लुधियाना यूनिवर्सिटी वीसी बर्खास्त: क्या ‘इफ्तार’ के खाने पर छिड़ा युद्ध?
लुधियाना यूनिवर्सिटी वीसी बर्खास्त कर दिए गए हैं और इस फैसले ने पंजाब के शैक्षिक गलियारों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी एक बड़ी बहस छेड़ दी है। मंगलवार, 24 फरवरी 2026 को पंजाब की सीटी यूनिवर्सिटी (CT University) के वाइस चांसलर को उनके पद से हटा दिया गया, जिसके पीछे का मुख्य कारण रमजान के दौरान कश्मीरी छात्रों के साथ हुआ कथित दुर्व्यवहार बताया जा रहा है।
मामले की शुरुआत तब हुई जब यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों ने इफ्तार के भोजन के लिए मांग की थी, जिसे लेकर वीसी और छात्रों के बीच तीखी नोकझोंक हुई।
रिपोर्टों के अनुसार, वीसी ने न केवल छात्रों की मांग को ठुकराया बल्कि उनके साथ कथित तौर पर अभद्र व्यवहार और धमकी भरे लहजे का इस्तेमाल किया। जेकेएसए (JKSA) जैसे छात्र संगठनों के हस्तक्षेप और कैंपस में हुए भारी विरोध प्रदर्शन के बाद यूनिवर्सिटी प्रबंधन को यह कड़ा कदम उठाना पड़ा।
इफ्तार मील का वो विवाद: जब एक छोटी सी मांग ने ले लिया बड़ा राजनीतिक मोड़
इस लुधियाना यूनिवर्सिटी वीसी बर्खास्त मामले की जड़ें रमजान के पवित्र महीने से जुड़ी हैं। लुधियाना के सिधवां खुर्द स्थित सीटी यूनिवर्सिटी के कश्मीरी छात्रों का आरोप है कि उन्होंने मेस में इफ्तार के समय विशेष भोजन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था।
छात्रों का दावा है कि उनके इस धार्मिक और मानवीय अधिकार पर सहानुभूति जताने के बजाय वीसी ने उन पर आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। छात्रों का गुस्सा तब और बढ़ गया जब यह खबर कैंपस से बाहर निकलकर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।
इस विवाद ने न केवल यूनिवर्सिटी प्रशासन की छवि को नुकसान पहुँचाया बल्कि यह मुद्दा छात्रों की धार्मिक स्वतंत्रता और कैंपस कल्चर पर भी सवाल खड़ा करने लगा। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, छात्रों के कड़े रुख को देखते हुए यूनिवर्सिटी को तुरंत कार्रवाई करनी पड़ी।
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मिस्बिहेवियर और धमकियां: क्यों गुस्से में थे कश्मीर के छात्र संगठन?
जब लुधियाना यूनिवर्सिटी वीसी बर्खास्त हुए, तो इसके पीछे जम्मू-कश्मीर छात्र संघ (JKSA) की सक्रियता एक बड़ा कारण बनकर उभरी। छात्र संगठन का आरोप था कि वीसी ने कश्मीरी छात्रों को उनके करियर को बर्बाद करने की धमकी दी थी और उनके साथ ‘मिस्बिहेव’ किया था।
छात्रों ने इसे अपनी अस्मिता और अधिकारों पर प्रहार माना। ललंटोप और अन्य प्रमुख मीडिया हाउस की खबरों के अनुसार, वीसी के खिलाफ लगे कदाचार (Misconduct) के आरोपों ने मामला इतना गंभीर बना दिया कि राज्य के उच्च शिक्षा विभाग को भी इसमें नजर रखनी पड़ी। छात्रों ने कैंपस के गेट पर धरना दिया और तब तक हटने से मना कर दिया जब तक वीसी का इस्तीफा या बर्खास्तगी सुनिश्चित नहीं हो गई। यह विरोध प्रदर्शन शिक्षा के क्षेत्र में छात्रों की एकजुटता का एक बड़ा उदाहरण बन गया।
रमजान विवाद और इस्तीफा: क्या दबाव में लिया गया यह बड़ा फैसला?
यूनिवर्सिटी के आधिकारिक बयान में भले ही इसे ‘त्यागपत्र’ (Resignation) कहा जा रहा हो, लेकिन वास्तविकता यह है कि लुधियाना यूनिवर्सिटी वीसी बर्खास्त किए जाने जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहे थे। लाइव मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने शांति बनाए रखने और कश्मीरी छात्रों के गुस्से को शांत करने के लिए वीसी को पद छोड़ने का निर्देश दिया था।
रमजान विवाद ने यूनिवर्सिटी की ‘इनक्लूसिव’ इमेज पर एक बड़ा धब्बा लगा दिया था, जिसे सुधारने के लिए वीसी की विदाई अनिवार्य हो गई थी। यूनिवर्सिटी ने अब नए प्रशासनिक ढांचे की घोषणा की है ताकि दोबारा ऐसी सांप्रदायिक या क्षेत्रीय तनाव की स्थिति पैदा न हो। यह इस्तीफा पंजाब की निजी यूनिवर्सिटियों के लिए एक कड़ा संदेश है कि छात्रों के धार्मिक और क्षेत्रीय सम्मान से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
कैंपस में बढ़ता तनाव: क्या निजी विश्वविद्यालयों में सुरक्षित हैं बाहरी छात्र?
इस विवाद ने एक और गंभीर चर्चा को जन्म दिया है कि क्या पंजाब की निजी यूनिवर्सिटीज में जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों से आने वाले छात्र वाकई सुरक्षित और सम्मानित महसूस करते हैं? लुधियाना और चंडीगढ़ के मीडिया हलकों में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर इफ्तार जैसे संवेदनशील मुद्दे को प्रशासनिक स्तर पर बेहतर तरीके से क्यों नहीं सुलझाया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूनिवर्सिटीज को सांस्कृतिक संवेदनशीलता (Cultural Sensitivity) की ट्रेनिंग अपने स्टाफ को देनी चाहिए। यह घटना दर्शाती है कि केवल ऊंची इमारतें और बड़ी फीस लेने से शिक्षा के मंदिर नहीं बनते, बल्कि वहां हर संस्कृति और धर्म के छात्रों को समान स्थान और सम्मान मिलना जरूरी है।
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जेन-जी का रिएक्शन: सोशल मीडिया पर कैसे ट्रेंड हुआ #JusticeForKashmiriStudents
आज की जेन-जी पीढ़ी अन्याय के खिलाफ चुप नहीं रहती और इस मामले में भी यही हुआ। जैसे ही वीसी के दुर्व्यवहार की खबरें बाहर आईं, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर #JusticeForKashmiriStudents और #CTUniversity ट्रेंड करने लगा। छात्रों ने वीसी के कथित ऑडियो क्लिप्स और धमकियों वाले मैसेजेस साझा करना शुरू कर दिया।
इस डिजिटल प्रेशर ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया। मिलेनियल्स और जेन-जी छात्रों का मानना है कि 2026 के आधुनिक भारत में किसी छात्र को उसके भोजन या धर्म के आधार पर प्रताड़ित करना कतई स्वीकार्य नहीं है। इस ऑनलाइन आउटरेज ने ही यूनिवर्सिटी को 24 घंटे के भीतर वीसी को हटाने पर मजबूर किया।
आगे की राह: क्या नए वीसी के आने से सुधरेंगे यूनिवर्सिटी के हालात?
लुधियाना की इस यूनिवर्सिटी में अब नए नेतृत्व की तलाश शुरू हो गई है। छात्रों की मांग है कि नया वीसी न केवल अकादमिक रूप से योग्य हो, बल्कि वह छात्रों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील भी हो। सीटी यूनिवर्सिटी ने आश्वासन दिया है कि वे कश्मीरी छात्रों के लिए इफ्तार और अन्य सुविधाओं का पूरा ध्यान रखेंगे।
पंजाब की शिक्षा नीति में भी अब निजी विश्वविद्यालयों की ‘कंडक्ट गाइडलाइंस’ को और सख्त करने की बात की जा रही है। इस मामले ने यह साबित कर दिया है कि छात्र शक्ति जब एकजुट होती है, तो वे सबसे शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति को भी जवाबदेही के कटघरे में खड़ा कर सकते हैं।
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धार्मिक सहिष्णुता और शिक्षा का संगम ही भविष्य का रास्ता है
अंततः, लुधियाना की इस घटना ने हमें एक कड़ा सबक सिखाया है कि शिक्षा के मंदिरों में घमंड और नफरत के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। वीसी की बर्खास्तगी केवल एक व्यक्ति को हटाना नहीं है, बल्कि उस मानसिकता को हटाना है जो छात्रों को बांटने का काम करती है।
रमजान जैसे पवित्र पर्व पर छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार किसी भी सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं है। हम उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में सीटी यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थान इस घटना से सीखेंगे और अपने कैंपस को और अधिक समावेशी बनाएंगे। कश्मीर से आए ये छात्र हमारे अपने हैं और उनकी पढ़ाई के साथ-साथ उनके सम्मान की रक्षा करना भी हमारी साझा जिम्मेदारी है।
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