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मुंबई कोस्टल रोड प्रोजेक्ट: क्या विकास के नाम पर होगा विनाश?

मुंबई कोस्टल रोड प्रोजेक्ट

मुंबई कोस्टल रोड प्रोजेक्ट आज शहर के विकास की एक ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है जहाँ एक तरफ आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर है तो दूसरी तरफ पर्यावरण की भारी कीमत। रविवार, 22 फरवरी 2026 को मिली ताजा रिपोर्टों के अनुसार, बीएमसी ने इस प्रोजेक्ट के तहत 70 हेक्टेयर की भूमि को खुले मैदानों, बर्ड ट्रेल्स और माइक्रो-फॉरेस्ट के रूप में विकसित करने की योजना बनाई है।

यह मुंबई जैसे भीड़भाड़ वाले शहर के लिए ताजी हवा के झोंके जैसा है, जहाँ लोगों को पिकलबॉल कोर्ट और साइकिलिंग ट्रैक जैसी सुविधाएं मिलेंगी। हालांकि, इस ‘ग्रीन बेंचमार्क’ को स्थापित करने के पीछे एक डरावना सच भी छिपा है, जो 45,000 से अधिक मैंग्रोव पेड़ों की कटाई से जुड़ा है। यह विरोधाभास आज मुंबई के हर नागरिक, पर्यावरणविद् और नीति निर्माता के बीच बहस का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है।

70 हेक्टेयर का मास्टरप्लान: बर्ड ट्रेल्स से लेकर पिकलबॉल कोर्ट तक का नया लुक

बीएमसी ने मुंबई कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के लैंडस्केपिंग प्लान को लेकर काफी उत्साह दिखाया है। इस 70 हेक्टेयर की विशाल जमीन पर केवल कंक्रीट नहीं, बल्कि प्रकृति को जगह दी जाएगी। यहाँ ‘माइक्रो-फॉरेस्ट’ यानी छोटे जंगल उगाए जाएंगे जो शहर के बढ़ते तापमान को कम करने में मदद करेंगे।

फिटनेस के शौकीन युवाओं के लिए पिकलबॉल कोर्ट और लंबी दूरी के साइकिलिंग ट्रैक बनाए जा रहे हैं। पक्षी प्रेमियों के लिए विशेष ‘बर्ड ट्रेल्स’ का निर्माण किया जा रहा है ताकि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के साथ लोग जुड़ सकें। बीएमसी कमिश्नर कल नागरिकों के सामने यह पूरा प्रेजेंटेशन रखेंगे, जिसमें इस बात पर जोर दिया जाएगा कि कैसे यह प्रोजेक्ट मुंबई को वैश्विक स्तर के तटीय शहरों की कतार में खड़ा कर देगा।

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45,000 मैंग्रोव पेड़ों की बलि: क्या विकास की यह कीमत बहुत ज्यादा है?

जहाँ एक तरफ हरियाली के वादे हैं, वहीं मुंबई कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के दूसरे चरण ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं की नींद उड़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्ट के विस्तार के लिए मैंग्रोव फॉरेस्ट के 45,000 से अधिक पेड़ों को काटने की योजना है। मैंग्रोव मुंबई के लिए ‘प्राकृतिक दीवार’ का काम करते हैं जो शहर को समुद्री लहरों और बाढ़ से बचाते हैं।

इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का जाना पारिस्थितिक असंतुलन पैदा कर सकता है। पर्यावरणविदों का कहना है कि 70 हेक्टेयर में नए पार्क बनाना अच्छी बात है, लेकिन सालों पुराने प्राकृतिक मैंग्रोव को काटकर कृत्रिम जंगल बनाना प्रकृति के साथ खिलवाड़ है। यह मुद्दा अब बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुँचने की संभावना है, जिससे प्रोजेक्ट की डेडलाइन पर भी असर पड़ सकता है।

बांद्रा-वर्सोवा सी लिंक की सुस्त रफ्तार: डेडलाइन और हकीकत के बीच बढ़ती खाई

मुंबई कोस्टल रोड प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बांद्रा-वर्सोवा सी लिंक भी है, जो वर्तमान में अपनी समयसीमा से काफी पीछे चल रहा है। ‘द प्रिंट’ की रिपोर्ट के अनुसार, कागजों पर दिखने वाली डेडलाइन और ज़मीनी हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर (Gap) बना हुआ है। तकनीकी चुनौतियों और फंड की कमी के कारण काम की रफ्तार काफी धीमी है।

यह सुस्ती न केवल प्रोजेक्ट की लागत बढ़ा रही है, बल्कि ट्रैफिक की समस्या से जूझ रहे मुंबईकरों के सब्र का इम्तिहान भी ले रही है। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वे पर्यावरण संबंधी चिंताओं को दूर करते हुए निर्माण कार्य को गति कैसे दें, ताकि यह सी लिंक केवल एक अधूरा सपना बनकर न रह जाए।

वर्सोवा निवासियों का विद्रोह: नाना-नानी पार्क के पास एग्जिट प्लान पर बवाल

प्रोजेक्ट के डिजाइन को लेकर भी स्थानीय स्तर पर भारी विरोध देखा जा रहा है। वर्सोवा के निवासियों ने विशेष रूप से ‘नाना-नानी पार्क’ के पास प्रस्तावित एग्जिट प्लान का कड़ा विरोध किया है। नागरिकों का कहना है कि यहाँ से कोस्टल रोड का एग्जिट देने से शांत रिहायशी इलाका शोर और प्रदूषण की चपेट में आ जाएगा।

बुजुर्गों और बच्चों के लिए सुरक्षित माने जाने वाले इस पार्क के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। निवासियों ने बीएमसी को चेतावनी दी है कि यदि इस प्लान में बदलाव नहीं किया गया, तो वे सड़कों पर उतरेंगे। यह विरोध दर्शाता है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में स्थानीय लोगों की राय और उनकी जीवनशैली का ध्यान रखना कितना अनिवार्य है।

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बीएमसी कमिश्नर की चुनौती: रेसकोर्स प्रोजेक्ट और एक्सेस को लेकर उठते सवाल

कल होने वाली पब्लिक मीटिंग में बीएमसी चीफ को कई तीखे सवालों का सामना करना पड़ सकता है। कोस्टल रोड के साथ-साथ महालक्ष्मी रेसकोर्स प्रोजेक्ट को लेकर भी जनता के मन में संशय है। नागरिकों को डर है कि कोस्टल रोड के किनारे विकसित होने वाले ओपन स्पेस का एक्सेस केवल कुछ खास लोगों या कमर्शियल प्रोजेक्ट्स तक सीमित रह जाएगा।

क्या आम मुंबईकर बिना किसी शुल्क के इन पार्कों और बर्ड ट्रेल्स का आनंद ले पाएगा? एक्सेसिबिलिटी और कनेक्टिविटी को लेकर उठ रहे इन सवालों का जवाब देना प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा। लोगों की मांग है कि पूरे प्रोजेक्ट की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और इसमें ‘कॉरपोरेट स्वार्थ’ के बजाय ‘पब्लिक वेलफेयर’ को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

जेन-जी और मिलेनियल्स का नजरिया: इंस्टाग्राम रील्स बनाम इको-चिंता

मुंबई की युवा पीढ़ी के लिए यह प्रोजेक्ट एक अजीब कशमकश जैसा है। जेन-जी को कोस्टल रोड पर लॉन्ग ड्राइव और नए पिकलबॉल कोर्ट की रील्स बनाना पसंद आएगा, लेकिन वे क्लाइमेट चेंज को लेकर भी सबसे ज्यादा जागरूक हैं।

रेडिट और ट्विटर पर युवा मुंबईकर पूछ रहे हैं कि क्या यह विकास टिकाऊ (Sustainable) है? उनके लिए केवल ‘दिखने में सुंदर’ पार्क काफी नहीं हैं, उन्हें मैंग्रोव का संरक्षण भी चाहिए।

मिलेनियल्स, जो ऑफिस जाने के लिए घंटों ट्रैफिक में बिताते हैं, वे जल्द से जल्द इस प्रोजेक्ट के पूरा होने की उम्मीद कर रहे हैं ताकि उनकी लाइफ क्वालिटी बेहतर हो सके। युवाओं की यह दोहरी सोच इस प्रोजेक्ट के भविष्य के विमर्श को तय कर रही है।

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विकास की राह पर मुंबई का भविष्य और पर्यावरण का संतुलन

अंततः, मुंबई कोस्टल रोड प्रोजेक्ट मुंबई की महत्वाकांक्षा का प्रतीक है। यह प्रोजेक्ट हमें सिखाता है कि एक आधुनिक मेगा-सिटी को अपनी जरूरतों और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना कितना कठिन है। 70 हेक्टेयर का ओपन स्पेस निश्चित रूप से मुंबई के फेफड़ों के लिए अच्छा है, लेकिन मैंग्रोव की बलि एक ऐसा जख्म है जो भविष्य में भारी पड़ सकता है।

एक सीनियर जर्नलिस्ट के नाते मेरा मानना है कि बीएमसी को नागरिकों की आपत्तियों को गंभीरता से लेना चाहिए और इंजीनियरिंग के ऐसे विकल्प तलाशने चाहिए जहाँ पेड़ों की कटाई कम से कम हो। मुंबई को केवल सड़कों की नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और सांस लेने योग्य भविष्य की जरूरत है। विकास तभी सफल है जब वह प्रकृति को साथ लेकर चले।

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