मोदी सरकार और जवाबदेही: जेफरी एपस्टीन फाइल्स ने खड़ा किया बड़ा सवाल
जनवरी 2026 में अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) द्वारा जारी की गई जेफरी एपस्टीन की 30 लाख पन्नों की फाइल्स और लाखों तस्वीरों ने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया है। जहां कई लोकतांत्रिक देशों ने इन दस्तावेजों में नाम आने वाले अपने नेताओं और अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई की है, वहीं भारत में मोदी सरकार और जवाबदेही का रवैया पूरी तरह से इनकार और खारिज करने वाला रहा है।
ब्रिटेन, फ्रांस और स्वीडन जैसे देशों में इस्तीफे, निष्कासन और स्वतंत्र जांच शुरू की गई, जो संस्थागत पारदर्शिता की मिसाल है। इसके विपरीत, भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी जैसे प्रभावशाली नामों का उल्लेख होने के बावजूद अब तक कोई आधिकारिक जांच शुरू नहीं हुई है। यह स्थिति इस धारणा को पुख्ता करती है कि देश में शक्तिशाली लोग किसी भी तरह की जवाबदेही से ऊपर माने जाते हैं।
वैश्विक कार्रवाई बनाम भारतीय इनकार: क्या हम मानकों में पिछड़ रहे हैं?
विदेशी धरती पर इन फाइल्स के आधार पर कार्रवाई बेहद निर्णायक रही है। ब्रिटेन में पूर्व राजदूत पीटर मैंडेलसन को लेबर पार्टी से बाहर कर दिया गया, जबकि स्वीडन की जोआना रुबिनस्टीन ने संयुक्त राष्ट्र के अपने पद से इस्तीफा दे दिया। फ्रांस में जैक लैंग ने सांस्कृतिक संस्थान का पद छोड़ा क्योंकि उनका नाम संदिग्धों की सूची में आया था।
वहां संदेह की एक छाया भी सार्वजनिक विश्वास को बहाल करने के लिए इस्तीफे का कारण बन जाती है। लेकिन भारत में, सरकार ने इन दस्तावेजों को “दोषी अपराधी की घटिया कल्पना” बताकर प्रारंभिक जांच तक की आवश्यकता नहीं समझी। यह रवैया वैश्विक नैतिक मानकों से बिल्कुल अलग है और हमारी संस्थागत ईमानदारी पर सवाल उठाता है।
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अनिल अंबानी और एपस्टीन: ‘दिल्ली लीडरशिप’ और न्यूयॉर्क मुलाकातों का सच
भारतीय संदर्भ में ये फाइल्स बेहद चौंकाने वाली जानकारी साझा करती हैं। उद्योगपति अनिल अंबानी और एपस्टीन के बीच 2017 से 2019 के मैसेजेस में “दिल्ली की लीडरशिप” का जिक्र है। दावा है कि अंबानी ने एपस्टीन से जेरेड कुश्नर और स्टीव बैनन जैसे अमेरिकी दिग्गजों से मिलने के लिए मदद मांगी थी, ताकि प्रधानमंत्री मोदी की 2017 की अमेरिका यात्रा की जमीन तैयार की जा सके।
एक ईमेल में एपस्टीन ने मोदी का जिक्र करते हुए लिखा कि उन्होंने इज़राइल में “डांस किया और गाना गाया”। इतना ही नहीं, 2019 में जब भारत में चुनाव परिणाम आ रहे थे, तब अंबानी न्यूयॉर्क में एपस्टीन के घर पर मौजूद थे। इन गंभीर कड़ियों के बावजूद मोदी सरकार और जवाबदेही का कोई भी तंत्र सक्रिय नहीं हुआ, जिससे साठगांठ की बू आती है।
हरदीप सिंह पुरी और 62 ईमेल्स का विवाद: कांग्रेस के तीखे हमले
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के साथ 2014 से 2017 के बीच दर्जनों ईमेल्स के तार जुड़े हैं। कांग्रेस का दावा है कि पुरी ने एपस्टीन को 62 ईमेल्स भेजे और उनके बीच 14 मुलाकातें हुईं। इन संदेशों में “एक्सोटिक आइलैंड” और “हैव फन” जैसे वाक्यांशों का उपयोग किया गया है।
पुरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वीकार किया कि उनकी 3-4 मुलाकातें हुई थीं, लेकिन उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय डेलिगेशन का हिस्सा बताते हुए किसी भी गलत काम से इनकार किया। हालांकि, विपक्ष ने संसद में उनके इस्तीफे और स्वतंत्र जांच की मांग की, जिसे सरकार ने “राजनीतिक नौटंकी” कहकर ठंडे बस्ते में डाल दिया।
सरकार की रक्षात्मक मुद्रा: ‘अटमोस्ट कंटेम्प्ट’ से खारिज करने की रणनीति
भारत के विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री का नाम आने पर इसे “एक सजायाफ्ता अपराधी की बकवास” करार दिया। सरकार का पूरा जोर तथ्यों की जांच के बजाय आक्रामक बचाव पर रहा है। पुरी ने टीवी इंटरव्यू में सफाई दी कि उन्हें एपस्टीन के अपराधों की जानकारी बाद में मिली।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या भारत में न्याय की तराजू केवल आम आदमी के लिए है? दिल्ली की सड़कों पर युवा कांग्रेस के उग्र प्रदर्शन हुए और सोशल मीडिया पर आक्रोश देखने को मिला, लेकिन मोदी सरकार और जवाबदेही सुनिश्चित करने के बजाय केवल काउंटर-अटैक का रास्ता चुना गया, जो भ्रष्टाचार और नैतिक पतन की धारणा को और मजबूत करता है।
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राष्ट्रीय चरित्र का परीक्षण: क्या शक्तिशाली लोग सच में जवाबदेह हैं?
यह कांड व्यक्तिगत नामों से कहीं ज्यादा भारत के राष्ट्रीय चरित्र का परीक्षण है। फाइल्स में दीपक चोपड़ा और मीरा नायर जैसे अन्य भारतीयों के नाम भी नेटवर्किंग के संदर्भ में आए हैं। समस्या यह नहीं है कि नाम आए हैं, बल्कि समस्या यह है कि भारत में सिस्टम अपने प्रभावशाली लोगों की रक्षा करता दिखता है।
जब दुनिया देख रही है कि हमारे नैतिक मानदंड गिर रहे हैं, तब कोई जांच न होना यह संदेश देता है कि शक्तिशाली लोग कुछ भी करके बच सकते हैं। “भारत अपराधियों और लूटेरों का स्वर्ग है”—जनता की ऐसी कड़ी टिप्पणियां आज के माहौल में दुखद रूप से प्रासंगिक महसूस होने लगी हैं।
विदेशी मॉडल अपनाने की जरूरत: अंतरराष्ट्रीय साख पर लगा दाग
भारत को अपनी अंतरराष्ट्रीय साख बचाने के लिए उन देशों का उदाहरण लेना चाहिए जिन्होंने तत्काल स्वतंत्र आयोग बनाए। जनता की नाराजगी आज एक्स (X) जैसे प्लेटफार्मों पर साफ दिख रही है, जो आम नागरिक और कुलीन वर्ग के बीच की खाई को दर्शाती है।
मोदी सरकार और जवाबदेही के दावों के बीच यदि स्वतंत्र जांच नहीं होती, तो लोकतंत्र का यह ढांचा खोखला ही नजर आएगा। हमें ऐसे पारदर्शी तंत्र की आवश्यकता है जहां जांच पूरी होने तक पद से हटने की परंपरा विकसित हो, वरना दुनिया की नजरों में भारत की छवि एक ऐसे देश की बनी रहेगी जहां नैतिक चूक को नजरअंदाज किया जाता है।
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बेशर्मी और निर्लज्जता की राजनीति का अंत जरूरी
अंततः, एपस्टीन फाइल्स पर भारत की प्रतिक्रिया में टालमटोल और राजनीतिक हमलों का ही बोलबाला रहा है। मोदी के नेतृत्व वाले भारत ने जिस तरह से इस मामले में बेशर्मी की छवि पेश की है, वह भविष्य के लिए घातक है।
यदि नैतिक चूक को इसी तरह सामान्य माना जाता रहा, तो कड़वी सच्चाई यही रहेगी कि भारत उन लोगों के लिए स्वर्ग बन चुका है जो बिना किसी पछतावे और चुनौती के फलते-फूलते हैं। अगर हम आज नफरत और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े नहीं हुए, तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। सच्ची देशभक्ति जवाबदेही और न्याय की रक्षा में है, न कि उसे छिपाने में।
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