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लुटियंस की मूर्ति हटी: मोदी सरकार का एक और ऐतिहासिक प्रहार!

लुटियंस की मूर्ति हटी

लुटियंस की मूर्ति हटी और इसके साथ ही भारत के सबसे प्रतिष्ठित सत्ता केंद्र ‘राष्ट्रपति भवन’ से ब्रिटिश वास्तुकला के जनक की प्रतीकात्मक विदाई भी हो गई है। मंगलवार, 24 फरवरी 2026 को केंद्र सरकार द्वारा लिए गए इस ऐतिहासिक फैसले के तहत एडविन लुटियंस की प्रतिमा को हटाकर वहां भारत के पहले भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा (Bust) स्थापित कर दी गई है।

पीआईबी द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, यह कदम भारत की लोकतांत्रिक जड़ों को मजबूत करने और औपनिवेशिक प्रतीकों को भारतीय महापुरुषों से बदलने की कड़ी का हिस्सा है। एडविन लुटियंस ने भले ही नई दिल्ली का नक्शा तैयार किया था, लेकिन राष्ट्रपति भवन जैसे स्थान पर उनकी मौजूदगी को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था, जिसे अब मोदी सरकार ने निर्णायक रूप से सुलझा दिया है।

शशि थरूर का चौंकाने वाला रुख: कांग्रेस सांसद ने क्यों किया सरकार के फैसले का स्वागत?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे हैरान करने वाला मोड़ तब आया जब कांग्रेस के दिग्गज नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने इस कदम की खुलकर तारीफ की। आमतौर पर सरकार के हर फैसले की आलोचना करने वाले थरूर ने टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार कहा कि राष्ट्रपति भवन में एडविन लुटियंस की जगह सी. राजगोपालाचारी जैसे महान भारतीय का होना कहीं अधिक गौरव की बात है।

थरूर का मानना है कि राजगोपालाचारी न केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि वे उस भारतीय बौद्धिकता के प्रतीक थे जिसने स्वतंत्र भारत की नींव रखी। थरूर के इस रुख ने विपक्षी खेमे में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि उन्होंने इस मुद्दे को राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पहचान के चश्मे से देखा है।

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भाजपा का विपक्षी दलों पर हमला: ‘औरंगजेब वाली मानसिकता’ का लगाया आरोप

जैसे ही लुटियंस की मूर्ति हटी, भाजपा ने उन विपक्षी नेताओं पर तीखा हमला बोला जिन्होंने इस बदलाव की आलोचना की थी। भाजपा प्रवक्ताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि जो लोग लुटियंस की मूर्ति हटाए जाने पर आंसू बहा रहे हैं, वे वास्तव में ‘औरंगजेब वाली मानसिकता’ से ग्रसित हैं और वे आज भी अंग्रेजों की मानसिक गुलामी से बाहर नहीं निकल पाए हैं।

भाजपा का तर्क है कि स्वतंत्र भारत में उन लोगों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए जिन्होंने भारतीयों पर शासन करने के लिए इमारतें बनाई थीं। सत्ता पक्ष का कहना है कि यह कदम ‘अमृत काल’ में भारत को उसकी खोई हुई पहचान वापस दिलाने के संकल्प का एक प्रमाण है, जिसे विपक्ष पचा नहीं पा रहा है।

सी. राजगोपालाचारी: ‘राजाजी’ की प्रतिमा के पीछे का गहरा प्रतीकात्मक महत्व

एडविन लुटियंस की जगह सी. राजगोपालाचारी को चुनना महज एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी सोच है। ‘राजाजी’ के नाम से प्रसिद्ध राजगोपालाचारी स्वतंत्र भारत के पहले और अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल थे, जिन्होंने राष्ट्रपति भवन में तब निवास किया था जब यह वायसराय हाउस से भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में बदल रहा था।

उनकी प्रतिमा की स्थापना यह दर्शाती है कि यह भवन अब किसी विदेशी वास्तुकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय संप्रभुता का प्रतीक है। पीआईबी के अनुसार, उनकी प्रतिमा की स्थापना से आने वाली पीढ़ियां उनके राजनीतिक दर्शन और देश के प्रति उनके योगदान को बेहतर ढंग से समझ पाएंगी।

ताजमहल और लुटियंस विवाद: क्या कला को भी धर्म और राजनीति में तौला जाना चाहिए?

इस मुद्दे पर एक सोशल मीडिया ओपिनियन पीस ने नई बहस छेड़ दी है, जिसमें सवाल उठाया गया है कि “अगर आप ताजमहल के वास्तुकार (उस्ताद अहमद लाहौरी) की परवाह नहीं करते, तो लुटियंस के लिए क्यों रो रहे हैं?” इस तर्क ने इंटरनेट पर आग लगा दी है।

जेन-जी और मिलेनियल्स इस बहस में कूद पड़े हैं कि क्या वास्तुकला को उसके बनाने वाले की राष्ट्रीयता से जोड़कर देखना सही है। कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि लुटियंस ने दिल्ली को एक वैश्विक पहचान दी, जबकि दूसरे पक्ष का मानना है कि कला चाहे कितनी भी महान क्यों न हो, वह गुलामी के दंश को नहीं मिटा सकती।

यह वैचारिक युद्ध अब केवल राष्ट्रपति भवन की एक प्रतिमा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत के इतिहास को फिर से लिखे जाने की प्रक्रिया का हिस्सा बन चुका है।

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औपनिवेशिक प्रतीकों का अंत: क्या बदल जाएगा पूरी दिल्ली का भूगोल?

लुटियंस की मूर्ति हटी तो अब यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या ‘लुटियंस दिल्ली’ का नाम भी बदला जाएगा। पिछले कुछ सालों में राजपथ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ करना और संसद की नई इमारत का निर्माण यह संकेत देता है कि सरकार दिल्ली की पहचान को पूरी तरह ‘डिकोलोनाइज’ (Decolonize) करना चाहती है।

जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में उन सभी सड़कों और पार्कों के नाम बदले जा सकते हैं जो अभी भी ब्रिटिश जनरलों और वास्तुकारों के नाम पर हैं। यह प्रक्रिया केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीयों के मन से उस अधीनता के भाव को निकालने का प्रयास है जो पिछले दो सौ सालों के ब्रिटिश शासन ने गहराई तक भर दिया था।

जेन-जी और न्यू इंडिया का विजन: क्या यह वाकई एक जरूरी बदलाव है?

आज की युवा पीढ़ी यानी जेन-जी इस पूरे विवाद को अलग नजरिए से देख रही है। उनके लिए लुटियंस की मूर्ति हटी खबर किसी पुरानी फिल्म के रीमेक जैसी है जहाँ नायक अपनी पुरानी जंजीरें तोड़ रहा है। सोशल मीडिया पर युवा इस बात का समर्थन कर रहे हैं कि भारतीय संस्थानों में केवल भारतीय महापुरुषों का ही स्थान होना चाहिए।

हालांकि, कुछ युवाओं का यह भी मानना है कि केवल मूर्तियां बदलने से विकास नहीं होगा, बल्कि हमें उन ब्रिटिश कानूनों और प्रशासनिक प्रणालियों को भी बदलना होगा जो आज भी आम नागरिक का शोषण कर रही हैं। यह पीढ़ी प्रतीकों से ज्यादा ठोस परिणामों पर भरोसा करती है, लेकिन वे इस सांस्कृतिक गौरव की लड़ाई में सरकार के साथ खड़े नजर आते हैं।

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पत्थर की मूर्ति और राष्ट्र की पहचान के बीच का नया संतुलन

अंततः, लुटियंस की मूर्ति हटी की यह घटना भारत के आत्म-सम्मान और ऐतिहासिक सुधार के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। एडविन लुटियंस एक महान वास्तुकार हो सकते हैं, लेकिन वे उस भारत का हिस्सा नहीं थे जो अपनी शर्तों पर दुनिया से आंखें मिलाता है। सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा का राष्ट्रपति भवन में होना यह बताता है कि हम अपने अतीत का सम्मान करते हैं लेकिन अब हम अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं।

यह फैसला भविष्य के भारत की उस तस्वीर को पेश करता है जहाँ हमारी पहचान विदेशी शासकों के नक्शों से नहीं, बल्कि हमारे अपने नायकों के बलिदानों से परिभाषित होगी। यह परिवर्तन केवल एक मूर्ति का नहीं, बल्कि एक पूरे राष्ट्र की मानसिकता के बदलाव का प्रतीक है।

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