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केजरीवाल को बड़ी राहत : क्या खत्म हुआ दिल्ली शराब घोटाला?

केजरीवाल को बड़ी राहत

केजरीवाल को बड़ी राहत मिली है और दिल्ली की सियासत में एक लंबे समय से चला आ रहा कानूनी तूफान फिलहाल थम गया है। अदालत द्वारा अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले से डिस्चार्ज करने का फैसला न केवल एक कानूनी जीत है, बल्कि यह आम आदमी पार्टी के लिए एक नई शुरुआत की तरह भी है।

पिछले कई महीनों से चल रहे इस घटनाक्रम ने न केवल नेताओं को जेल की सलाखों के पीछे धकेला था, बल्कि पार्टी के अस्तित्व और उसकी साख पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। जैसे ही अदालत ने अपना फैसला सुनाया, यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई और दिल्ली के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह बस इसी बात की चर्चा रही कि आखिर इतने लंबे कानूनी संघर्ष के बाद सच की जीत हुई है।

वह भावुक पल जब दिल्ली के सीएम की आंखों से छलक पड़े आंसू

अदालत से बाहर निकलते ही जब अरविंद केजरीवाल ने मीडिया से बात करने की कोशिश की, तो वे अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और कैमरे के सामने ही भावुक होकर रो पड़े। यह दृश्य उन लाखों समर्थकों के लिए काफी मार्मिक था जिन्होंने कठिन समय में भी उनके साथ खड़े रहने का साहस दिखाया था।

लाइवमिंट की रिपोर्ट के अनुसार, जेल से निकलने के बाद और डिस्चार्ज होने की खबर के साथ ही वे गहरे मानसिक तनाव और दबाव को महसूस कर रहे थे। केजरीवाल को बड़ी राहत मिलते ही उनके चेहरे पर वह तनाव साफ दिख रहा था जिसे वे कई महीनों से ढो रहे थे। यह आंसू केवल खुशी के नहीं थे, बल्कि उस 17 महीने के संघर्ष की थकान थे, जिसे उन्होंने और उनके परिवार ने सहा था।

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17 महीने की कैद और मनीष सिसोदिया का लंबा संघर्ष

मनीष सिसोदिया, जो इस मामले में सबसे अधिक समय तक जेल में रहे, का संघर्ष किसी भी मायने में कम नहीं था। टाइम ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मनीष सिसोदिया ने 17 महीने तक जेल की यातनाएं सहीं, जो किसी भी राजनेता के लिए एक कठिन परीक्षा है।

जब उन्हें कोर्ट से डिस्चार्ज किया गया, तो उन्होंने कहा कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन न्याय की जीत निश्चित है। इस केस ने न केवल उनके राजनीतिक करियर को बाधित किया, बल्कि उनकी निजी जिंदगी पर भी गहरा असर डाला। अरविंद केजरीवाल के साथ मिलकर जिस तरह से उन्होंने दिल्ली की शिक्षा नीति को बदला था, उस छवि पर लगे इन आरोपों से निकलना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी, जिससे वे अब सम्मान के साथ बाहर निकले हैं।

अन्ना हजारे ने दी प्रतिक्रिया: क्या पुरानी यादें फिर ताजा हुईं?

इस मामले पर अन्ना हजारे की प्रतिक्रिया भी काफी मायने रखती है, क्योंकि अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक यात्रा वहीं से शुरू हुई थी। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, अन्ना हजारे ने इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कानून अपना काम करता है और यह कोर्ट का फैसला है जिसका सम्मान किया जाना चाहिए।

अन्ना हजारे का यह रुख उस पुरानी दोस्ती और वैचारिक मतभेद के बीच एक संतुलन को दर्शाता है, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर काफी बहस छिड़ गई थी। कई लोगों ने इसे पुराने गुरु और शिष्य के बीच के भावनात्मक रिश्तों की एक और झलक के रूप में देखा, हालांकि राजनीतिक रूप से वे आज एक-दूसरे से काफी दूर हैं।

क्या सच में खत्म हो गया विवाद या यह केवल शुरुआत है?

कानूनी रूप से भले ही केजरीवाल को बड़ी राहत मिली है, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से यह विवाद इतनी जल्दी खत्म होता नजर नहीं आ रहा है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस डिस्चार्ज ने विपक्षी दलों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है।

जहाँ आम आदमी पार्टी इसे पूरी तरह से ‘क्लीन चिट’ मान रही है, वहीं अन्य दल इसे केवल एक कानूनी प्रक्रिया बता रहे हैं। दिल्ली की जनता के मन में भी इस घोटाले के बारे में तरह-तरह के सवाल हैं, जो आगामी चुनावों में अपनी भूमिका निभाएंगे। यह केस अब केवल एक लीगल बैटल नहीं रह गया है, बल्कि यह एक राजनीतिक नैरेटिव बन चुका है, जिसे दोनों पक्ष अपने-अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करेंगे।

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बीआरएस नेता केटीआर का बड़ा दावा: राजनीति का गंदा खेल

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना के नेता केटीआर ने इस मामले में एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि शराब घोटाले का नैरेटिव केवल आम आदमी पार्टी की सरकार को गिराने और बीआरएस को नुकसान पहुंचाने के लिए गढ़ा गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक बदले की भावना के लिए किया गया था और अब जब कोर्ट ने उन्हें डिस्चार्ज कर दिया है, तो यह सब झूठ बेनकाब हो गया है।

केटीआर का यह बयान दक्षिण की राजनीति में भी हड़कंप मचा रहा है, क्योंकि इस कथित घोटाले के तार दूर-दूर तक फैले थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कैसे झूठे आरोपों ने न केवल दिल्ली बल्कि तेलंगाना के नेताओं की छवि को भी नुकसान पहुँचाया है।

आम आदमी पार्टी के लिए क्या है इस फैसले के मायने?

आम आदमी पार्टी के लिए यह फैसला संजीवनी की तरह है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जेल भेजा गया, उससे पार्टी की संगठनात्मक क्षमता पर असर पड़ा था। अब जब उनके मुख्य रणनीतिकार और सीएम खुद बाहर हैं, तो पार्टी फिर से चुनावी मोड में पूरी ताकत के साथ आ सकती है।

केजरीवाल को बड़ी राहत मिलने के बाद कार्यकर्ताओं में जो उत्साह लौटा है, वह आने वाले महीनों में होने वाले स्थानीय चुनावों और राजनीतिक सक्रियता में साफ दिखाई देगा। पार्टी अब इस नैरेटिव को आगे ले जाने की तैयारी कर रही है कि वे पूरी तरह से निर्दोष थे और उन्हें फंसाया गया था।

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न्याय की जीत या राजनीतिक नैरेटिव का बदलना?

अंतिम रूप में, यह फैसला न्यायपालिका की निष्पक्षता और कानून के शासन में विश्वास को पुनर्स्थापित करता है। एक वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर मेरा मानना है कि कोई भी मामला हो, अंत में सत्य ही सामने आता है। हालांकि, जो 17 महीने का समय मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल ने बिताया, उसकी भरपाई कौन करेगा?

यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब न तो कानून के पास है और न ही राजनीति के पास। आज जो फैसला आया है, वह न केवल एक पार्टी की जीत है, बल्कि यह उस लोकतंत्र की भी जीत है जहां अदालतें सत्ता के दबाव से ऊपर उठकर फैसले लेती हैं। अब आगे का भविष्य जनता के हाथ में है कि वे इस फैसले को किस तरह देखती है।

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