिया। 14 जिलों में हुई रैलियों में ‘घुसपैठिए’ और ‘जिहाद’ जैसे भड़काऊ शब्दों का जमकर इस्तेमाल हुआ। जुलाई 2025 में दारांग में सरमा ने बंगाली-मुस्लिमों को ‘संदिग्ध बांग्लादेशी’ करार दिया और सांप्रदायिक सद्भावना के नारों को ‘भोला’ बताकर खारिज कर दिया।

विस्फोटक स्थिति और जाति संरक्षण के नाम पर हथियारबंद होने की अपील

मुख्यमंत्री सरमा ने बेदखल की गई जमीन को ‘बेहतर इस्तेमाल’ में लाने का दावा करते हुए यहाँ तक कह दिया कि असम की स्थिति ‘विस्फोटक’ होनी चाहिए और असमिया लोग ‘हथियारबंद’ रहें। 2025 में हजारों मुस्लिम परिवारों को उनके घरों से बेदखल किया गया, जिसे सरकार ने ‘जाति संरक्षण’ का नाम दिया।

यह नीति असमिया अस्मिता के नाम पर मुसलमानों को ‘अवांछित’ ठहराने की एक गहरी साजिश प्रतीत होती है। 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले सरमा का सांप्रदायिक कार्ड बीजेपी की उस वोट बैंक रणनीति का हिस्सा है, जहां ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कुचला जा रहा है।

प्रधानमंत्री की चुप्पी: क्या यह अपराध के प्रति मूक सहमति है?

इस पूरे विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार चुप्पी सबसे खतरनाक और बहुत कुछ कहने वाली है। यह न सिर्फ सरमा को विवादित बयान देने की खुली छूट दे रही है, बल्कि यह एक ऐसी रणनीतिक खामोशी है जो असम जैसे सीमावर्ती राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए बीजेपी की पकड़ मजबूत करना चाहती है।

जनवरी 2026 में जब सरमा ने ‘मियां सताओ’ और ‘4-5 लाख वोट हटाओ’ जैसे दावे किए, तब भी दिल्ली से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। विपक्षी नेताओं जैसे संजय झा, महुआ मोइत्रा और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने इसे ‘मोदी की चुप्पी अपराध की सहमति’ बताया है। उनका तर्क है कि जब प्रधानमंत्री छोटे मुद्दों पर बोलते हैं, तो इतने बड़े संवैधानिक संकट पर उनकी खामोशी सवाल खड़े करती है।

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इंडिया हेट लैब का डेटा: 98% मामले अल्पसंख्यकों के खिलाफ

एनसीआरबी और इंडिया हेट लैब के आंकड़े डराने वाले हैं। 2025 में भारत में कुल 1,318 हेट स्पीच इवेंट्स दर्ज हुए, जिनमें से 98% केवल मुसलमानों के खिलाफ थे। असम के 32 इवेंट्स में ‘लैंड जिहाद’, ‘लव जिहाद’ और ‘घुसपैठिए’ जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ।

रिपोर्ट के अनुसार, 88% हेट स्पीच बीजेपी-शासित राज्यों में हुए, जहाँ सरमा जैसे नेता मुख्य भूमिका में रहे। सरमा ने तो यहां तक कह दिया कि “मियां रिक्शा चलाने वालों से किराया कम दो ताकि वे पीड़ित हों और असम छोड़ दें”।

यह डेटा साबित करता है कि सरमा का सांप्रदायिक कार्ड महज चुनावी जुमला नहीं, बल्कि हिंसा के वे बीज हैं जो असम की सामाजिक सद्भावना को नष्ट कर रहे हैं।

विपक्ष का प्रहार: राहुल गांधी और विपक्षी खेमे की एकजुटता

विपक्ष ने इसे ‘नफरत की राजनीति’ का चरम बताया है। राहुल गांधी ने सरमा के बयानों को ‘संवैधानिक हमला’ करार दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर संजय झा ने लिखा कि ‘मोदी की चुप्पी डॉग-व्हिसलिंग है’, वहीं महुआ मोइत्रा ने तीखा सवाल किया कि प्रधानमंत्री इन शब्दों पर चुप क्यों हैं?

कांग्रेस का आरोप है कि सरमा का रवैया अमित शाह के ‘टर्माइट’ (दीमक) वाले बयानों का ही विस्तार है। यह द्वंद्व भारतीय राजनीति की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, जहाँ सत्ता बचाने के लिए संवैधानिक मूल्यों की बलि दी जा रही है।

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लोकतांत्रिक भविष्य और विविधता पर मंडराता खतरा

बीजेपी की आंतरिक गतिशीलता अब बेनकाब हो रही है, जहाँ सरमा जैसे नेता सांप्रदायिक कार्ड खेलकर शीर्ष नेतृत्व की ‘मजबूत’ छवि को सहारा देते हैं। 2025 में हजारों लोगों को ‘फॉरेनर’ घोषित कर डिटेंशन सेंटर भेजा जाना और हिंदुओं को हथियार लाइसेंस देने की योजना बनाना इसी कड़ी का हिस्सा है।

अंततः, सरमा की ये टिप्पणियां और केंद्र की चुप्पी भारत के लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा हैं। यदि न्यायपालिका और चुनाव आयोग ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह नफरत की राजनीति पूरे देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को खोखला कर देगी। गांधी के अहिंसक भारत की आत्मा को बचाने के लिए इस जहरीले ध्रुवीकरण को रोकना अब अनिवार्य हो गया है।

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