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दीपम विवाद: मद्रास HC ने कहा- पहाड़ी की चोटी पर जलाया जाएगा दीपक

दीपम विवाद

मदुरै के प्रसिद्ध तिरुपरनकुंड्रम पहाड़ियों पर लंबे समय से चले आ रहे दीपम विवाद में मंगलवार को मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस जी जयचंद्रन और जस्टिस केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें पहाड़ियों के ऊपर स्थित एक पत्थर के खंभे (दीपाथून) पर कार्तिकई दीपम जलाने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने तमिलनाडु की DMK सरकार की उन आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कानून-व्यवस्था और रीति-रिवाजों का हवाला दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऊंची जगह पर दीपक जलाना एक प्राचीन हिंदू परंपरा है ताकि वह दूर से भक्तों को दिखाई दे सके। इस फैसले ने न केवल दशकों पुराने विवाद को सुलझाने की दिशा दिखाई है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को भी मजबूती दी है।

तमिलनाडु सरकार को तगड़ा झटका और कोर्ट की सख्त टिप्पणी

डीएमके के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार को इस मामले में बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को “हास्यास्पद और अविश्वसनीय” बताया कि साल में एक खास दिन पत्थर के खंभे पर दीपक जलाने से सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है। बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी अशांति तभी हो सकती है जब “राज्य खुद इसे प्रायोजित करे”। जजों ने आगे कहा कि हमें उम्मीद है कि कोई भी राज्य अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस निचले स्तर तक नहीं गिरेगा। दीपम विवाद पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक शांति भंग होने का डर राज्य द्वारा अपनी सुविधा के लिए बनाया गया एक “काल्पनिक भूत” है, जिसका उद्देश्य समुदायों के बीच अविश्वास पैदा करना है।

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सिंगल जज के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों का निपटारा

यह पूरा मामला जस्टिस जीआर स्वामीनाथन के 1 दिसंबर के उस आदेश से शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर प्रशासन को पहाड़ी की चोटी पर पत्थर के खंभे पर कार्तिकई दीपम जलाने का निर्देश दिया था। इस आदेश को लागू न किए जाने पर भक्तों ने अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी। इसके बाद तमिलनाडु सरकार, पुलिस कमिश्नर, मदुरै कलेक्टर, तमिलनाडु वक्फ बोर्ड और हजरत सुल्तान सिकंदर बादशाह अवुलिया दरगाह प्रबंधन ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की थी। राज्य ने तर्क दिया था कि भक्तों के पास दीपक जलाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, लेकिन कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए सिंगल जज के निर्देशों को पूरी तरह सही माना।

पत्थर के खंभे (दीपाथून) पर अधिकार का प्रतिस्पर्धी दावा

अदालत के सामने एक मुख्य मुद्दा यह था कि क्या वह पत्थर का खंभा दरगाह का हिस्सा है या मंदिर का। अपीलकर्ताओं ने दावा किया था कि वह खंभा दरगाह का है, जिसे कोर्ट ने एक “शरारती बयान” करार दिया। बेंच ने कहा कि राज्य के अधिकारी और दरगाह प्रबंधन यह दिखाने के लिए “ठोस सबूत” पेश करने में विफल रहे कि कोई भी आगम शास्त्र वहां दीपक जलाने पर रोक लगाता है। दीपम विवाद में जजों ने स्पष्ट किया कि 1920 के दशक के एक सिविल कोर्ट के फैसले के अनुसार, पहाड़ी के कुछ हिस्से ही दरगाह के थे, जबकि बाकी इलाका, जिसमें पत्थर का खंभा स्थित है, वह मंदिर के अधिकार क्षेत्र में आता है। कोर्ट ने कहा कि मंदिर प्रबंधन के पास भक्तों के अनुरोध को ठुकराने का कोई वैध कारण नहीं था।

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कानून-व्यवस्था की आशंका पर राज्य को फटकार

मदुरै कलेक्टर और पुलिस कमिश्नर ने तर्क दिया था कि पत्थर का खंभा एक “मनगढ़ंत बात” है और दरगाह की सीढ़ियों से चढ़कर वहां पहुंचना व्यावहारिक रूप से कठिन है, जिससे शांति भंग हो सकती है। इन दलीलों पर कोर्ट ने कहा कि कानून और व्यवस्था का मुद्दा सिर्फ समुदायों के बीच अविश्वास पैदा करने के लिए उठाया गया था। बेंच ने आदेश दिया कि मंदिर देवस्थानम को दीपाथून पर दीपक जलाना ही होगा। कोर्ट ने कहा कि जिला प्रशासन को इस मुद्दे को समुदायों के बीच की खाई को पाटने के अवसर के रूप में लेना चाहिए था, न कि इसे रोकने के बहाने खोजने चाहिए थे।

एएसआई और प्रशासन के लिए विशेष निर्देश

चूंकि तिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी एक संरक्षित स्थल है, इसलिए डिवीजन बेंच ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को स्मारक के संरक्षण के लिए जरूरी शर्तें लगाने की अनुमति दी है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दीपक जलाते समय मंदिर देवस्थानम की एक छोटी टीम ही वहां जाएगी और उनके साथ आम जनता के किसी भी सदस्य को जाने की इजाजत नहीं होगी। टीम के सदस्यों की संख्या एएसआई और पुलिस से सलाह करके तय की जाएगी। मदुरै जिला कलेक्टर को इस पूरे कार्यक्रम का समन्वय और पर्यवेक्षण करने का निर्देश दिया गया है ताकि अनुष्ठान व्यवस्थित तरीके से संपन्न हो सके।

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राजनीतिक प्रतिक्रिया और के अन्नामलाई का बयान

इस अदालती आदेश की प्रशंसा करते हुए तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष के अन्नामलाई ने एक्स (X) पर कहा कि यह समझना मुश्किल है कि एक शक्तिशाली राज्य को एक दिन दीया जलाने से शांति भंग होने का डर कैसे हो सकता है। उन्होंने कोर्ट का हवाला देते हुए लिखा कि जजों ने सरकार को “काल्पनिक भूत” दिखाकर राजनीतिक एजेंडा पूरा करने के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी है। अन्नामलाई ने कहा कि यह फैसला उन भक्तों की जीत है जो लंबे समय से दीपम विवाद के कारण अपने धार्मिक अधिकारों से वंचित थे।

शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और धार्मिक स्वतंत्रता

फैसला सुनाने के बाद बेंच ने बहुत ही मार्मिक बात कही। जजों ने कहा, “हम दोनों पक्षों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व चाहते हैं। संविधान और प्राकृतिक संसाधन सभी के लिए समान हैं। सभी को दूसरे को परेशान किए बिना अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।” अदालत ने आशा व्यक्त की कि यह विस्तृत फैसला हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों को एक-दूसरे को परेशान किए बिना पहाड़ी पर अपने त्योहार मनाने में मदद करेगा। इस फैसले से तिरुपरनकुंड्रम पहाड़ियों पर दशकों से चले आ रहे तनाव को समाप्त करने और सांप्रदायिक सद्भाव सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

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