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लोकतांत्रिक पतन की तस्वीर: क्या भारत अब चुनावी तानाशाही बन चुका है?

लोकतांत्रिक पतन की तस्वीर
लोकतांत्रिक पतन की तस्वीर

बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार के अधीन भारत का मानवाधिकार परिदृश्य तेजी से अधिनायकवादी प्रवृत्तियों की ओर बढ़ रहा है, जो राष्ट्र की उस लोकतांत्रिक छवि को लगातार क्षीण कर रहा है जो कभी विश्व में एक मिसाल थी। ह्यूमन राइट्स वॉच की वर्ल्ड रिपोर्ट 2026 में यह स्पष्ट किया गया है कि मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा भाषण और सरकारी नीतियां व्यवस्थित रूप से विभाजन तथा हिंसा को बढ़ावा दे रही हैं।

यह लोकतांत्रिक पतन की तस्वीर तब और भयावह हो जाती है जब हम मणिपुर की स्थिति देखते हैं। 2023 से जारी सांप्रदायिक हिंसा में अब तक 260 से अधिक मौतें हो चुकी हैं और 62,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। सैकड़ों घर और चर्च नष्ट कर दिए गए, जहां राज्य सरकार की मिलीभगत और निष्क्रियता के गंभीर आरोप लगे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने हिंसा पर तीन महीने बाद तब प्रतिक्रिया दी, जब दो कुकी महिलाओं को नग्न घुमाने का वीडियो वायरल हुआ। यूएन विशेषज्ञों ने भी सरकार की इस धीमी प्रतिक्रिया की निंदा की है। फरवरी 2026 तक यह हिंसा जारी है, जहां नई झड़पों में सुरक्षा बलों की गोलीबारी से कई मौतें हुईं और विस्थापित आज भी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं।

मुसलमानों के खिलाफ बढ़ती नफरत और ‘बुलडोजर जस्टिस’ का आतंक

बीजेपी शासन में मुसलमानों के प्रति घृणा अब चरम स्तर पर पहुंच चुकी है, जहां सीएए (CAA) जैसे कानून मुसलमानों को नागरिकता के रास्ते से बाहर रखते हैं। हरियाणा के नूह, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में “बुलडोजर जस्टिस” के तहत मुस्लिम संपत्तियों का बिना कानूनी प्रक्रिया के ध्वस्तीकरण आम हो गया है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में मात्र तीन महीनों में पांच राज्यों में 128 संरचनाएं ध्वस्त की गईं, जिनमें से ज्यादातर मुसलमानों की थीं। 2025 में सांप्रदायिक दंगों में 51% की वृद्धि देखी गई है, जो मुख्यतः बीजेपी शासित राज्यों में हुए।

बीजेपी नेताओं के भड़काऊ भाषण और गौ-हत्या के आरोपों के आधार पर लिंचिंग और सामूहिक दंड को बढ़ावा दिया जा रहा है। ह्यूमन राइट्स वॉच की 2026 रिपोर्ट में 2025 के दौरान मुसलमानों के खिलाफ 50 से अधिक गैर-न्यायिक हत्याओं का जिक्र है, जिनमें 27 हत्याएं हिंदू अतिवादियों द्वारा धार्मिक पहचान के आधार पर की गईं। इंडिया हेट लैब के अनुसार, 2025 में 1,318 घृणा भाषण की घटनाएं हुईं, जिनमें 98% का निशाना मुसलमान थे।

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अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार और इंटरनेट शटडाउन का रिकॉर्ड

भारत में स्पीच सेंसरशिप अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का एक औज़ार बन गई है। एक्सेस नाउ की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया में हुए 283 इंटरनेट शटडाउन में से 116 अकेले भारत ने लगाए, जो किसी भी लोकतंत्र में सबसे अधिक है। मणिपुर, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित रहे।

आईटी नियमों में संशोधनों ने सरकार को “फेक न्यूज” के नाम पर किसी भी सामग्री को हटाने का असीमित अधिकार दे दिया है। न्यूज़क्लिक, बीबीसी और अन्य मीडिया संस्थानों पर हुई छापेमारी इसी दमनकारी नीति का हिस्सा है।

आर्टिकल 19 की ग्लोबल एक्सप्रेशन रिपोर्ट 2025 में भारत 161 देशों की सूची में 130वें स्थान पर फिसल गया है। यह गिरावट पिछले 10 वर्षों में 40 अंकों की है, जो दर्शाती है कि प्रेस की स्वतंत्रता किस कदर नष्ट हो रही है। लोकतांत्रिक पतन की तस्वीर अब वैश्विक मंचों पर भारत को “पार्टली फ्री” देशों की श्रेणी में खड़ा कर रही है।

सिविल सोसाइटी का गला घोंटता एफसीआरए (FCRA) हथियार

विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) अब सिविल सोसाइटी को चुप कराने का प्रमुख हथियार बन चुका है। पिछले एक दशक में 20,600 से अधिक एनजीओ के लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं, जिनमें एमनेस्टी इंडिया, ऑक्सफैम, सेव द चिल्ड्रन और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं।

2025 में सोनम वांगचुक के एनजीओ का लाइसेंस रद्द होना यह दिखाता है कि असहमति की हर आवाज को वित्तीय अनियमितता या आतंकवाद के आरोपों में दबाया जा रहा है। यहाँ तक कि एफएटीएफ (FATF) ने भी 2025 में एफसीआरए के दुरुपयोग और बिना परामर्श के किए गए संशोधनों पर चिंता जताई है।

यूएन विशेषज्ञों की निंदा के बावजूद, यह पैटर्न मानवाधिकार पैरवी करने वालों को दंडित कर रहा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में दो एनजीओ के नवीनीकरण पर केंद्र की चुनौती खारिज की, लेकिन तब तक 16,000 से अधिक संगठन पहले ही प्रभावित हो चुके थे।

एनएचआरसी (NHRC) की गिरती साख और हिरासत में मौतों का तांडव

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) अब बढ़ते उल्लंघनों के बीच एक खोखली इकाई बनता जा रहा है। 2025 में आयोग ने 2,739 हिरासत में मौतें (Custodial Deaths) दर्ज कीं, जो 2024 के 2,400 के आंकड़े से कहीं अधिक है। जवाबदेही सुनिश्चित करने में एनएचआरसी की विफलता के कारण ग्लोबल अलायंस ऑफ नेशनल ह्यूमन राइट्स इंस्टीट्यूशंस (GANHRI) ने अप्रैल 2025 में भारत के आयोग को ‘A’ स्टेटस से ‘B’ स्टेटस में डाउनग्रेड करने की सिफारिश की।

इसकी मुख्य वजह पुलिस अधिकारियों की जांच में भागीदारी और स्वतंत्रता की कमी बताई गई। सुरक्षा बलों को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत मिली दंडमुक्ति और मानवाधिकार रक्षकों पर हमलों को नजरअंदाज करना इस लोकतांत्रिक पतन की तस्वीर को और स्पष्ट करता है। यह डाउनग्रेड अप्रैल 2026 से प्रभावी होने जा रहा है, जो भारत की वैश्विक छवि के लिए बड़ा झटका है।

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चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर संकट और चुनावी धांधली के आरोप

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता अब गंभीर संकट में है। 2023 के नए कानून ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति समिति से चीफ जस्टिस (CJI) को हटाकर एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया, जिससे नियुक्तियों पर कार्यपालिका का सीधा नियंत्रण हो गया है।

अपारदर्शी चुनावी बॉन्ड से बीजेपी को मिले असमान लाभ और राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेताओं की चुनिंदा अयोग्यता ने चुनावी निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं।

फ्रीडम हाउस ने भी अपनी 2025 की रिपोर्ट में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता में कमी का हवाला दिया है। बिहार चुनाव 2025 से पहले मतदाता सूची से 65 लाख नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग द्वारा डेटा साझा करने से इनकार करने के आरोपों ने लोकतंत्र की विश्वसनीयता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर किया है।

इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी की ओर बढ़ते भारत की वैश्विक बदनामी

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के ढहने की जो तस्वीर उभर रही है, वह बेहद भयावह है। वी-डेम (V-Dem) की 2025 रिपोर्ट ने भारत को “इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी” यानी चुनावी तानाशाही की श्रेणी में डाल दिया है। पिछले 25 वर्षों में ऑटोक्रेटाइजेशन के मामले में भारत का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है।

ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स 2025 में भारत 165 देशों में 112वें स्थान पर है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामान्यीकृत हिंसा और उत्पीड़न के कारण भारत का स्कोर लगातार गिर रहा है। यह लोकतांत्रिक पतन की तस्वीर न केवल हमारी अंतरराष्ट्रीय छवि को धूमिल कर रही है, बल्कि भविष्य में निवेश, अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों और विदेश नीति को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकती है।

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बहुलवाद बनाम सत्ता की हवस का संघर्ष

अंततः, भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों के बजाय सत्ता को प्राथमिकता देने वाला शासन अब समाज को गहराई से विभाजित कर रहा है। संवैधानिक समानता के मूल सिद्धांतों पर सीधा हमला हो रहा है। चाहे वह मणिपुर की मानवीय त्रासदी हो, मुसलमानों के खिलाफ संगठित हिंसा हो, या प्रेस और सिविल सोसाइटी का दमन—हर पहलू एक ही दिशा में इशारा कर रहा है।

वैश्विक जांच और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद, सरकार की नीतियों में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। यह समय भारत के प्रबुद्ध नागरिकों के लिए जागने का है, क्योंकि यदि यह पतन नहीं रुका, तो भारत की विविधता और लोकतांत्रिक विरासत केवल इतिहास के पन्नों तक ही सीमित रह जाएगी। सत्ता की धौंस और नफरत की राजनीति के बीच असली हार भारत के संविधान और उसके नागरिकों की हो रही है।

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