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मुंबई जज रिश्वत: 15 लाख की घूस लेते कोर्ट क्लर्क गिरफ्तार,जज काजी फरार

मुंबई जज रिश्वत

मुंबई जज रिश्वत मामले में मंगलवार को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए सिटी सिविल एंड सेशंस कोर्ट, मझगांव के एक क्लर्क/टाइपिस्ट को गिरफ्तार किया है।

इस सनसनीखेज मामले में आरोप है कि क्लर्क ने एक लंबित मामले का फैसला शिकायतकर्ता के पक्ष में “बदलने” के लिए अपनी ओर से और एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की ओर से 15 लाख रुपये की रिश्वत ली थी।

इस पूरे प्रकरण ने न्यायपालिका की शुचिता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि जिस अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पर मामला दर्ज किया गया है, वह फिलहाल फरार है।

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गिरफ्तार आरोपी की पहचान और न्यायिक अधिकारी पर मामला दर्ज

गिरफ्तार आरोपी की पहचान सिटी सिविल कोर्ट से जुड़े क्लर्क/टाइपिस्ट चंद्रकांत हनमंत वासुदेव (40) के रूप में की गई है। वासुदेव को एसीबी ने रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था। वहीं, एसीबी ने सिविल सेशंस कोर्ट, मझगांव के कोर्ट नंबर 14 से जुड़े अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एजाजुद्दीन सलाउद्दीन काजी (55) पर भी मामला दर्ज किया है।

काजी की संलिप्तता सामने आने के बाद से ही वह न्यायिक हिरासत से बाहर हैं और फिलहाल फरार हैं। वासुदेव और काजी दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मामला दर्ज किया गया है, जो इस बात का संकेत है कि एसीबी इस मामले में किसी भी स्तर पर नरमी बरतने के मूड में नहीं है।

वासुदेव को बुधवार को विशेष एसीबी अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उसे 16 नवंबर तक के लिए एसीबी की हिरासत में भेज दिया गया है, ताकि मामले की तह तक जाया जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि: 2015 का संपत्ति विवाद

यह पूरा मामला एक पुराने संपत्ति विवाद से जुड़ा हुआ है। एसीबी अधिकारियों के अनुसार, शिकायतकर्ता की पत्नी ने साल 2015 में बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। यह याचिका उनकी कंपनी के परिसर पर जबरन कब्ज़े के संबंध में थी।

यह मामला काफी संवेदनशील था, जिसके चलते 27 अप्रैल, 2016 को उच्च न्यायालय ने उक्त संपत्ति पर तीसरे पक्ष के अधिकार के निर्माण पर रोक लगा दी थी।

बाद में, उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि 10 करोड़ रुपये से कम मूल्य के सभी मामलों को सिविल न्यायालय में स्थानांतरित किया जाएगा।

चूंकि इस मामले का मूल्य लगभग 10 करोड़ रुपये से कम था, इसलिए उच्च न्यायालय ने मार्च 2024 में इस वाणिज्यिक मुकदमे को मझगांव स्थित सिविल सत्र न्यायालय को स्थानांतरित कर दिया था।

इस तरह यह मामला कोर्ट संख्या 14, सिविल सत्र न्यायालय, मझगांव में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एजाजुद्दीन सलाउद्दीन काजी के समक्ष लंबित हो गया।

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रिश्वत की पहली मांग और बातचीत

मामला मझगांव कोर्ट में स्थानांतरित होने के बाद 9 सितंबर को शिकायतकर्ता का कार्यालय क्लर्क (सहयोगी) कोर्ट संख्या 14 में पेश हुआ। उसी समय, क्लर्क चंद्रकांत वासुदेव ने शिकायतकर्ता के कार्यालय सहयोगी से संपर्क किया और सीधे शिकायतकर्ता से व्यक्तिगत रूप से मिलने का अनुरोध किया।

अनुरोध के अनुसार, 12 सितंबर को चेंबूर के एक कैफे में दोनों के बीच एक बैठक आयोजित हुई। इस बैठक में वासुदेव ने सीधे तौर पर शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला बदलने के लिए 25 लाख रुपये की रिश्वत की मांग रखी। इस 25 लाख रुपये में से 10 लाख रुपये वासुदेव ने अपने लिए, और शेष 15 लाख रुपये न्यायाधीश काज़ी के लिए मांगे थे।

जब शिकायतकर्ता ने इतनी बड़ी राशि देने से इनकार कर दिया, तो चंद्रकांत वासुदेव ने उसे इस बारे में सोचने और फिर फैसला करने को कहा। बातचीत और बार-बार दबाव बनाने के बाद, रिश्वत की अंतिम राशि 15 लाख रुपये पर तय हुई।

शिकायतकर्ता का एसीबी से संपर्क और सत्यापन अभियान

भ्रष्टाचार के सामने न झुकने का फैसला करते हुए, शिकायतकर्ता ने रिश्वत का भुगतान करने से इनकार कर दिया और सोमवार (10 नवंबर को) को मुंबई में एसीबी के वर्ली कार्यालय का रुख किया और शिकायत दर्ज कराई।

शिकायत मिलने के बाद, एसीबी अधिकारियों ने तुरंत एक सत्यापन अभियान चलाया। सत्यापन में यह पाया गया कि चंद्रकांत वासुदेव ने बातचीत के बाद शिकायतकर्ता से उसके काम के लिए 15 लाख रुपये की रिश्वत की मांग की थी और इसे स्वीकार करने पर सहमति भी जताई थी। यह पुष्टि एसीबी के लिए जाल बिछाने का आधार बनी।

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जाल बिछाना और रंगे हाथों गिरफ्तारी

शिकायत की पुष्टि होने के बाद, मंगलवार को एसीबी अधिकारियों ने एक सुनियोजित जाल बिछाया। जैसे ही वासुदेव शिकायतकर्ता से मिला, उसे रंगे हाथों पकड़ा गया।

एसीबी के अनुसार, वासुदेव को शिकायतकर्ता से 15 लाख रुपये लेते हुए पकड़ा गया। यह क्षण इस मामले का निर्णायक मोड़ था। लेन-देन के तुरंत बाद, गिरफ्तार क्लर्क चंद्रकांत वासुदेव ने कथित तौर पर न्यायाधीश काज़ी को फ़ोन पर पैसे मिलने की सूचना दी।

एसीबी के बयान के अनुसार, न्यायाधीश ने कथित तौर पर इस जानकारी पर सहमति जताई, जिससे यह साबित हुआ कि वे इस मुंबई जज रिश्वत रैकेट में सह-आरोपी थे।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर

रिश्वत लेते हुए क्लर्क की गिरफ्तारी और न्यायाधीश की संलिप्तता की पुष्टि होने के बाद, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने तुरंत कार्रवाई की। क्लर्क चंद्रकांत वासुदेव और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एजाजुद्दीन सलाउद्दीन काजी दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

विशेष रूप से, न्यायाधीश काजी पर अधिनियम की धारा 7 (कानूनी पारिश्रमिक के अलावा अन्य रिश्वत लेना) और धारा 12 (अपराधों के लिए उकसाना) के तहत सह-आरोपी के रूप में मामला दर्ज किया गया है।

यह मुंबई जज रिश्वत मामला, जिसमें एक कार्यरत अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश को वांछित आरोपी नामित किया गया है, एक दुर्लभ और गंभीर मामला है जो न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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न्यायिक अखंडता पर गहरा सवाल

यह मामला न्यायपालिका की अखंडता पर एक गंभीर धब्बा है। मुंबई जज रिश्वत कांड ने स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार किस हद तक उच्च न्यायिक पदों को भी दूषित कर सकता है।

एसीबी की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन फरार न्यायाधीश काजी की गिरफ्तारी और त्वरित कानूनी प्रक्रिया ही यह सुनिश्चित करेगी कि न्याय की पवित्रता बनी रहे।

यह घटना देश भर के न्यायिक अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है। मुंबई जज रिश्वत में क्लर्क की गिरफ्तारी और जज के खिलाफ मामला दर्ज होना दर्शाता है कि अब जवाबदेही से कोई बच नहीं सकता, भले ही वे कितने भी उच्च पद पर क्यों न हों।

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