पहलगाम खुफिया विफलता: स्थानीय विशेषज्ञता की अनदेखी का दंड !
मोदी सरकार की नीतियों ने पहलगाम सुरक्षा चूक को जन्म दिया: जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार मंच
जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के लिए फोरम (एफएचआरजेके) की नई रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पहलगाम खुफिया विफलता सीधे केंद्र सरकार की नीतियों से जुड़ी है। अनुभवी स्थानीय अधिकारियों को हटाने और बाहरी लोगों की तैनाती ने जानलेवा सुरक्षा चूक को आमंत्रित किया। यह पहलगाम खुफिया विफलता रोकी जा सकती थी।
क्यों हुई पहलगाम खुफिया विफलता?
रिपोर्ट स्पष्ट करती है: केंद्रीय गृह मंत्रालय की नीतियों ने जमीनी खुफिया जाल को कमजोर किया। गैर-राज्य अधिकारियों को महत्वपूर्ण पद दिए गए। साथ ही, अनुभवी स्थानीय अधिकारियों को हटा दिया गया। यह कदम 2019 के पुनर्गठन के बाद उठाया गया। इसका परिणाम सीधे सुरक्षा ढांचे पर पड़ा। जमीन से मिलने वाली महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी में भारी कमी आई।
इसी कमजोरी ने सीमा पार आतंकवाद को फिर से सिर उठाने का मौका दिया। पहले जम्मू के पीर पंजाल और चिनाब घाटी क्षेत्र प्रभावित हुए। फिर आतंकवाद कश्मीर तक फैल गया। सबसे गंभीर रूप यह पहलगाम खुफिया विफलता में सामने आया। हमले से पहले मिली ठोस खुफिया चेतावनी पर समय पर कार्रवाई नहीं हुई।
हमले से पहले की चेतावनियां अनसुनी क्यों रहीं?
रिपोर्ट में खुलासा हुआ: हमले की सटीक खुफिया जानकारी “कार्रवाई योग्य समय” पर मिली थी। फिर भी, सुरक्षा समीक्षाएं नाकाफी और अक्षम साबित हुईं। एक बड़ी लापरवाही और भी थी। जनवरी 2025 में, बैसरान घास के मैदान के पास सीआरपीएफ की एक चौकी हटा दी गई। यह वही स्थान था जहां बाद में हमला हुआ।
हमले की आशंका की खुफिया जानकारी मिलने के बाद भी इस चौकी को दोबारा नहीं लगाया गया। यह पहलगाम खुफिया विफलता का स्पष्ट उदाहरण है। सुरक्षा तैनाती में यह चूक घातक साबित हुई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुद कई सुरक्षा समीक्षाएं की थीं। फिर भी यह चूक हुई। रिपोर्ट उनकी सीधी जिम्मेदारी मानती है।
स्थानीय अधिकारियों को हटाने के क्या परिणाम हुए?
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है: स्थानीय ज्ञान और संपर्क अमूल्य हैं। स्थानीय अधिकारी क्षेत्र की जटिलताओं को बेहतर समझते हैं। उनके स्थानीय नेटवर्क जमीनी स्तर की सूचनाएं जुटाने में सक्षम होते हैं। इन अनुभवी अधिकारियों को हटाने का फैसला भारी पड़ा।
बाहरी अधिकारियों के पास अक्सर स्थानीय संदर्भ की कमी होती है। वे भाषा, संस्कृति और स्थानीय गतिशीलता से पूरी तरह वाकिफ नहीं होते। इससे खुफिया सूचनाओं का प्रवाह बाधित हुआ। जटिल सुरक्षा चुनौतियों का विश्लेषण कमजोर हुआ। इस प्रकार, पहलगाम खुफिया विफलता अनिवार्य हो गई।
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हमले के बाद की प्रतिक्रिया
पहलगाम हमले के बाद की स्थिति और भी चिंताजनक है। हमले की कड़ी निंदा करने के बावजूद कश्मीरी लोगों को ही निशाना बनाया गया। पुलिस ने बिना ठोस सबूतों के दो कश्मीरियों को दोषी ठहराया। बाद में यह आरोप वापस ले लिए गए। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
इस जल्दबाजी के बयान ने पूरे देश में कश्मीरियों के खिलाफ नफरत फैला दी। रिपोर्ट के मुताबिक, 2,800 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया। 100 से अधिक लोगों को पीएसए और यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया। रोजाना घेराबंदी, तलाशी अभियान और छापेमारी जारी है।
मीडिया को डराया-धमकाया जा रहा है। स्थानीय अधिकारियों को हटाने की प्रक्रिया अब भी चल रही है। शांति बहाली के लिए अनुकूल माहौल बर्बाद हो गया है। यह सब पहलगाम खुफिया विफलता के बाद हुआ।
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सुरक्षा व्यय बढ़ने के बावजूद चूक क्यों?
केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा पर खर्च बढ़ाया है। यह राशि 1347.79 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। लेकिन रिपोर्ट चेतावनी देती है: सिर्फ पैसा खर्च करना काफी नहीं है। पहलगाम घटना इसका जीवंत उदाहरण है।
असली समाधान स्थानीय भागीदारी और विश्वास में निहित है। सशस्त्र हमले तभी कम होते हैं जब स्थानीय लोग साथ होते हैं। जब उनके निर्वाचित प्रतिनिधि शांति प्रक्रिया में शामिल होते हैं। सुरक्षा बलों को सुप्रीम कोर्ट के मानवाधिकार दिशानिर्देशों का पालन करना होगा। यह 1997 में तय किया गया था। यही प्रतिउग्रवाद का सबक है।
भविष्य की सुरक्षा के लिए क्या सुझाव हैं?
एफएचआरजेके ने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं:
- जम्मू-कश्मीर को तुरंत पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिया जाए। यह वादा पूरा होना चाहिए।
- लद्दाख के प्रतिनिधियों के साथ तत्काल बातचीत शुरू हो। उनकी राज्य की मांग और छठी अनुसूची में शामिल होने की मांग सुनी जाए।
- जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 को वापस लिया जाए।
- स्थानीय निगरानी आयोगों को फिर से सक्रिय किया जाए। मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, जवाबदेही आयोग और सूचना आयोग को बहाल किया जाए।
- जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे पर सांसदों और विधायकों के बीच खुला संवाद हो।
चीन-पाकिस्तान सहयोग: नई चुनौती
रिपोर्ट एक और गंभीर खतरे की ओर इशारा करती है। ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ के जवाब में पाकिस्तानी सैन्य प्रतिक्रिया चिंताजनक है। इससे चीन-पाकिस्तान रक्षा सहयोग का नया स्तर सामने आया। चीन ने न सिर्फ हथियारों की आपूर्ति की। बल्कि उसके सैन्य-रणनीतिक कार्मिकों ने मौके पर मार्गदर्शन भी दिया।
यह भारत-पाकिस्तान संघर्ष में चीन के पुराने रुख से अलग है। पहले चीन गैर-भागीदारी का दावा करता था। यह नई स्थिति भारत के लिए दोहरी मुसीबत है। खासकर लद्दाख में चीन के अतिक्रमण के मद्देनजर। यह सुरक्षा चुनौतियों को और बढ़ा सकता है। पहलगाम खुफिया विफलता ऐसी नई चुनौतियों के प्रति हमारी तैयारी की कमी को दर्शाती है।
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निष्कर्ष: विश्वास और स्थानीयकरण ही मंत्र
पहलगाम त्रासदी एक कड़वी सच्चाई बताती है। सुरक्षा केवल बजट बढ़ाने या केंद्रीकृत नियंत्रण से नहीं मिलती। यह स्थानीय विश्वास और भागीदारी पर निर्भर करती है। अनुभवी स्थानीय अधिकारियों की अहम भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उनकी जगह बाहरी लोग नहीं ले सकते।
जम्मू-कश्मीर के लोगों को सशक्त बनाना जरूरी है। उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए। शांति प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी हो। केवल तभी स्थायी सुरक्षा और शांति संभव है। पहलगाम खुफिया विफलता एक सबक है। यह भविष्य की रणनीति बदलने का आह्वान करती है। स्थानीय ज्ञान को महत्व देकर ही ऐसी त्रासदियों को रोका जा सकता है।
- एफएचआरजेके की अध्यक्षता पूर्व केंद्रीय गृह सचिव गोपाल पिल्लई और वार्ताकारों के समूह की पूर्व सदस्य राधा कुमार करते हैं, और इसके सदस्य हैं:
- न्यायमूर्ति रूमा पाल, भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश
- न्यायमूर्ति मदन लोकुर, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश
- न्यायमूर्ति ए.पी. शाह, मद्रास और दिल्ली उच्च न्यायालयों के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
- न्यायमूर्ति बिलाल नाज़की, उड़ीसा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
- न्यायमूर्ति हसनैन मसूदी, जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश
- न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश, पटना उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश
- प्रोबीर सेन, पूर्व महासचिव, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
- अमिताभ पांडे, पूर्व सचिव, अंतर-राज्य परिषद, भारत सरकार
- मूसा रज़ा, पूर्व मुख्य सचिव, जम्मू और कश्मीर सरकार
- शांता सिन्हा, पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग
- मेजर-जनरल अशोक मेहता (सेवानिवृत्त)
- एयर वाइस-मार्शल कपिल काक (सेवानिवृत्त)
- लेफ्टिनेंट-जनरल एच.एस. पनाग (सेवानिवृत्त)
- कर्नल योगेंद्र कंधारी (सेवानिवृत्त)
- एनाक्षी गांगुली, सह-संस्थापक और पूर्व सह-निदेशक, हक सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स
- रामचंद्र गुहा, लेखक और इतिहासकार
- आनंद सहाय, स्तंभकार
- शिवानी सांघवी, वकील
- अभिषेक बब्बर, वकील



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