कारगिल वीर त्सेवांग थारचिन की हत्या, लद्दाख को मोदी-शाह पर धोखा;
मोदी-शाह पर धोखा का आरोप लगाते हुए लद्दाख में जबरदस्त आक्रोश फैल गया है, जिसकी वजह है कारगिल के वीर जवान त्सेवांग थारचिन की निर्मम हत्या। लद्दाख की ठंडी वादियों में, जहां कभी कारगिल की गूंजदार लड़ाइयों ने भारत की एकता के प्रतीक को गढ़ा था, आज एक पूर्व सैनिक का खून बहा है।
त्सेवांग थारचिन, 46 वर्षीय वह योद्धा जो सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर दुश्मन से लड़े और टोलोलिंग की जंग में दुश्मन को धूल चटाई, उसी योद्धा की गोली मारकर हत्या कर दी गई, और वह भी अपने ही सुरक्षा बलों द्वारा।
लद्दाख के विरोध प्रदर्शनों पर ‘सुनियोजित हत्या’ का आरोप
यह दर्दनाक घटना 24 सितंबर 2025 को लेह में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई। लद्दाख के लोग अपनी दो प्रमुख और लंबे समय से चली आ रही माँगे – छठी अनुसूची और राज्यत्व – के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान, केंद्र शासित पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें थारचिन के साथ जिगमेट डोरजे (25), स्टैंजिन नमग्याल (23) और रिनचेन दादुल (20) भी शहीद हो गए।
इस घटना को केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित हत्या का हिस्सा बताया जा रहा है, जहां सरकार ने अपने ही वीरों को ‘आतंकवादी’ की नजर से देखा। शहीद स्टैंजिन नमग्याल के पिता, जो खुद एक कारगिल वीर हैं, का दर्द पूरे राष्ट्र को तोड़ देता है। उन्होंने कहा: “पाकिस्तान वाले हमारे जांबाज बेटे को मार न सके, लेकिन अपनी ही पुलिस ने मार डाला।” यह सवाल न केवल एक पिता का है, बल्कि पूरे राष्ट्र का है, जो पूछता है कि क्या सच में यही है ‘नई भारत’ की परिभाषा?
चुनावी वादे से मुकरना और संवैधानिक सुरक्षा का अभाव
गुजरात की सत्ता से दिल्ली की गद्दी तक पहुंची मोदी-शाह की जोड़ी पर लद्दाख को धोखा देने का सीधा आरोप है। 2019 के चुनावी वादे में बीजेपी ने ज़ोर-शोर से नारा लगाया था कि वे लद्दाख को राज्य बनाएंगे, छठी अनुसूची देंगे और स्थानीय संस्कृति एवं जमीन की रक्षा करेंगे। लेकिन, सत्ता में आते ही जम्मू-कश्मीर को तोड़कर लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया, और वह भी बिना किसी संवैधानिक सुरक्षा के।
परिणामस्वरूप, आज लद्दाख का पर्यावरण बर्बाद हो रहा है, भूमि हड़पने की होड़ मची है, और बाहरी कंपनियां यहाँ की संपदा लूट रही हैं। इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले पर्यावरण योद्धा सोनम वांगचुक को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत जेल में डाल दिया गया, और उनकी संस्था का एफसीआरए लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सही कहा कि यह ‘गहन आक्रोश’ का विषय है। लेकिन मोदी सरकार का जवाब कर्फ्यू, गिरफ्तारियां और गोली रहा। यह सिर्फ वादाखिलाफी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश मानी जा रही है, जहां ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का बहाना लेकर स्थानीय और देशभक्त आवाजों को कुचला जा रहा है।
लद्दाख के बौद्ध भिक्षु और युवा कैसे चुप रहेंगे? कई लोग इसे विद्रोह की चिंगारी भड़काने की दिल्ली की कवायद बता रहे हैं। यहाँ यह स्पष्ट होता है कि स्थानीय लोगों को मोदी-शाह पर धोखा महसूस हो रहा है।
सरकार का दमन और पुलिस अत्याचार का प्रमाण
सरकार का दावा है कि विरोध ‘हिंसक’ हो गया था, जिसके चलते बीजेपी कार्यालय और पुलिस वाहनों पर आग लगाई गई। लेकिन सच्चाई कुछ और ही बयां करती है। लद्दाख बौद्ध एसोसिएशन के अध्यक्ष चेरिंग डोरजे लक्रुक ने स्पष्ट रूप से कहा है: “गोलियां पीठ में लगीं, यह अंधाधुंध फायरिंग थी।”
इस घटना में 70 से ज्यादा लोग घायल हुए, दर्जनों गिरफ्तार हुए, और एक पूर्व सैनिक की हत्या हुई। मोदी-शाह द्वारा इसे ‘हिंसा’ का नाम देकर लद्दाखियों के दमन को जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है।
लद्दाख के उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता की यह चेतावनी, “हिंसा करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा,” एक तानाशाही की गूंज है। जबकि असली हिंसा तो केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों में है: लद्दाख को जेकेई से अलग कर ‘विकास’ के नाम पर कार्पोरेट को बेचना, जहां स्थानीय नौकरियां, जमीन और पहचान सब लुट रही है।
थारचिन के परिवार का बयान पुलिस अत्याचार को प्रमाणित करता है। परिवार का कहना है कि उनके शरीर पर लाठियों के निशान थे, और गोली पीठ से निकली। यह ‘आत्मरक्षा’ नहीं, बल्कि बर्बरता है। सरकार को न्यायिक जांच करनी चाहिए, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी-शाह को सच्चाई से डर लगता है।
स्थानीय लोग मानते हैं कि बार-बार वादाखिलाफी कर यह सरकार दिखाती है कि यह मोदी-शाह पर धोखा देने वाली सरकार है।
न्याय और विद्रोह की चिंगारी
अब समय आ गया है कि प्रशासन जागे। आप सैनिकों के लिए ‘जय हिंद‘ के नारे लगाते हैं, लेकिन जब वे अपनी जमीन के लिए बोलते हैं, तो गोलियां चलाते हैं। स्टैंजिन नमग्याल का सवाल सीधा है: “देशभक्तों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?”
यह सरकार लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक आपराधिक गिरोह की तरह व्यवहार कर रही है, जिसमें अमित शाह के ‘अनैतिक आदेश’ और मोदी के ‘राष्ट्रीय एकता’ के झूठे प्रचार का मिश्रण है। पूरे देश के नौकरशाहों, पुलिस और सुरक्षा बलों को याद रखना चाहिए: आप संविधान के सेवक हैं, न कि किसी गुजराती चायवाले या उसके किसी गुर्गे के।
समय आ गया है कि इनके तानाशाही फरमानों की अवज्ञा की जाए, जैसे महात्मा गांधी ने ब्रिटिशों के खिलाफ किया था। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के दुरुपयोग को तुरंत रोका जाए और सोनम वांगचुक को रिहा किया जाए। अन्यथा, यह मोदी-शाह द्वारा जानबूझकर लगाई जा रही आग पूरे भारत को अपने आगोश में ले लेगी।
लद्दाख का यह रक्तपात एक गंभीर चेतावनी है। यदि मोदी-शाह ने तुरंत छठी अनुसूची लागू नहीं की और राज्यत्व नहीं दिया, तो यह माना जाएगा कि देश को टुकड़ों में बांटने की यह उनकी साजिश है। थारचिन जैसे शहीदों की कुर्बानी व्यर्थ न जाने दें। युवा, पूर्व सैनिक, बौद्ध भिक्षु, सबको एकजुट होकर इन तानाशाहों से लड़ना होगा।
राहुल गांधी ने सही कहा: “लद्दाखियों से बात करो, हिंसा की राजनीति बंद करो।” लेकिन मोदी-शाह की बीजेपी को तो बातचीत से चिढ़ है; उन्हें सिर्फ दमन और हिंसा पसंद है। आज जरूरत है एक नई क्रांति की, जहां संविधान की रक्षा हो, न कि सत्ता की। वरना, कारगिल के वीरों का बलिदान भी व्यर्थ हो जाएगा, और अखंड एवं प्रभुसम्पन्न भारत का सपना चूर-चूर हो जाएगा।
पहले हिंद? नहीं, पहले वीर जवान त्सेवांग थारचिन को न्याय दो! यह सुनिश्चित हो गया है कि जनता अब मोदी-शाह पर धोखा देने का आरोप लगा रही है।



Post Comment