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महाराष्ट्र में 18,000 स्कूल बंद: मराठी शाला बंदी संकट पर मचा बवाल

मराठी शाला बंदी संकट

मराठी शाला बंदी संकट सड़क से लेकर सदन तक, मराठी शाला बंदी संकट ने एक बार फिर महाराष्ट्र की सियासत और सामाजिक ताने-बाने में खलबली मचा दी है। पुणे और नाशिक से उठी यह विरोध की आवाज केवल कुछ स्कूलों के बंद होने की खबर नहीं है, बल्कि यह उस डर का प्रतिबिंब है जो ग्रामीण और गरीब तबके के परिवारों के मन में बैठा है।

जब माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजते हैं, तो वे केवल शिक्षा की तलाश नहीं करते, बल्कि एक सुरक्षित भविष्य की नींव देखते हैं। पिछले कुछ महीनों में राज्य भर में हुए प्रदर्शनों ने इस बहस को एक नई दिशा दी है, जहाँ प्रदर्शनकारी सरकार के ‘स्कूल विलय’ (merger) की नीति को शिक्षा का निजीकरण करने का एक गुप्त एजेंडा बता रहे हैं।

सरकार बनाम जनता: दावों और हकीकत का विरोधाभास

सत्ता के गलियारों में सरकार का रुख बिल्कुल स्पष्ट है, जहाँ शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इन दावों को सिरे से खारिज किया है कि राज्य में मराठी स्कूलों को बंद किया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि ‘स्कूल कंसोलिडेशन’ या विलय केवल उन स्कूलों के लिए किया जा रहा है जहाँ छात्रों की संख्या बेहद कम है, ताकि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो सके।

हालांकि, इस दावे को लेकर विशेषज्ञों और शिक्षकों के बीच गहरा अविश्वास है। हकीकत यह है कि जब भी किसी छोटे स्कूल का विलय किसी बड़े स्कूल में किया जाता है, तो सबसे पहले प्रभावित होने वाला वर्ग वही बच्चा होता है जिसे अब कई किलोमीटर दूर पैदल चलना पड़ेगा। मराठी शाला बंदी संकट इस बात का प्रमाण है कि आधिकारिक आंकड़ों की सांख्यिकीय सुंदरता जमीन पर आम आदमी की तकलीफ को बयां करने में नाकाम रही है।

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मराठी भाषा की अनिवार्यता और स्कूलों का विरोधाभास

एक तरफ सरकार यह कानून लागू कर रही है कि महाराष्ट्र के हर स्कूल में मराठी भाषा अनिवार्य होनी चाहिए, चाहे वह बोर्ड कोई भी हो, और दूसरी तरफ मराठी माध्यम के सरकारी स्कूलों के अस्तित्व पर ही सवाल उठ रहे हैं। यह विरोधाभास किसी को भी उलझाने के लिए काफी है।

क्या हम एक तरफ भाषा को बचाने का दावा कर रहे हैं और दूसरी तरफ उसी भाषा में शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों को कमजोर कर रहे हैं? मुख्यमंत्री का कहना है कि राज्य में 84 प्रतिशत स्कूल आज भी मराठी माध्यम में हैं और वे मराठी को ज्ञान की भाषा बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन जमीन पर माता-पिता का मोह अंग्रेजी की तरफ बढ़ रहा है। यह एक सांस्कृतिक और आर्थिक द्वंद्व है जिसे केवल कानूनों से हल नहीं किया जा सकता।

ग्रामीण शिक्षा का भविष्य: क्या मर्जिंग ही एकमात्र रास्ता है?

ग्रामीण महाराष्ट्र की आत्मा उसके छोटे स्कूलों में बसती है। जब आप एक गांव से उसका स्कूल छीन लेते हैं, तो आप धीरे-धीरे उस गांव की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ ही तोड़ देते हैं। सरकार का तर्क है कि कम छात्र संख्या वाले स्कूलों में संसाधन देना फिजूलखर्ची है, लेकिन शिक्षकों और स्थानीय नेताओं का मानना है कि स्कूल का मतलब केवल इमारत नहीं, बल्कि गांव का एक सामुदायिक केंद्र है।

जब मराठी शाला बंदी संकट पर बात होती है, तो उसमें सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि जो गरीब छात्र हैं, जो बस या अन्य साधनों का खर्च नहीं उठा सकते, उनके लिए शिक्षा की पहुंच अब और भी कठिन हो जाएगी। यह शिक्षा के अधिकार का प्रश्न है, जिसे केवल ‘रैशनलाइजेशन’ के नाम पर नहीं टाला जा सकता।

शिक्षकों का असंतोष: डिजिटल बोझ और गिरता मनोबल

केवल स्कूल बंद होना ही एकमात्र समस्या नहीं है, बल्कि शिक्षकों पर थोपा गया ऑनलाइन काम और एडमिनिस्ट्रेटिव बोझ भी एक बड़ा कारण है जिसकी वजह से व्यवस्था चरमरा रही है। राज्य भर के शिक्षक संगठनों ने कई बार यह चेतावनी दी है कि वे अपना सारा समय ऐप्स पर डेटा भरने में बिता रहे हैं, जिससे शिक्षण का कार्य प्रभावित हो रहा है।

जब शिक्षक ही पढ़ाने के बजाय फाइलों और टैबलेट्स में उलझे रहेंगे, तो सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी? यह मनोबल गिरने का ही नतीजा है कि सरकारी तंत्र अपनी ही संस्थाओं की रक्षा करने में अक्षम महसूस कर रहा है।

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शिक्षा का निजीकरण: क्या यह एक सुनियोजित एजेंडा है?

शिक्षाविदों का एक वर्ग मानता है कि सरकार का यह कदम शिक्षा के निजीकरण की दिशा में एक सोची-समझी रणनीति है। जब सरकारी स्कूल बंद होंगे, तो स्वभाविक है कि निजी स्कूल उन जगहों पर अपनी जगह बनाएंगे। क्या सरकारी स्कूल की असफलता का लाभ उठाकर निजी संस्थाओं को फलने-फूलने का मौका दिया जा रहा है?

मराठी शाला बंदी संकट को इसी बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह सिर्फ 18,000 स्कूलों की बात नहीं है, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम की बात है जो समाज के सबसे आखिरी पायदान पर खड़े बच्चे को सम्मानजनक और मुफ्त शिक्षा देने का वादा करता था। यदि सरकार इसे बचाने में विफल रहती है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के साथ एक ऐतिहासिक अन्याय होगा।

डिजिटल युग में सरकारी स्कूल: एक खोई हुई पहचान

आज के दौर में जब हर बच्चा टैबलेट और इंटरनेट के जरिए सीखना चाहता है, तब हमारे सरकारी स्कूल अभी भी पुरानी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं। सरकार ‘माझी शाळा, सुंदर शाळा’ जैसे अभियान चला रही है, जो निश्चित रूप से सराहनीय हैं, लेकिन क्या यह केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा?

जब तक हर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक, खेल के मैदान और डिजिटल लाइब्रेरी नहीं होगी, तब तक केवल योजनाओं के नाम बदलने से कुछ नहीं होगा। महाराष्ट्र का गौरवशाली शैक्षणिक इतिहास रहा है, और यह दुखद है कि आज हम अपनी उसी विरासत को बचाने के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।

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समाधान की दिशा में पहला कदम क्या है?

अंततः, राज्य सरकार को इस मुद्दे पर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए और यह स्पष्ट करना चाहिए कि छात्रों की संख्या कम होने पर वे शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए क्या वैकल्पिक उपाय कर रहे हैं। विलय के बजाय, क्यों नहीं उन स्कूलों को ‘हब’ बनाकर आस-पास के गांवों के छात्रों के लिए परिवहन की व्यवस्था की जाती?

हमें इस मराठी शाला बंदी संकट को केवल राजनीति के चश्मे से देखने के बजाय, एक मानवीय संवेदना के साथ देखना होगा। सरकार, समाज और शिक्षकों को मिलकर एक ऐसा रास्ता निकालना होगा जहाँ मराठी भाषा भी फले-फूले और गरीब से गरीब बच्चा भी अपनी मातृभाषा में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सके। यह महाराष्ट्र के भविष्य का प्रश्न है।

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