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बंगाल SIR मामला: ममता बनर्जी आज सुप्रीम कोर्ट में खुद लड़ेंगी अपना केस

ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट

पश्चिम बंगाल की राजनीति और भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में आज एक दुर्लभ और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में राज्य में चल रहे इलेक्टोरल रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ अपनी याचिका पर खुद बहस कर सकती हैं। यह किसी मौजूदा मुख्यमंत्री द्वारा उठाया गया एक असाधारण कदम है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से साझा की गई एक तस्वीर ने इन अटकलों को और पुख्ता कर दिया है, जिसमें मुख्यमंत्री जैसी दिखने वाली एक महिला वकील का गाउन पहने सुप्रीम कोर्ट की सीढ़ियां चढ़ रही है। कैप्शन में इसे “लोगों की वकील बनाम शैतान का वकील” बताते हुए इस पल को ऐतिहासिक करार दिया गया है।

CJI की तीन-जजों की बेंच करेगी सुनवाई

यह महत्वपूर्ण सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन-जजों की बेंच के सामने सुबह 11 बजे के बाद निर्धारित है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के खिलाफ यह रिट याचिका दायर की है। TMC नेताओं ने पुष्टि की है कि मुख्यमंत्री के नाम पर सुरक्षा गेट पास जारी किया जा चुका है और वह कोर्टरूम नंबर 1 में अपनी लीगल टीम के साथ मौजूद रहेंगी। ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता के साथ-साथ एक अनुभवी कानूनी जानकार के रूप में भी अपनी बात रख सकती हैं।

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वकील नहीं, ‘आम नागरिक’ के तौर पर पेश होने की इजाजत

LLB की डिग्री रखने वाली ममता बनर्जी ने एक अंतरिम आवेदन (Interlocutory Application) दायर कर कोर्ट से खुद दलीलें पेश करने की अनुमति मांगी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह एक पेशेवर वकील के बजाय एक जागरूक नागरिक और मामले की गहरी जानकारी रखने वाली याचिकाकर्ता के रूप में बेंच को संबोधित करना चाहती हैं। बता दें कि बनर्जी के पास कलकत्ता के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री है और उन्होंने आखिरी बार 1994 में जिला अदालत में वकालत की थी। उनका तर्क है कि उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति कोर्ट को SIR प्रक्रिया के कारण बंगाल के निवासियों द्वारा झेली जा रही ‘जमीनी हकीकत’ को समझने में मदद करेगी।

ECI पर ‘तानाशाही’ और ‘पक्षपात’ के गंभीर आरोप

अपनी याचिका में मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग पर कड़े प्रहार किए हैं। उन्होंने ECI पर राजनीतिक पक्षपात और SIR आयोजित करने में तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। याचिका में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से निष्पक्षता की उम्मीद थी, लेकिन उसकी वर्तमान कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक समाज के लिए “बेहद चिंताजनक” है। ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में तत्काल दखल देने की मांग कर रही हैं, ताकि आगामी 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले योग्य मतदाताओं को मताधिकार से वंचित होने से बचाया जा सके।

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1.25 करोड़ मतदाताओं पर मंडराता संकट

पूरा विवाद ‘तार्किक विसंगति’ (Logical Discrepancy – LD) श्रेणी के तहत मतदाताओं के वर्गीकरण को लेकर है। चुनाव आयोग ने राज्य में लगभग 1.25 करोड़ मतदाताओं को इस श्रेणी में चिह्नित किया है, जिसमें 2002 की वोटर लिस्ट के साथ विवरणों का मेल न खाना शामिल है। बनर्जी का आरोप है कि नाम की वर्तनी, उम्र के अंतर या माता-पिता के नाम में मामूली भिन्नता के लिए भी लोगों को नोटिस जारी किए जा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया है कि 2002 के पुराने रिकॉर्ड के आधार पर किया जा रहा यह सख्त वेरिफिकेशन आम नागरिकों के लिए अनावश्यक परेशानी पैदा कर रहा है और इसे “बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने” की साजिश बताया है।

SIR प्रक्रिया रद्द करने और 2025 की सूची के इस्तेमाल की मांग

मुख्यमंत्री ने अदालत से आग्रह किया है कि पश्चिम बंगाल में चल रही पूरी SIR प्रक्रिया को रद्द कर दिया जाए। उनकी मांग है कि 2026 के विधानसभा चुनाव SIR के माध्यम से संशोधित सूची के बजाय मौजूदा 2025 की मतदाता सूची के आधार पर ही कराए जाएं। उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि आधार कार्ड को एक वैध पहचान दस्तावेज के रूप में पूरी तरह मान्यता दी जाए और अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे उपलब्ध रिकॉर्ड का उपयोग करके स्वतः ही सुधार करें, न कि मतदाताओं को बार-बार अतिरिक्त कागजात जमा करने के लिए मजबूर करें।

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सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देश और पारदर्शिता का सवाल

इससे पहले 19 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि यह प्रक्रिया पारदर्शी और वोटर-फ्रेंडली होनी चाहिए। कोर्ट ने आदेश दिया था कि ‘तार्किक विसंगतियों’ की सूची को स्थानीय प्रशासनिक कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाए ताकि प्रभावित लोग आसानी से अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकें। हालांकि, ममता बनर्जी का दावा है कि इन निर्देशों के बावजूद आधिकारिक पोर्टल पर सूचियां अपलोड नहीं की गईं, जिससे पारदर्शिता का अभाव बना हुआ है और प्रभावित लोगों को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिल रहा है।

लोकतंत्र की रक्षा के लिए ‘अंतिम विकल्प’

मुख्यमंत्री ने इस कानूनी लड़ाई को लोकतंत्र की रक्षा का नाम दिया है। उन्होंने हाल ही में मीडिया के सामने SIR प्रक्रिया के कथित पीड़ितों को भी पेश किया था ताकि देश बंगाल में हो रही “गड़बड़ियों” को देख सके। ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें पेश करते हुए यह साबित करना चाहती हैं कि चुनावी निष्पक्षता के नाम पर किसी भी वैध मतदाता का नाम मनमाने ढंग से नहीं हटाया जाना चाहिए। अब सबकी निगाहें CJI सूर्यकांत की बेंच पर टिकी हैं कि क्या वे मुख्यमंत्री को खुद बहस करने की अनुमति देते हैं और चुनाव आयोग की इस विवादित प्रक्रिया पर क्या रुख अपनाते हैं।

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