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महाराष्ट्र चुनाव: महायुति ने 68 सीटें निर्विरोध जीतीं, वोटिंग से पहले ही बड़ी जीत

68 सीटें निर्विरोध जीतीं

महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव 2026 के लिए मतदान होने से पहले ही सत्ताधारी महायुति गठबंधन ने अपनी ताकत का लोहा मनवा दिया है। 15 जनवरी को होने वाले चुनावों के लिए एक भी वोट पड़ने से पहले ही महायुति ने 68 सीटें निर्विरोध जीतीं हैं, जो राज्य की शहरी राजनीति में एक बड़ा बदलाव संकेत दे रही हैं। शुक्रवार को नामांकन वापस लेने की समय सीमा समाप्त होने के बाद यह स्थिति स्पष्ट हुई कि विपक्षी उम्मीदवारों के हटने से सत्ताधारी गठबंधन के कई प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं। इस बड़ी शुरुआती बढ़त में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सबसे बड़ी लाभार्थी बनकर उभरी है, जिसके अकेले 44 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के 22 और अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दो उम्मीदवार बिना किसी मुकाबले के जीत हासिल करने में सफल रहे हैं।

क्षेत्रवार दबदबा: कल्याण-डोंबिवली से लेकर पुणे और जलगाँव तक महायुति का परचम

महायुति की इस एकतरफा जीत के आंकड़ों पर नजर डालें तो मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR) के कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में गठबंधन का सबसे मजबूत प्रदर्शन रहा है। यहाँ बीजेपी के 15 और शिवसेना के छह उम्मीदवारों सहित कुल 21 प्रत्याशियों ने जीत हासिल की। इसके अलावा बीजेपी ने भिवंडी, पनवेल और जलगाँव में भी छह-छह सीटों पर अपना कब्जा जमाया है। धुले में चार और अहिल्यानगर में बीजेपी के तीन उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे महत्वपूर्ण शहरों में भी बीजेपी के दो-दो प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं। शिवसेना ने ठाणे में सात और जलगाँव में छह सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की है, जबकि अजीत पवार की एनसीपी ने अहिल्यानगर में दो सीटें जीती हैं। दिलचस्प बात यह है कि मालेगाँव में एक स्थानीय इस्लामिक पार्टी का उम्मीदवार भी निर्विरोध चुना गया है।

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पुणे में अनुभवी नेताओं की वापसी और बीजेपी का 125 सीटों का बड़ा लक्ष्य

पुणे नगर निगम में बीजेपी की जीत विशेष रूप से चर्चा में है, जहाँ वार्ड नंबर 35 से मंजूषा नागपुरे और श्रीकांत जगताप को निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया। इन दोनों नेताओं ने पहले भी 2017-2022 के कार्यकाल के दौरान इसी वार्ड का प्रतिनिधित्व किया था। इस सफलता पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरलीधर मोहोल ने कहा कि यह जीत पार्टी के काम और सुशासन का प्रतिबिंब है। उन्होंने बड़े आत्मविश्वास के साथ घोषणा की कि पुणे का अगला मेयर बीजेपी से ही होगा। मोहोल ने पत्रकारों से कहा, “हमारा लक्ष्य 125 सीटों का है। दो सीटें पहले ही निर्विरोध जीत ली गई हैं, अब 123 सीटें बाकी हैं।” बीजेपी प्रवक्ता केशव उपाध्याय ने भी कहा कि यह जीत राज्य भर के शहरी स्थानीय निकायों में पार्टी के बढ़ते प्रभाव और प्रभाव को दर्शाती है।

नेतृत्व की रणनीति और संगठनात्मक मजबूती: फडणवीस और रविंद्र चव्हाण का प्रभाव

बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने इस चुनावी सफलता का श्रेय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की लोकप्रियता और राज्य इकाई के अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण की सटीक चुनावी रणनीति को दिया है। नेताओं का मानना है कि चव्हाण के नेतृत्व में जिस तरह से चुनाव की प्लानिंग और कोऑर्डिनेशन किया गया, उसने न केवल नगर परिषदों बल्कि बड़े नगर निगमों में भी महायुति की स्थिति को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान की है। गठबंधन की इस जीत को पिछले महीने हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों में मिली सफलता के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है। सत्ताधारी दलों का दावा है कि 2024 के विधानसभा चुनावों के बाद जनता का भरोसा उन पर और भी ज्यादा बढ़ा है, जिससे विपक्षी खेमे में घबराहट का माहौल है और यही कारण है कि महायुति ने 68 सीटें निर्विरोध जीतीं हैं।

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संजय राउत का तीखा हमला: ‘5 करोड़ रुपये के बैग’ और लोकतंत्र की हत्या का आरोप

इन निर्विरोध जीतों पर शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी उम्मीदवारों को ‘साम, दाम, दंड, भेद’ के जरिए हटने पर मजबूर किया गया। राउत ने दावा किया कि उम्मीदवारों को नामांकन वापस लेने के लिए पांच-पांच करोड़ रुपये के बैग दिए जा रहे थे। उन्होंने कहा, “अटल बिहारी वाजपेयी या नरेंद्र मोदी जैसे बड़े नेता भी कभी निर्विरोध नहीं चुने गए, लेकिन महाराष्ट्र में यह नया और खतरनाक चलन शुरू हुआ है।” राउत ने आरोप लगाया कि जलगाँव और कल्याण में उम्मीदवारों को डराने और रिश्वत देने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया गया। उन्होंने आगे कहा कि “लोकतंत्र को पैसों के थैलों से खरीदा जा रहा है” और चुनाव आयोग इस पूरे घटनाक्रम पर एक ‘पालतू बिल्ली’ की तरह चुप बैठा है।

विपक्ष की आलोचना और चुनाव आयोग की भूमिका पर उठते सवाल

संजय राउत के सुर में सुर मिलाते हुए शिवसेना (UBT) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी सत्ताधारी गठबंधन पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी उम्मीदवारों को ED और CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियों की धमकियां देकर या रिश्वत देकर चुनाव से बाहर किया गया। उन्होंने कहा कि यह शर्म की बात है कि चुनाव आयोग इन विसंगतियों पर चुप है। इन गंभीर शिकायतों के बाद राज्य चुनाव आयोग (SEC) ने इस मामले में जांच के आदेश दिए हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नामांकन वापस लेने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का अनुचित दबाव या लालच शामिल नहीं था। महायुति ने जहाँ इसे अपनी लोकप्रियता बताया है, वहीं विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ करार दिया है। इसी विवादित माहौल के बीच महायुति ने 68 सीटें निर्विरोध जीतीं और अपनी बढ़त पक्की कर ली।

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अजीत पवार का बीजेपी पर पलटवार और गठबंधन के भीतर तनाव के संकेत

राजनीतिक सरगर्मी तब और बढ़ गई जब उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने पिंपरी-चिंचवड़ में अपने ही सहयोगी दल बीजेपी के नेताओं पर “भ्रष्टाचार की चरम सीमा” पर पहुंचने का आरोप लगाया। अजीत पवार के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए संजय राउत ने तंज कसा कि पवार को अब एहसास हो रहा है कि उनके सहयोगी कितने भ्रष्ट हैं। राउत ने अजीत पवार को सुझाव दिया कि यदि उन्हें बीजेपी इतनी ही भ्रष्ट लगती है, तो उन्हें सरकार छोड़ देनी चाहिए और अपने गुरु शरद पवार के पास लौट जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अजीत पवार का यह बदलता लहजा महाराष्ट्र की राजनीति में संभावित गठबंधन बदलाव का संकेत हो सकता है। गठबंधन के भीतर के इस विरोधाभास ने आगामी वोटिंग से पहले सियासी समीकरणों को और भी पेचीदा बना दिया है।

15 जनवरी का महामुकाबला: बीएमसी सहित 29 नगर निगमों पर सबकी नजर

इस शुरुआती बढ़त और विवादों के बावजूद, शेष सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया पूरी तेजी से जारी है। 15 जनवरी को मुंबई (BMC) सहित महाराष्ट्र के कुल 29 नगर निगमों के लिए मतदान होगा। राज्य चुनाव आयोग के अनुसार, वोटों की गिनती और नतीजों की घोषणा 16 जनवरी को की जाएगी। महायुति ने 68 सीटें निर्विरोध जीतीं हैं, जिससे उनका मनोबल काफी ऊंचा है, लेकिन विपक्षी दल इस प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि 15 जनवरी को महाराष्ट्र की जनता इन निर्विरोध जीतों और भ्रष्टाचार के आरोपों पर अपनी क्या मुहर लगाती है। यह चुनाव न केवल स्थानीय निकायों के भविष्य का फैसला करेंगे, बल्कि राज्य की मुख्यधारा की राजनीति की दिशा भी तय करेंगे।

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